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केजीएमयू में जल्द खुलेगा ये विभाग, अभी एम्स तक में नहीं है सुविधा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Thu, 14 Jun 2018 03:49 PM IST
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- फोटो : डेमो
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किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी को बुधवार को एक और विभाग की सौगात मिली है। अब यहां पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक डिपार्टमेंट (बाल हड्डी रोग विभाग) खुलेगा। अभी तक यह विभाग एम्स में भी नहीं है। यूनिवर्सिटी प्रशासन का दावा है कि सरकारी क्षेत्र में देश में पहली बार यह विभाग खुल रहा है।
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एमसीआई और सरकार की ओर से एमसीएच पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक सुपर स्पेशिएलिटी कोर्स की स्वीकृति मिलने से विशेषज्ञ चिकित्सक बढ़ेंगे। केजीएमयू में पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक विभाग की शुरुआत करने के लिए 2016 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को प्रस्ताव दिया गया था।
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वहां से प्रस्ताव स्वीकृत होने के बाद नवंबर 2017 में प्रदेश सरकार को प्रस्ताव भेजा गया। अब इस प्रस्ताव को शासन ने मंजूरी दे दी है। विभाग के लिए आठ पद सृजित किए गए हैं। इसमें पांच फैकल्टी और तीन सीनियर रेजीडेंट होंगे। इनकी नियुक्ति अगस्त तक कर लेने की तैयारी है।
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इलाज के साथ ही विशेषज्ञता को मिलेगा बढ़ावा
विभाग के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से शताब्दी अस्पताल फेज दो में जगह तय की गई है। यहां ओपीडी की सुविधाएं चलती रहेंगी। इसके लिए पहले चरण में 30 बेड का अस्पताल चलेगा। बाद में विश्वविद्यालय परिसर में ही लिम सेंटर के पास विभाग की नई बिल्डिंग बनेगी, जो 60 बेड की होगी।
इसके लिए करीब 30 करोड़ का प्रस्ताव भेजा गया है। विभागाध्यक्ष प्रो. अजय सिंह ने बताया कि इस विभाग के खुलने से बच्चों से जुड़े हड्डी के रोगों का एक ही छत के नीचे सभी इलाज हो सकेंगे। एक तरफ बच्चों को बेहतर इलाज मिलेगा, दूसरी तरफ बच्चों में होने वाली हड्डी संबंधी बीमारियों के विशेषज्ञ भी बढ़ेंगे। बच्चों में जन्मजात पैर टेढ़ापन के ज्यादा मरीज आते हैं। इनके ऑपरेशन कई माह तक टालने पड़ते हैं। विभाग बनने से ओपीडी अलग होगी। इससे समय रहते इलाज हो सकेगा।
इसके लिए करीब 30 करोड़ का प्रस्ताव भेजा गया है। विभागाध्यक्ष प्रो. अजय सिंह ने बताया कि इस विभाग के खुलने से बच्चों से जुड़े हड्डी के रोगों का एक ही छत के नीचे सभी इलाज हो सकेंगे। एक तरफ बच्चों को बेहतर इलाज मिलेगा, दूसरी तरफ बच्चों में होने वाली हड्डी संबंधी बीमारियों के विशेषज्ञ भी बढ़ेंगे। बच्चों में जन्मजात पैर टेढ़ापन के ज्यादा मरीज आते हैं। इनके ऑपरेशन कई माह तक टालने पड़ते हैं। विभाग बनने से ओपीडी अलग होगी। इससे समय रहते इलाज हो सकेगा।