यूपी में ओवैसी समीकरण भले बिगाड़ें पर ताकत बनना मुश्किल
- ओवैसी के यूपी में बड़ी ताकत बन कर उभरने के आसार कम
- कर्नाटक के निकाय चुनाव में भी उन्हें नहीं मिली कामयाबी
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ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एआएमआईएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी भले ही लखनऊ आकर यूपी की सियासत में दिलचस्पी दिखा गए हों, अपनी बोली से मुसलमानों को लामबंद करने की कोशिश की हो, नदवा जाने से लेकर शिया धर्मगुरु कल्बे जव्वाद से मुलाकात करके 2017 के समर में मुस्लिम सियासत की बड़ी धुरी बनने के इरादे जता गए हों, ‘जय भीम व जय मीम’ के नारे से दलित और मुसलमानों के गठजोड़ की राजनीति का संकेत दिया हो लेकिन सूबे के इतिहास और समीकरण पर नजर डालें तो ओवैसी के यहां बहुत बड़ी ताकत बन कर उभरने के आसार कम ही हैं।
यह बात दीगर है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में मुसलमानों के 5-6 प्रतिशत वोट पाकर दूसरी पार्टियों के समीकरण बिगाड़ने में वह भले सफल हो जाएं। यूपी का इतिहास देखें तो ओवैसी ऐसे पहले शख्स नहीं हैं जिन्होंने मुस्लिमों के ध्रुवीकरण से सियासी ताकत बनने का सपना देखा है।
इससे पहले भी यहां ऐसी कई कोशिशें हो चुकी हैं। पर, अभी तक कोई मुस्लिम नेता सूबे की लगभग 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी को अपने साथ पूरी तरह लामबंद करने में सफल नहीं हो पाया।
अतीत पर नजर डालने से जामा मस्जिद के शाही इमाम स्व. अब्दुल्ला बुखारी का नाम याद आता है। कई चुनावों में उनके फतवे जारी हुए लेकिन इससे यूपी की सियासत में बहुत बड़ा उलटफेर नहीं दिखा।
दिवंगत सैयद शहाबुद्दीन भी एक समय ओवैसी की ही भाषा बोलकर मुस्लिमों की एक बड़ी ताकत खड़ी करने की कोशिश करते नजर आए। पर, वह भी पूरी तरह मुसलमानों को लामबंद नहीं कर पाए।
ओवैसी ने बिहार में उन 36 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे जो मुस्लिम बहुल मानी जाती हैं। मगर उन्हें एक भी सीट नहीं मिली। वरिष्ठ पत्रकार खुर्शीद आलम के अनुसार कर्नाटक में भी मुसलमान अच्छी संख्या में है।
ओवैसी की आग उगलती बातों में चटपटी चटनी जैसा मजा
ओवैसी की पार्टी ने कर्नाटक के निकाय चुनाव में ढेरों उम्मीदवार उतारे लेकिन वहां भी उन्हें कामयाबी हाथ नहीं लगी। उन इलाकों में भी ओवैसी के उम्मीदवार हार गए जो मुस्लिम आबादी प्रभावित माने जाते थे।
कहते हैं, ओवैसी भारतमाता की जय और राष्ट्रवाद जैसे शब्दों का विरोध करके कुछ उन मुसलमानों की भीड़ तो जुटा सकते हैं जिन्हें ओवैसी की आग उगलती बातों में चटपटी चटनी जैसा मजा आता है। पर, ऐसे लोगों का हाल चटनी जैसा ही होता है। जिससे लोग जायका तो बदलते हैं, पेट नहीं भरते।
उप्र के सियासी समीकरणों पर नजर डालें तो भी ओवैसी के बारे में बहुत उम्मीद नहीं दिखती। पिछले कई चुनावों से यूपी के मुसलमानों का रुझान किसी को जिताने से ज्यादा भाजपा को हराने पर केंद्रित रहा है।
सपा-बसपा दो ऐसे बड़े दल हैं जिनके एजेंडे में भी मुसलमान हैं। अभी तक भाजपा को हराने के लिए यूपी का मुसलमान इन्हीं दोनों में किसी एक को या स्थानीय समीकरणों के आधार पर वोट देता आया है।
ऐसे में ओवैसी जब तक मुसलमानों को यह भरोसा दिलाने में सफल नहीं होंगे कि वह भाजपा को हराने के साथ-साथ सरकार बनाने की स्थिति में भी हैं तब तक यहां उन्हें कोई बड़ी सफलता नहीं मिलने वाली। यह बात दीगर है कि पीस पार्टी के मो. अय्यूब की तरह मुस्लिम बहुल इलाकों से तीन-चार सीटें जीत लें।
जेएनयू के प्रोफेसर व प्रमुख समाजशास्त्री डॉ. विवेक कुमार कहते हैं कि ओवैसी बिहार में कुछ खास कर नहीं पाए। अब वह उप्र में उतरे हैं। पर, मेरा मानना है कि जब तक किसी के पास संगठन नहीं है तब तक वह सफल नहीं हो सकता।
ओवैसी का बयानों के आधार पर सफल होना असंभव
उप्र बहुत बड़ा राज्य है। जिस प्रदेश में लोकसभा की मोहनलालगंज जैसी एक सीट ही 116 किमी. लंबी हो वहां बिना संगठन के वह कैसे सफल हो जाएंगे। उनकी भूमिका वोट कटवा जैसी रह सकती है। दलित मतदाता तो टस से मस होने से रहा। ओवैसी का कोई ओर है, न छोर, वह सिर्फ बयानों से यहां सफल हो जाएंगे, इसके आसार नहीं है।
सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी व दलितों की तरक्की के लिए काम कर रह रहे एसआर दारापुरी कहते हैं कि ओवैसी भी मायावती की तरह जातिवादी राजनीति करने उतरे हैं। वह सोशल इंजीनियरिंग करके बड़ी सियासी ताकत बनना चाहते हैं।
पर, मुझे इसके बहुत आसार नहीं दिखते। इस समय तो पूरा दलित मायावती के साथ भी नहीं है। मुसलमान भी कभी पूरी तरह एक प्लेटफार्म पर नहीं रहा है। वह किसी ऐसी पार्टी के साथ जाता है जो बड़ी भूमिका में हो। इसलिए ओवैसी यहां कोई बड़ा परिवर्तन कर देंगे, मुझे नहीं लगता। हमें तो यह दूर की कौड़ी लगती है।
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी की बातों को आधार बनाकर समीकरणों को देखें तो भी यूपी में ओवैसी की राह बहुत आसान नहीं लगती।
जमशेदपुरी कहते हैं, ओवैसी की तरह कई और चेहरों ने कोशिशें की लेकिन उन्हें बड़ी सफलता नहीं मिल पाई। प्रदेश में सपा- बसपा के रहते कोई दूसरा मुसलमानों को अपने पक्ष में करने में सफल होगा, इसके आसार नहीं दिखते।