तीसरे मोर्चे के नेता के तौर पर मुलायम के नाम पर लगी मुहर
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सपा की स्थापना के 25वें साल में तीसरे मोर्चे के नेता के रूप में मुलायम सिंह यादव के नाम पर शनिवार को फिर मुहर लग गई। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन से अलग होने के बाद यह पहला मौका है जब सपा के मंच पर कई दलों के प्रमुख नेता जुटे।
सभी ने भाजपा को रोकने के लिए मुलायम से गठबंधन की पहल करने की अपील की। इससे राष्ट्रीय राजनीति में सपा की अहमियत और स्वीकार्यता बढ़ेगी। बड़े चेहरों के साथ आने के बाद सपा अब भाजपा विरोधी लड़ाई की धुरी बनकर विधानसभा चुनावों में मुसलमानों का बिखराव रोकने की कोशिश भी करेगी।
मुलायम के कुनबे में छिड़े संग्राम से मुसलमानों में असमंजस की स्थिति के बीच सपा ने रजत जयंती समारोह में भारी भीड़ जुटाकर 2017 के विधानसभा चुनाव में मजबूती से ताल ठोकने का संदेश दिया।
इसमें जनता दल (एस) के अध्यक्ष व पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, राजद अध्यक्ष लालू यादव, जदयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव, रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह, इनेलो नेता अभय चौटाला और केंद्रीय कानून मंत्री रह चुके अधिवक्ता राम जेठमलानी शामिल हुए।
चार राज्यों में है इन नेताओं की मजबूत पकड़
यूपी, बिहार, हरियाणा और कर्नाटक की राजनीति में खास स्थान रखने वाले इन नेताओं ने भाजपा को रोकने के लिए यूपी विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की पेशकश रखी।
इससे पहले बिहार चुनाव के समय भी इसी तरह का महागठबंधन बनाया गया था। मुलायम को इसका नेता चुना गया था, पर चुनाव से ठीक पहले सपा इससे अलग हो गई।
इससे न केवल सपा की किरकिरी हुई, राष्ट्रीय राजनीति में विकल्प बनने की मुलायम की कोशिशों को भी झटका लगा था। अल्पसंख्यकों में भी इसका अच्छा संदेश नहीं गया था। बकौल शिवपाल इस गठबंधन को तुड़वाने में रामगोपाल यादव की भूमिका थी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सीबीआई के डर से भाजपा के दबाव में उन्होंने यह गठबंधन तुड़वाया। रामगोपाल की सपा से बर्खास्तगी के बाद मुलायम के निर्देश पर शिवपाल ने भाजपा के खिलाफ गठबंधन की कोशिशें तेज कर दी हैं।
उनका कहना है कि गठबंधन पर कोई भी फैसला राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा लेकिन वह चाहते हैं कि सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लोहिया, चौधरी चरण सिंह और गांधीवादी मिलकर लड़ाई लड़ें।
राष्ट्रीय राजनीति में होगी नेताजी की वापसी
सपा के मंच पर कई बड़े नेताओं के जमावड़े और मुलायम से गठबंधन की पहल करने की अपील से राष्ट्रीय राजनीति में सपा की स्वीकार्यता बढ़ेगी।
वामपंथी दलों और ममता बनर्जी को झटके के बाद बिहार में गठबंधन से अलग होने पर देश के क्षेत्रीय दलों में सपा की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा था।
शनिवार को कई बड़े नेताओं ने मुलायम को नेता मानकर उनका न केवल कद बढ़ाया, वरन तीसरे मोर्चे के नेता के तौर पर स्वीकार भी किया। देवेगौड़ा ने तो यहां तक कहा कि सांप्रदायिक ताकतों को शिकस्त देने के लिए सभी नेताओं को मतभेद भुलाकर मुलायम सिंह के नेतृत्व में लड़ाई लड़नी होगी। मुलायम चाहेंगे तो गठबंधन बनाकर राष्ट्रीय राजनीति में वापसी कर सकते हैं।
यूपी में मुसलमानों की पहली पसंद सपा
प्रदेश में मुसलमानों की पहली पसंद सपा मानी जाती रही है, लेकिन मुलायम परिवार में घमासान से मुस्लिम असमंजस में हैं। कॉमन सिविल कोड और तीन तलाक जैसे मुद्दे पर बहस गरमा जाने के बाद मुसलमानों में भाजपा के प्रति नाराजगी और बढ़ी है। मुसलमान नहीं चाहते कि प्रदेश में भाजपा की सरकार बने।
सपा सेक्युलर दलों की एकता के नाम पर बड़े नेताओं को जोड़कर भाजपा विरोधी और मुसलमानों का हितैषी होने का संदेश दे सकती है। ऐसा करके सपा, बसपा के प्रति मुसलमानों के रुझान को रोकना चाहेगी।
परवान चढ़ सकती है अजित की सपा से दोस्ती
सपा के रजत जयंती समारोह में जो नेता शामिल हुए, उनमें अजित सिंह को छोड़कर अन्य दलों का प्रदेश में खास असर नहीं है। देवेगौड़ा और अभय चौटाला का प्रदेश की राजनीति में कोई दखल नहीं है।
नीतीश कुमार की छवि व जातीय समीकरण के चलते जदयू जरूर थोड़ा-बहुत असर डाल सकता है। ऐसे में सपा-रालोद की दोस्ती परवान चढ़ सकती है। इसमें जदयू भी शामिल हो सकता है।
शनिवार को अजित सिंह एयरपोर्ट से सीधे मुलायम सिंह के आवास पर पहुंचे और राजनीतिक हालात पर बातचीत की। वहां से दोनों नेता साथ-साथ जनेश्वर मिश्र पार्क गए।