नेपाल में कबूतरों ने दे दिया था भूकंप आने का संकेत
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पशुपति नाथ मंदिर परिसर में कबूतरों को दाना चुगाने की परंपरा है। 25 अप्रैल को भी श्रद्धालु कबूतरों को दाना चुगा रहे थे।
दाना चुगते-चुगते अचानक सैकड़ों कबूतर फड़फड़ाने लगे। मानों वो कुछ कहना चाह रहे हों। कभी पास आते तो कभी दूर जाते। फिर सभी झुंड में उड़ गए।
इसके आठ-दस मिनट बाद ही धरती डोलने लगी। बिजली के पोल, दीवारें, भवन गिरने लगे। हर तरफ चीखपुकार और भगदड़ मच गई।
उस भयावह मंजर को याद कर स्वरूपनगर जी सेक्टर निवासी राजेश कोटवानी सिहर उठते हैं। जिस समय भूकंप आया, राजेश भी अपने दादा धर्मदास के साथ पशुपति नाथ मंदिर में कबूतरों को दाना चुगा रहे थे।
दादा और पौत्र दोनों मंगलवार सुबह ब्रह्मपुत्र एक्सप्रेस से शहर लौटे हैं। कोटवानी परिवार का आर्य नगर चौराहे पर डिपार्टमेंटल स्टोर है।
राजेश ने अमर उजाला संवाददाता को बताया कि दादा के ससुराल पक्ष नेपाल (काठमांडू) में शादी थी। वह और दादा 22 को काठमांडू पहुंचे थे।
हर तरफ था धुएं का गुबार
23 और 24 को समारोह में शामिल होने के बाद 25 को पशुपति नाथ मंदिर दर्शन करने पहुंचे। दिन के करीब साढ़े 11 बजे दर्शन करने के बाद कबूतरों को दाना चुगाने लगे।
तभी भूकंप के तेज झटके लगे। ऐसी भगदड़ मची कि मंदिर में वापस जा नहीं सकते थे। बायां हिस्सा ध्वस्त हो चुका था। हर तरफ धुएं का गुबार था। मंदिर के दायीं तरफ करीब 50 मीटर दूर ओपन लॉन मिला। वो लोग वहीं रुक गए।
राजेश ने बताया कि जब दोबारा भूकंप आया तो जिंदगी की आस ही छूटने लगी। 26 अप्रैल की सुबह 7 बजे तक वहीं बैठे रहे। होटल पहुंचे तो वाईफाई होने से सबसे पहला व्हाट्सएप मैसेज बहन कविता कपूर का मिला।
मैसेज से ही परिवार से संपर्क हुआ। एयरपोर्ट पहुंचे तो वहां 5000 लोग वेटिंग में थे। मित्र सौरभ सिंह की मदद से दो टिकट मिले। अगले दिन भूकंप जब आया तब एयरपोर्ट में चेकिंग करा रहे थे।
अचानक वहां भी भगदड़ मच गई। सभी लोग रनवे पर जाकर खड़े हो गए। किसी तरह वो कानपुर पहुंचे हैं।