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टूट रहा वेस्ट यूपी का सामाजिक तानाबाना

Mon, 09 Sep 2013 04:23 PM IST
राजेन्द्र सिंह/लखनऊ
राजेन्द्र सिंह/लखनऊ Updated Mon, 09 Sep 2013 04:23 PM IST
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muzaffarnagar riots side story

वेस्ट यूपी के गांवों में सामाजिक सद्भाव का सदियों पुराना तानाबाना मुजफ्फरनगर और शामली के गांवों में कसौटी पर है।

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बुजुर्ग अपनी आंखों के सामने भाईचारा टूटते देख रहे हैं। ब्रितानी हुकुमत के खिलाफ साझी जंग लड़ने वाले इन जिलों के गांवों तक सांप्रदायिक हिंसा पहुंचने का रुझान बेहद खतरनाक है।

कवाल की घटना के 13 दिन बाद भी स्थिति की गंभीरता को भांपने में प्रशासनिक नाकामी और लोगों में निष्पक्ष कार्रवाई का भरोसा पैदा न होना हालात को सामान्य बनाने में बाधक बन रहे हैं।
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यूं तो पश्चिमी यूपी के समूचे देहात की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है लेकिन इनमें मुजफ्फरनगर-शामली अग्रणी हैं। प्रदेश की सर्वाधिक कृषि जीडीपी इन्हीं जिलों की की है। सूबे को गुड़ और चीनी की सर्वाधिक मिठास देने वाले इलाके में कड़वाहट घुल रही है।
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यहां का मिजाज की थोड़ा अलग है। लोग बेबाकी से बोलने वाले हैं लेकिन दिल के साथ। बुजुर्ग अभी डिप्लोमेसी से दूर हैं और इंसाफ पसंद भी। उनके इस मिजाज को समझने में अफसरों की चूक रही।

शुगर, स्टील और पेपर इंडस्ट्री के लिए मशहूर इस इलाके के कस्बों में तो कभी-कभार सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बन जाती है लेकिन गांवों तक इसका असर नहीं पहुंचता था।

जाट और मुस्लिम बहुल गांवों में तो कई मौके ऐसे भी आए जब एक-दूसरे के हितों की लड़ाई में उन्होंने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया।

चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत ने जहां किसानों के मुद्दों पर लड़ाई लड़ीं वहीं नईमा कांड के खिलाफ भोपा में 40 दिन जेल भरो आंदोलन चलाया था। नईमा की अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी।

नमाज-पूजा एक साथ होती थी
किसान आंदोलनों में नमाज और पूजा एक ही जगह होती थी। एक ही मंच से हर-हर महादेव और नारा ए तदबीर-अल्लाह हो अकबर की गूंज सामाजिक सदभाव बढ़ाती थी।

ये बातें कुछ ही साल पुरानी हैं। हो सकता है कि आज के नौजवानों को इनकी याद न हो लेकिन 35-40 साल की उम्र से ऊपर के लोग इससे अच्छी तरह वाकिफ हैं। उन्हें याद है कि आंदोलनों के दौरान जनाजा और शवयात्रा कैसे मिलजुल कर निकलती थीं।

सामाजिक तानाबाना ऐसा कि रिश्ते परिवार की तरह निभाए जाते हों। अब उन्हीं गांवों में बुजुर्ग एक दूसरे पर हमलों की वारदातें देख रहे हैं।

नजदीकी घरों की लपटे और ट्रैक्टरों के जलने का मंजर उनके दिलों में बेचैनी और तपिश पैदा कर रहा है। इससे ज्यादा वे इस बात से चिंतित हैं कि एक-दूसरे का विश्वास टूट रहा है। बेबसी से कहते हैं, रहना को यही हैं लेकिन दिलों के बंटने के बाद फासला पाटने में लंबा वक्त लगेगा।

कार्रवाई में भेदभाव से बिगड़े हालात
शामली जिले में सिसौली से सटेमुढ़बर गांव के चौधरी धूम सिंह जीवित रहने तक चौधरी टिकैत के बेहद नजदीकी सहयोगी थे। वह गांवों में हिंदू-मुस्लिमों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द के लंबे समय तक गवाह रहे हैं।

बेबाकी से बोलने के लिए मशहूर धूम सिंह कहते हैं, पहले कोई विवाद था ही नहीं। इसे तो अब बढ़ाया जा रहा है। जब घर का मुखिया सही नहीं तौलेगा तो लड़ाई-झगड़े होंगे ही।

गांव का प्रधान सबको साथ लेकर चलता है तो शांति रहती है, विकास भी होता है। शासन-प्रशासन तनाव की घटनाओं को लेकर लगातार भेदभाव बरत रहा है। शामली और कवाल में बेमतलब झगड़े बढ़े हैं।

शामली ने पुलिस ने कमजोर आदमी की रिपोर्ट लिख ली होती और कवाल में दो मृतकों के परिजनों की फर्जी नामजदगी न की होती तो आक्रोश क्यों बढ़ता। बकौल चौधरी धूम सिंह कहते हैं, सरकार ने शनिवार की हिंसक घटनाओं में मृतकों के लिए मुआवजे की घोषणा कर रही है।

यही काम 27 अगस्त को कवाल में मारे गए दो हिंदू और एक मुस्लिम युवक के परिजनों के लिए किया गया होता तो स्थिति न बिगड़ती। वह कहते हैं, सूबे की सत्ता में बैठे लोगों को लग रहा है कि सरकार मुसलमानों ने बनवाई है। यदि यही हालात रहे तो बेड़ा गरक हो जाएगा। बेकसूर हिंदू-मुसलमान दोनों का बड़ा नुकसान होगा।

सियासी मिलीभगत, प्रशासनिक चूक: मुश्ताक
मुजफ्फरनगर में लंबे तक सामाजिक, राजनीतिक और किसान आंदोलनों से जुड़े रहे एमएलसी चौधरी मुश्ताक सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों पर दुखी हैं। कहते हैं सपा-भाजपा की मिलीभगत और प्रशासन की नाकामी से हालात बिगड़े हैं।

बकौल चौधरी मुश्ताक अहमद वेस्ट यूपी केगांवों में हमेशा सामाजिक सदभाव रहा है। चौधरी चरण सिंह, चौधरी टिकैत, चौधरी अजित सिंह ने कभी लोगों को बांटने का काम नहीं किया।

ताजा घटनाएं दर्दनाक हैं और शर्मनाक भी। वह पूछते हैं कि डीजीपी यहीं थे, दूसरे बड़े अधिकारी भी कैंप किए हुए थे फिर हालात बिगाड़ने की इजाजत क्यों दी गई।

मोटर साइकिलों पर नौजवानों को भड़काऊ नारेबाजी करने, हथियार लहराने की छूट क्यों दी गई। घटना की शुरुआत कवाल में दुखद घटना से हुई। इसमें बेगुनाहों की नामजदगी क्यों की गई?

उन्होंने कहा, दोनों ही फिरके के लोगों को प्रशासन पर भरोसा नहीं है। उन्हें लग रहा है कि निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हो रही है। घटनाक्रम पर नजर डालें तो भाजपा और सपा की मिलीभगत भी दिख रही है।

उन्होंने कहा, प्यार-मोहम्मत और भाईचारा बिगाड़ने की किसी को इजाजत नहीं होनी चाहिए। असामाजिक लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए वे चाहे किसी भी पक्ष से क्यों न हों। यह सुनिश्चित होना चाहिए कि कोई बेगुनाह जेल न जाए।

छेड़छाड़ को हल्के में लेने की आदत
पश्चिमी यूपी की सामाजिक संरचना में छेड़छाड़, लड़कियों को भगा ले जाने और अंतरधार्मिक विवाह जैसे मामले कई बार बड़े विवाद का रूप ले लेते हैं। खापों की पंचायतों तक मामले पहुंच जाते हैं।


इन्हें हल्के में लेने की पुलिस की आदत माहौल बिगाड़ने वालों की मदद करती है। कवाल कांड की जड़ में भी एक युवती से छेड़छाड़ ही प्रमुख वजह रही है। इस हालत को समझने में प्रशासन की चूक रही।

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