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आखिर भाजपा में क्यों शामिल हुए पानी पी-पीकर भाजपाइयों को कोसने वाले नरेश अग्रवाल, ये है सच

Tue, 13 Mar 2018 10:04 AM IST
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 13 Mar 2018 10:04 AM IST
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political career of naresh agrawal.
भाजपा में शामिल हुए नरेश अग्रवाल।

हवा का रुख भांपकर सियासी डगर तैयार करने में माहिर नरेश अग्रवाल एक बार फिर चर्चा में हैं। सत्ता के साथ कदमताल नरेश की फितरत रही है। कांग्रेस से सियासी सफर शुरू करके लोकतांत्रिक कांग्रेस, सपा व बसपा में सत्ता का स्वाद चखने के बाद अब वह भाजपा की शरण में हैं।

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चंद दिन पहले तक पानी पी-पी कर भाजपा व उसके शीर्ष नेताओं को कोसने वाले नरेश ने सोमवार को अपने विधायक बेटे नितिन अग्रवाल व समर्थकों के साथ कमल थाम लिया। अब देखने वाली बात होगी कि भाजपा में नरेश की अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी अशोक वाजपेयी से कैसी जुगलबंदी रहती है क्योंकि सपा में रहते हुए दोनों की कभी नहीं पटी। नरेश के कारण ही अशोक वाजपेयी ने सपा छोड़ी थी। अब नरेश की राज्यसभा से विदाई होने जा रही तो अशोक वाजपेयी को राज्यसभा का टिकट मिल गया है। दोनों ही हरदोई के हैं और एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते हैं।
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प्रदेश की सियासत में नरेश अग्रवाल की अलग ही पहचान है। उनके बारे में कहा जाता है कि जिस नाव पर सवार रहते हैं, अगर उसके थोड़ा भी डगमगाने की आशंका नजर आती है तो वह दूसरी नाव पर कूदने में देर नहीं करते। सपा छोड़कर भाजपा में जाने का मामला भी कुछ ऐसा ही है। राज्यसभा का टिकट नहीं मिला तो उन्होंने भाजपा के साथ जाने में देरी नहीं की।
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कांग्रेस से अलग होकर बनाई लोकां
नरेश 1980 में पहली बार हरदोई से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए। 1985 में उनका टिकट काट दिया गया। 1989 के चुनाव में भी कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया तो बागी बनकर चुनाव लड़े और भारी मतों से जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद कांग्रेस में उनकी ससम्मान वापसी हुई। वह प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव तथा कांग्रेस विधानमंडल दल के उप नेता चुने गए।

कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में बने ऊर्जा मंत्री

political career of naresh agrawal.

1996 में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जब कोई भी दल सरकार बनाने में सक्षम नहीं हुआ तो नरेश सक्रिय हुए। कांग्रेस विधानमंडल दल ने उन्हें अपना नेता भी चुना किंतु पार्टी हाईकमान ने इसे खारिज कर दिया। 1997 में जब बसपा-भाजपा गठबंधन टूटा तो फिर राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा हुई। तब नरेश के नेतृत्व में कांग्रेस के 22 विधायकों ने लोकतांत्रिक कांग्रेस के नाम से अलग दल बना लिया। तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने सदन में लोकतांत्रिक कांग्रेस को अलग दल की मान्यता भी दे दी और दल के नेता के रूप में नरेश कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में ऊर्जा मंत्री बने।

जगदंबिका पाल को दिया था दांव
1998 में जगदंबिका पाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान भी नरेश ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। पाल, नरेश के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक कांग्रेस के समर्थन का दावा कर रहे थे लेकिन अगले ही दिन नरेश ने समर्थन वापस लेकर उनके दावे की हवा निकाल दी।

राजनाथ ने किया था मंत्रिमंडल से बर्खास्त
मंत्री रहते हुए हरिद्वार में सरकार के खिलाफ बयानबाजी करने पर 9 अगस्त 2001 को तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने नरेश को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। उस वक्त राजनाथ सरकार में शामिल लोकां खेमे के ज्यादातर मंत्री नरेश का साथ छोड़ गए। अलग-थलग पड़ जाने पर वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। 2002 में वह सपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। सपा सरकार में वह पर्यटन और परिवहन मंत्री रहे। 2007 के चुनाव में वह सपा के टिकट पर चुनाव लड़े और सातवीं बार विधानसभा पहुंचे।

बसपा से शुरू कराई बेटे की सियासी पारी

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2009 के लोकसभा चुनाव से पहले मई 2008 में नरेश सपा छोड़कर बसपा में शामिल हो गए। नरेश के इस्तीफे से रिक्त हुई सीट से उनके बेटे नितिन अग्रवाल बसपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। बसपा ने नरेश को राज्यसभा भेज दिया। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले चुनावी बयार बदलती देख नरेश की फिर सपा से नजदीकियां बढ़ने लगीं।

बसपा प्रमुख मायावती ने दिसंबर 2011 में नरेश व उनके बेटे नितिन को पार्टी से निकाल दिया तो दोनों फिर सपा के हो गए। 2012 में सपा ने नरेश को राज्यसभा भेजा तो नितिन भी हरदोई से जीतकर विधानसभा पहुंचे। अखिलेश यादव ने नितिन को अपने मंत्रिमंडल में भी जगह दी।

अब हरदोई संसदीय सीट पर निगाहें
2019 में लोकसभा चुनाव है। चूंकि अशोक वाजपेयी राज्यसभा जा रहे हैं, इसलिए नरेश की निगाह हरदोई संसदीय सीट पर है। प्रदेश में अभी योगी सरकार के चार साल और हैं, इसलिए नरेश अपने साथ-साथ अपने बेटे नितिन के लिए भी संभावनाओं का रास्ता तैयार करना चाहते हैं। भाजपा में उनकी यह मुहिम कितना परवान चढ़ेगी, यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन उन्होंने अपना दांव तो चल ही दिया है।

अशोक वाजपेयी भी भाजपा में जाने की वजह
नरेश इस बार भी सपा से राज्यसभा पहुंचने की उम्मीद लगाए थे, लेकिन पार्टी ने उनसे ज्यादा मुफीद उम्मीदवार जया बच्चन को माना। नरेश को यह नागवार गुजरा और उन्होंने सपा छोड़ने का फैसला कर लिया। नरेश के भाजपा में जाने की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि अशोक वाजपेयी के राज्यसभा में जाने से हरदोई में उन्हें अपनी सियासी ताकत कमजोर होने की आशंका नजर आने लगी थी। भाजपा में रहते हुए उनकी कोशिश हरदोई में अपने सियासी वजूद को बनाए रखने की भी होगी।

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