अमिताभ ठाकुर को लगा झटका, याचिका हुई खारिज
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सरकार या उसकी नीतियों के खिलाफ लोकसेवक टिप्पणी नहीं कर सकते हैं। यह अंकुश राज्य के कर्मचारियों से अधिक उच्च सेवा के आईएएस व आईपीएस अफसरों पर होना चाहिए।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की लखनऊ बेंच ने सोमवार को निलंबित आईपीएस अमिताभ ठाकुर की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
अधिकरण की नवनीत कुमार और ओपीएस मलिक की बेंच ने कहा कि राज्य के कर्मचारियों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ अपरिहार्य प्रतिबंध जरूरी हैं।
चूंकि अखिल भारतीय सेवा के अफसर सरकार में उच्च पदों पर तैनात रहते हैं, इसलिए उन पर यह प्रतिबंध और भी कड़ा होना चाहिए। अनुशासन और नियंत्रित गवर्नेंस के लिए यह प्रतिबंध जरूरी है।
इन बिंदुओं का दिया था हवाला
अमिताभ ने याचिका में अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नियम का हवाला देते हुए अधिकारियों के आलोचना या टिप्पणी करने को सही ठहराते हुए इस पर लगी रोक को हटाने की गुजारिश की थी।
अधिकरण ने अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली 1968 के नियम 7 में दिए गए प्रतिबंधों को अस्पष्ट होने तथा अनुच्छेद 19(2) में दिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध होने के कारण निरस्त करने के अमिताभ ठाकुर के तर्कों को खारिज कर दिया।
अधिकरण की तल्ख टिप्पणी
ऐसे मनमर्जी से बोलने को मिले तो अराजकता फैला देंगे
कैट ने कहा कि देश में हजारों आईएएस तथा आईपीएस अफ सर हैं। यदि उन्हें मनमर्जी या अपने-अपने ढंग से बोलने की आजादी मिल जाएगी तो इससे विरोधाभासी संदेश जाएंगे, जो पूरे शासन व्यवस्था को नष्ट करते हुए अराजकता फैला देगा।