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मेट्रो सीएजी रिपोर्ट : बगैर ट्रांजिट पास के ठेकेदारों को किया भुगतान, नहीं दिए रिकॉर्ड

Sun, 22 Feb 2026 02:12 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 22 Feb 2026 02:12 AM IST
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Metro CAG report: Payments made to contractors without transit passes, records not provided
प्रतीकात्मक।
लखनऊ। लखनऊ मेट्रो रेल परियोजना के निर्माण एवं संचालन की सीएजी रिपोर्ट से एक और बड़ा खुलासा हुआ है। बिना ट्रांजिट पास के ठेकेदारों को करोड़ों का भुगतान किया गया। यही नहीं, ठेकेदार से रॉयल्टी और खनिजों के मूल्य की कटौती भी नहीं की गई। कंपनी ने कंजम्पशन स्टेटमेंट उपलब्ध नहीं कराया, लिहाजा लेखा परीक्षा में रॉयल्टी की धनराशि और शामिल खनिजों के मूल्य की गणना नहीं की जा सकी।
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उप्र उपखनिज व खनिज नियमावली के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति वैध ट्रांजिट पास (फॉर्म एमएम-11) के बिना किसी भी खनिज का परिवहन नहीं करेगा। यदि ठेकेदार फॉर्म एमएम-11 पेश नहीं करता है तो रॉयल्टी के अलावा खनिज की कीमत से पांच गुना अधिक धनराशि ठेकेदार के बिल से कटौती कर राजकोष में जमा की जाएगी। लेखा परीक्षा में पाया गया कि ठेकेदार ने डिपो में बैलास्ट ट्रैक बिछाने के लिए 24,062.59 घन मीटर लूज मात्रा में गिट्टी मंगवाई। मार्च 2019 तक आपूर्ति की गई गिट्टी के लिए 5.90 करोड़ का भुगतान किया गया था।
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इसी तरह आठ एलिवेटेड स्टेशनों के निर्माण के लिए 76,102.72 घन मीटर कंक्रीट कार्य किए गए थे। लेखा परीक्षा में पाया गया कि कंपनी के परियोजना अधिकारियों ने न तो उक्त खनिजों को वैध खदानों से लाने के लिए ट्रांजिट पास लिया था, न ही नियमानुसार खनिजों की रॉयल्टी व पेनाल्टी सुनिश्चित की थी। कंपनी की तरफ से इससे संबंधित रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं कराया गया। जिससे कितनी धनराशि का नुकसान हुआ ये स्पष्ट नहीं हो सका। इससे अंदेशा है कि बड़ा खेल किया गया।
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3.16 करोड़ की नहीं की गई कटौती
एलकेसीसी-7 के कार्य में 36,611.20 घनमीटर मोटी बालू व रेत का उपयोग किया गया। इसकी रॉयल्टी 52.59 लाख थी। ठेकेदार से न तो एमएम-11 फॉर्म प्राप्त किए गए और न ही कंपनी के परियोजना अधिकारियों ने ठेकेदार के बिलों से 3.16 करोड़ की रॉयल्टी और खनिजों के मूल्य की कटौती की थी। इस मामले में तीन करोड़ 16 लाख रुपये का नुकसान हुआ।

खनन की नहीं ली थी अनुमति, नियमों का नहीं किया पालन
उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर के तहत चार भूमिगत मेट्रो स्टेशनों का निर्माण किया गया था। लेखा परीक्षा में पाया गया कि कंपनी ने भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग से मिट्टी खनन की अनुमति नहीं ली। निर्माण के दौरान कुल 6,39,277.50 घन मीटर मिट्टी निकाली गई। इसमें से 4,63,054.50 घन मीटर मिट्टी अन्य सरकारी विभागों को दे दी गई। आश्चर्य की बात यह है कि मिट्टी के निस्तारण की योजना स्वीकृत डीपीआर में शामिल ही नहीं थी। साथ ही कंपनी ने हस्तांतरित मिट्टी पर देय 1.39 करोड़ रुपये की रॉयल्टी न तो वसूली और न ही सरकारी खाते में जमा कराई।
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