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मुखिया और मातहत की रस्साकसी
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 15 Jul 2014 11:58 AM IST
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बड़े-बड़े उद्योग धंधे लगवाने की योजना में जुटे अफसरों की टीम में एक अफसर मुख्यालय से बाहर बैठते हैं।
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पर, आजकल वह अपनी पकड़-पहुंच को लेकर सुर्खियों में हैं। कहते हैं कि वह जितने दिन चाहते हैं उनके विभाग का प्रमुख सचिव उतने दिन ही रह पाता है। उनसे पंगा लिया तो समझो हो गया तड़ीपार।
उनके विभाग में अब तक आधा दर्जन से अधिक अफसर फेंटे जा चुके हैं लेकिन वह पूरी ताकत से जमे हैं। विभाग में नए मुखिया को आए अभी कुछ दिन ही हुए हैं।
वह अपने को चीफ का खास समझते हैं इसलिए उन्होंने इस मातहत अफसर को भी अर्दब में लेने की कोशिश की। बैठकों में आने की ताकीद की। पर, उस पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।
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आना दूर, ऊपर के निर्देश का हवाला देकर सब अपने हिसाब से कराने की कोशिश में जुटा रहता है।
पिछले कुछ दिनों में मुखिया तो मातहत की पहुंच व पकड़ का अंदाजा तब हो गया जब उन्होंने देखा कि चीफ की कई बैठकों तक में वह नहीं पहुंचा। अब देखना है कि मुखिया और मातहत की रस्साकसी कब तक चलती है।
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