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स्कूलों में संस्कृत में पढ़ाएगी जाएगी लखनऊ मेट्रो की गाथा

Thu, 03 Sep 2015 09:48 AM IST
Updated Thu, 03 Sep 2015 09:48 AM IST
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metro chapter will taught in sanskrit in schools

‘अहमस्मि मेट्रोरेलयानम्। ममेतिहास: नाति प्राचीन: परंच चित्ताकर्षक: विद्यते। यात्रा साधनानि बहुनि प्रचलितानि सन्ति। तेषु स्वल्पेनैव धनेन अल्पावधौ सुखेन जनानां यात्रासाधनत्वेन विश्वे विश्रुतोहम्।’ ‘तत: परं उत्तर प्रदेशस्य राजधान्यां (लखनऊ) अहं लक्ष्मणपुरया: जनानां कृते यात्राया: सुखसाधनखेन प्रस्तुत भवाम।’

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संस्कृत में खुद के बारे में बताती मेट्रो की ये आत्मकथा स्कूली बच्चे अब दक्षिण भारत के छात्र पढ़ेंगे। इंग्लैंड लिवरपूल से लेकर लखनऊ तक मेट्रो का ये सफर सातवीं क्लास के छात्र पढ़ेंगे और मेट्रो के सफर को जानेंगे।
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नगर के संस्कृत विद्वान डा. विजय कर्ण इन दिनों दक्षिण भारत के कई राज्यों में संस्कृत की प्रचलित संस्कृतरत्नम पाठ्यपुस्तक के लिये पाठ्यक्रम में पाठ ‘मेट्रोरेलयानस्य आत्मकथा’ पाठ लिख रहे हैं।
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जिसमें पाठ में हमारी मेट्रो भी है, पाठ अभी लिखा जा रहा है। पाठ में मेट्रो अपनी आत्मकथा के बारे में जानकारियां देती हुये बताती है। जिसमें वो लंदन के लिवरपूल से कैसे अस्तित्व में आती है।

बाद में फ्रांस में कैसे अपने संक्षिप्त नाम (चेमिन डे फेर से बदलकर मेट्रो) को पाती है। मेट्रो खुद ही अपनी जुबानी बताती है कि कैसे दुनिया के तमाम देशों के होने के बाद वो भारत में सबसे पहले कोलकाता में ट्राम रूप में एंट्री करती है।

पूरे भारत में घूमकर अब लखनऊ पहुंची मेट्रो

metro chapter will taught in sanskrit in schools

पाठ्यक्रम में मेट्रो खुद बतायेगी कि कैसे वो दिल्ली, चेन्नई, बंगलुरू, हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद से होते हुये उप्र की राजधानी लखनऊ पहुंची। कैसे उसने दिल्ली में सन् 2002 में दौड़ लगाई और 1.17 लाख वाहनों को सड़कों से दूर कर ट्रैफिक हल्का किया। डा. विजय कर्ण ने बताया कि पाठ्यक्रम अभी लिखा जा रहा है।

उसमें लखनऊ मेट्रो के बारे में, उसकी यात्रा वृतांत के बारे में भी जिक्र है। ये कक्षा सात केछात्रों केलिये लिखे जा रहे पाठ्यक्रम का हिस्सा है। पाठ्यक्रम में बच्चों की तार्किक शक्ति बढ़ाने के लिये संस्कृत में ही बूझो तो जानें प्रहेलिकायें भी इन  दिनों तैयार कर रहे हैं।

50 से अधिक प्रहेलिकायें तैयार हो चुकी हैं। मालूम हो कि संस्कृतरत्नम पुस्तक दक्षिण भारत के तमाम राज्यों कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, केरल के अलावा बिहार, झारखंड और उत्तराखंड में भी संस्कृत पाठ्यक्रम में शुमार है।

दक्षिण भारत में पढ़ी जा रही है ‘कर्ण’ की किताब

metro chapter will taught in sanskrit in schools

दक्षिण भारत के स्कूलों में पढ़ी जा रही हैं ‘कर्ण’ की किताब
लिखी जा रही किताब के कुछ अंश इस प्रकार हैं। ‘तत: परं उत्तर प्रदेशस्य राजधान्यां (लखनऊ) अहं लक्ष्मणपुरया: जनानां कृते यात्राया: सुखसाधनखेन प्रस्तुत भवाम।’

ऐसी संस्कृत भाषा की पंक्ति के साथ आने वाले दिनों में लोग संस्कृत में मेट्रो को जानेंगे। डा. विजय कर्ण इससे पहले कई संस्कृत की किताबों को लिख चुके हैं। उनकी लिखी ‘संस्कृत रत्नम्’ मौजूदा समय में दक्षिण भारत के तमाम राज्यों के पाठ्यक्रम में शामिल है।

जिन्हें विभिन्न स्कूलों के 5, 6, 7 और 8 कक्षा के छात्र कई वर्षों से पढ़ रहे हैं। यही नहीं उनकी संपादित ‘व्यवहारिक संस्कृत प्रशिक्षण’ उप्र में संस्कृत को सीखने के लिये सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब में शुमार है।

पिछले करीब दो दशकों से भी आकाशवाणी से जुड़े डा. कर्ण इससे पहले गोमती तुम बहती रहना समेत कई रेडियो धारावाहिकों के लिये भी अपनी सेवायें दे चुके हैं। बीते दिनों उन्हें संस्कृत संस्थान केपुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है।

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