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मोबाइल छीन रहा बचपन
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मोबाइल छीन रहा बचपन
होम्योपैथिक सांइस सोसायटी की कार्यशाला में विशेषज्ञों ने किया सतर्क
मोबाइल बच्चों से उनका बचपना छीन रहा है। मोबाइल फोन के चलते बच्चों में हिंसा, गुस्सा और झूठ बोलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह बात रविवार को डॉ. अनुरुद्ध वर्मा ने कही। वह होम्योपैथिक साइंस सोसायटी की ओर से एक होटल में आयोजित कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि माता-पिता भी गर्व से बताते हैं कि उनका बेटा मोबाइल चलाता है, उसी में मस्त रहता है। उन्होंने बच्चों को मोबाइल से बचाने की सलाह दी। कार्यशाला में देशभर के होम्योपैथिक विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी।
उन्हाेंने बताया कि पहले तनाव, अवसाद जैसी बीमारियां बड़ों में पायी जाती थीं, अब बच्चों में भी होने लगी हैं। इसका बड़ा कारण पढ़ाई का बोझ और बस्ते का बढ़ता वजन है। हालत यह है कि बच्चा नौ किलो का और स्कूल बैग का वजन 11 किलो तक होता है।
मुख्य अतिथि डॉ. सुभाष चंद्र ने कहा कि एलोपैथी को बाजारवाद से जोड़ने के कारण इसका चलन पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा होता है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसी होम्योपैथी दवाएं लाई जा सकें जो तुरंत राहत दे तो यह बड़ी सफलता होगी। विशिष्ट अतिथि डॉ. जेडी दरियानी ने कहा कि होम्योपैथिक दवाओं के फ ायदे को वैज्ञानिक तरीके से समझाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जैसे लंबे समय से हम लोग कैल्करिया फॉस का उपयोग करते आ रहे हैं। यह दवा ज्यादातर घरों में मिल जाती है। अब जरूरत यह बताने की है कि कैल्करिया फॉस किस तरह काम करती है।
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बच्चों में यह दवा कैल्शियम की पूर्ति करती है। बच्चों में खून की कमी, मिट्टी खाने की आदत, जल्दी-जल्दी सर्दी, रेस्पिरेटरी प्रॉब्लम में भी यह दवा राहत देती है। हरियाणा से आए डॉ. नवनीत निदानी ने बच्चों की व्यवहारगत समस्याओं पर चर्चा की।
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होम्योपैथिक सांइस सोसायटी की कार्यशाला में विशेषज्ञों ने किया सतर्क
मोबाइल बच्चों से उनका बचपना छीन रहा है। मोबाइल फोन के चलते बच्चों में हिंसा, गुस्सा और झूठ बोलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह बात रविवार को डॉ. अनुरुद्ध वर्मा ने कही। वह होम्योपैथिक साइंस सोसायटी की ओर से एक होटल में आयोजित कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि माता-पिता भी गर्व से बताते हैं कि उनका बेटा मोबाइल चलाता है, उसी में मस्त रहता है। उन्होंने बच्चों को मोबाइल से बचाने की सलाह दी। कार्यशाला में देशभर के होम्योपैथिक विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी।
उन्हाेंने बताया कि पहले तनाव, अवसाद जैसी बीमारियां बड़ों में पायी जाती थीं, अब बच्चों में भी होने लगी हैं। इसका बड़ा कारण पढ़ाई का बोझ और बस्ते का बढ़ता वजन है। हालत यह है कि बच्चा नौ किलो का और स्कूल बैग का वजन 11 किलो तक होता है।
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मुख्य अतिथि डॉ. सुभाष चंद्र ने कहा कि एलोपैथी को बाजारवाद से जोड़ने के कारण इसका चलन पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा होता है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसी होम्योपैथी दवाएं लाई जा सकें जो तुरंत राहत दे तो यह बड़ी सफलता होगी। विशिष्ट अतिथि डॉ. जेडी दरियानी ने कहा कि होम्योपैथिक दवाओं के फ ायदे को वैज्ञानिक तरीके से समझाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जैसे लंबे समय से हम लोग कैल्करिया फॉस का उपयोग करते आ रहे हैं। यह दवा ज्यादातर घरों में मिल जाती है। अब जरूरत यह बताने की है कि कैल्करिया फॉस किस तरह काम करती है।
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बच्चों में यह दवा कैल्शियम की पूर्ति करती है। बच्चों में खून की कमी, मिट्टी खाने की आदत, जल्दी-जल्दी सर्दी, रेस्पिरेटरी प्रॉब्लम में भी यह दवा राहत देती है। हरियाणा से आए डॉ. नवनीत निदानी ने बच्चों की व्यवहारगत समस्याओं पर चर्चा की।