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Lucknow News: ग्वार को लेड के जहर से बचाएगी नैनो तकनीक
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लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ग्वार की फसल को सीसा (लेड) के जहरीले प्रभाव से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। वनस्पति विज्ञान विभाग के शोध में हरित विधि से तैयार जिंक ऑक्साइड नैनोकणों और जिबरेलिक अम्ल के संयुक्त प्रयोग से पौधों में सीसे का जमाव जड़ों में 71 और तनों में 99 प्रतिशत तक कम पाया गया।
यह शोध विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अजेय सिंह के निर्देशन में किया गया। इसमें प्रयोगशाला के शोधकर्ता प्रो. प्रदीप कुमार की टीम का भी सहयोग रहा। अध्ययन में पाया गया कि सीसे के संपर्क में आने से ग्वार के पौधों की वृद्धि, जैवभार, प्रकाश संश्लेषण और पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता है। वहीं, दोनों का संयुक्त प्रयोग करने से पौधों की जड़ों और तनों की वृद्धि, जैवभार तथा एंटीऑक्सिडेंट रक्षा प्रणाली में सुधार हुआ। शोध में जिंक ऑक्साइड नैनोकणों को पौधे की पत्तियों के अर्क से पर्यावरण अनुकूल विधि के जरिये तैयार किया गया। डॉ. अजेय सिंह के अनुसार, यह तकनीक भारी धातुओं से प्रदूषित मिट्टी में फसलों की सहनशीलता बढ़ाने में उपयोगी हो सकती है। उन्होंने कहा कि कृषि में इस्तेमाल से पहले खेतों में परीक्षण और पर्यावरणीय सुरक्षा का आकलन जरूरी है। शोध में दीपाली चंद्रा, अमतुल्लाह अफ्फाफ, पृथ्वी राज सिंह, राजनंदिनी वर्मा, डॉ. निहारिका और प्रो. रत्ना कटियार का भी योगदान रहा।
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यह शोध विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अजेय सिंह के निर्देशन में किया गया। इसमें प्रयोगशाला के शोधकर्ता प्रो. प्रदीप कुमार की टीम का भी सहयोग रहा। अध्ययन में पाया गया कि सीसे के संपर्क में आने से ग्वार के पौधों की वृद्धि, जैवभार, प्रकाश संश्लेषण और पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता है। वहीं, दोनों का संयुक्त प्रयोग करने से पौधों की जड़ों और तनों की वृद्धि, जैवभार तथा एंटीऑक्सिडेंट रक्षा प्रणाली में सुधार हुआ। शोध में जिंक ऑक्साइड नैनोकणों को पौधे की पत्तियों के अर्क से पर्यावरण अनुकूल विधि के जरिये तैयार किया गया। डॉ. अजेय सिंह के अनुसार, यह तकनीक भारी धातुओं से प्रदूषित मिट्टी में फसलों की सहनशीलता बढ़ाने में उपयोगी हो सकती है। उन्होंने कहा कि कृषि में इस्तेमाल से पहले खेतों में परीक्षण और पर्यावरणीय सुरक्षा का आकलन जरूरी है। शोध में दीपाली चंद्रा, अमतुल्लाह अफ्फाफ, पृथ्वी राज सिंह, राजनंदिनी वर्मा, डॉ. निहारिका और प्रो. रत्ना कटियार का भी योगदान रहा।
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