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निचली अदालत के जजों के खिलाफ टिप्पणी न हो : हाईकोर्ट

Tue, 12 Jan 2021 07:32 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Tue, 12 Jan 2021 07:32 PM IST
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No comment against judges of lower court: High Court
लखनऊ हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा है कि जिला एवं सत्र न्यायाधीश को अपील अथवा पुनरीक्षण मामलों पर फैसला देते हुए अपने अधीनस्थ न्यायिक अफसर पर प्रतिकूल टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति आलोक माथुर ने जिला जज हरदोई द्वारा एक फैसले के दौरान हरदोई की ही अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) अलका पांडे के विरुद्ध न्यायिक निर्णय में की गई टिप्पणी को हटाने के आदेश दिए। एसीजेएम अलका पांडे की याचिका पर कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि जिला जज को अपने अधीनस्थ किसी न्यायिक अफसर के फैसले लिखने को लेकर कमी नजर आती तो वह इसकी शिकायत हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या प्रशासनिक जज से कर सकता है।
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याची की दलील थी कि बतौर अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट उन्होंने 406 व 411 आईपीसी  के एक मामले की सुनवाई के बाद अभियुक्त को दोषी करार देते हुए दो वर्ष के कारावास व पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अभियुक्त ने सजा के आदेश के विरुद्ध जिला एवं सत्र न्यायाधीश हरदोई के समक्ष अपील दायर की। अपील पर फैसला देते हुए सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया, साथ में टिप्पणी भी की कि विद्वान मजिस्ट्रेट ने बिना साक्ष्य विश्लेषण किए अपीलार्थी के विरुद्ध आरोप सिद्ध होने का जो निष्कर्ष निकाला है वह त्रुटिपूर्ण है। सत्र न्यायाधीश ने यह भ टिप्पणी की कि विद्वान मजिस्ट्रेट से निर्णय लेखन में सुधार अपेक्षित है।
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याचिका में सत्र न्यायाधीश की इस टिप्पणी को फैसले से हटाने का आग्रह किया गया था। हाईकोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई के बाद अपने आदेश में कहा कि सत्र न्यायालय को अपील की सुनवाई करते हुए इस बात का पूरा अधिकार है कि वह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करे व ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष से असहमति जताए व ट्रायल कोर्ट के निर्णय के विपरीत निर्णय पारित करे, लेकिन उसे यह अधिकार कदापि नहीं है कि वह ट्रायल कोर्ट के जज की कानूनी क्षमता पर टिप्पणी करे। यह भी कहा कि सर्वोच्च अदालत ने भी हाईकोर्टों को  निर्देश दिया है कि उन्हें अपील अथवा पुनरीक्षण मामलों पर आदेश पारित करते समय, निचली अदालतों के जजों पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।
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