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कंपनियों को बिक्री के बाद वापस लेनी होगी पॉलिथीन

Sat, 23 Oct 2021 01:42 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 23 Oct 2021 01:42 AM IST
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new guidelines for polythene users
राजधानी में जो भी कंपनियां या संस्थाएं प्लास्टिक बैग या पैकेजिंग का उपयोग बिक्री में करेंगी, उनको इसे वापस लेने के लिए भी संसाधन विकसित करने होंगे। यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने पॉलीथिन या प्लास्टिक कचरा पैदा करने वाली निर्माता कंपनियों, बिक्री में शामिल ब्रांड स्टोर्स को पंजीकरण कराने और कार्ययोजना देने के लिए नोटिस जारी कर 15 नवंबर तक का समय दिया है।
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नोटिस के मुताबिक कें द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अपशिष्ट प्लास्टिक नियम, 2016 में संशोधन कर नया एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रेस्पॉन्सिबिलिटी प्लान (ईपीआरपी) तैयार किया है। इसे लागू करने के लिए अब एसओपी तैयार की है। क्षेत्रीय अधिकारी डॉ. राम करन इसे अब लखनऊ में लागू कराएंगे।
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यूपीपीसीबी के अधिकारियों का कहना है कि इस कवायद में निर्माता कंपनियां, ब्रांड ओनर्स, रिसाइकल कंपनियों के पंजीकरण जरूरी होंगे। कार्ययोजना को अनुमति मिलने के बाद ही पंजीकरण को स्वीकृत किया जाएगा। 15 नवंबर के बाद यूपीपीसीबी अपनी कार्रवाई शुरू कर देगा। इसमें 5000 रुपये प्रति टन की दर से पर्यावरणीय क्षति तय करते हुए जुर्माना की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी।
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बनाने होंगे क लेक्शन सेंटर
प्लास्टिक कचरे को बिक्री के बाद ग्राहक से वापस जुटाने के लिए जगह-जगह कूड़ेदान लगाकर कलेक्शन सेंटर बनाने होंगे। इस वापस ली गई प्लास्टिक का पूरा रिकॉर्ड भी कंपनियों को रखना होगा। नगर निगम की मदद से यह काम कंपनियां कर पाएंगी। यूपीपीसीबी को जो डाटा कंपनियां देंगीं, उसमें नगर निगम का प्रमाण पत्र भी जरूरी होगा।
रिसाइकिल न होने वाली प्लास्टिक को ना
यूपीपीसीबी ने यह भी साफ कर दिया है कि चरणबद्ध तरीके से खुद कंपनियों को उन प्लास्टिक और पॉलिथीन का उपयोग बंद करना होगा, जो रिसाइकिल नहीं हो सकती। इसके लिए दो साल का समय तय किया गया है। यूपीपीसीबी खुद इसकी निगरानी करेगा।

राजधानी में रोजाना निकलती 20 टन प्लास्टिक
राजधानी में रोजाना करीब 20 टन प्लास्टिक निकलती है। यह प्लास्टिक कचरा सीधे नगर निगम के डंप साइट पर जाता है। खुद नगर निगम के अधिकारियों का मानना है कि यह 100 फीसदी कलेक्शन नहीं है। बहुत बड़ी मात्रा में प्लास्टिक बैग ड्रेनेज व सीवरेज सिस्टम में जाकर दिक्कत खड़ी करती है। इसके अलावा मिट्टी या खुली जगह में पड़ी होकर पर्यावरण और जानवरों के लिए भी खतरा बनी हुई है।
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