लखनऊः छत्तर मंजिल में मिली ऐतिहासिक नाव, खुफिया कमरे समेत ये सब चीजें मिलने के भी आसार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
छतर मंजिल का अपना खास ऐतिहासिक महत्व है। स्थानीय लोगों और इतिहासकारों का मानना है कि यहां कई ऐतिहासिक महत्व की चीजें आज भी दफन हैं। यहां चल रही पुरातत्व की खोदाई के दौरान एक ऐतिहासिक नाव मिली है, जो करीब दो सौ साल पुरानी बताई जा रही है। 42 फीट लंबी व 11 फीट चौड़ी है।
नाव मिलने केबाद पुरातत्व विभाग व इतिहासकारों में आशा जगी है कि खोदाई केदौरान अवध के इतिहास से जुड़े बेशकीमती पन्ने खुल सकते हैं। इसमें सोने-चांदी के बर्तनों से लेकर खुफिया कमरे और सुरंगें तक मिलने के आसार जताए जा रहे हैं।
इतिहासकार योगेश प्रवीण ने बताया कि इस इलाके में सबसे पहले अंग्रेजी अफसर क्लाउड मार्टिन ने कोठी फरहत बख्श बनवाई थी, उसका नाम आज भी वहां मिल जाएगा।
वह यहां रहा करता था। इसकेबाद नवाब सआदत अली ने अपनी मां छतर कुंअर के नाम पर छतर मंजिल का निर्माण कार्य शुरू करवाया, जो नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने पूरा करवाया। इसकी छत पर बड़ा सा बेशकीमती छतर भी लगवाया। इसकेबाद 1857 से 1947 तक यह पूरा इलाका अंग्रेजी हुकूमत के पास आ गया और इसे चारों ओर से दीवारों से ढक दिया गया, जिसके दरवाजों को लटकन दरवाजे भी बोलते थे।
दरअसल, इस पर पेंडुलम वाली घड़ियां टंगती थीं, जिसकी वजह से यह नाम पड़ा। उन्होंने उम्मीद जताई कि नाव मिलने के बाद यहां दफन और भी बेशकीमती मिल सकती हैं। इस पूरे इलाके का ऐतिहासिक महत्व बहुत है। उन्होंने यह भी बताया कि लखनऊ में जब अवध केखजाने से जुड़ी तांबे की तहरीर मिली थी तो उसके बाद कई जगहों पर खोजबीन भी की गई। फिलहाल जो नाव निकली है, उसे संरक्षित किया जाना चाहिए।
बेसमेंट से चलती थीं नावें
छतर मंजिल की बनावट अपने आप में नायाब हैं। दरअसल, यहां नीचे बेसमेंट बनवाया गया था, जोकि इतना बड़ा है, जहां नावें चलती थीं। यह बेसमेंट सीधे गोमती नदी से जुड़ा हुआ है। इससे बहू-बेगमें अपने कमरों से निकलकर सीधे बेसमेंट और फिर से नावों के जरिए गोमती नदी तक पहुंच जाती थीं।
बेगमों के लिए थी मछली-मोर वाली नावें
इतिहासकार योगेश प्रवीण ने बताया कि छतर मंजिल के नीचे बने बेसमेंट से चलने वाली नावें विशेष प्रकार की लकड़ी की होती थीं। जो बेहद मजबूत होती थीं। सामान्य नावों के अलावा बेगमों के लिए विशेष नावें बनाई जाती थीं, जिसे मोर व मछली के आकार में ढालते थे। इनमें खिड़कियां भी होती थीं। ऐसी तमाम नावों के रेखाचित्र मिल चुके हैं।
बीच गोमती तक था लकड़ी का पुल
कोठी फरहत बख्श में क्लाउड मार्टिन रहा करता था। उसने बीच गोमती नदी तक जाने केलिए लकड़ी का पुल बनवाया था। यह एक प्रकार से स्टडी के लिए था, जो तीनों ओर से ढका था और उसमें खिड़कियां भी थीं। इस पुल से गोमती में चलने वाली नावों पर नजर रखने में भी मदद मिलती थी।
खोदाई के दौरान बरती जा रही सावधानी
‘खोदाई के दौरान गंडोला बोट मिली है, जिसे संरक्षित किया जाएगा। खोदाई का काम लगातार जारी है। छतर मंजिल का ऐतिहासिक महत्व है। लिहाजा यहां खोदाई केदौरान बहुत सावधानी बरती जा रही है।’ -एके सिंह, पुरातत्व निदेशक