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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Message for Uttar Pradesh from Delhi Assembly poll 2020.

दिल्ली चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए सबक तो विपक्ष के लिए नसीहत, यूपी के लिए ये है संदेश

Thu, 13 Feb 2020 02:54 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Thu, 13 Feb 2020 02:54 PM IST
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Message for Uttar Pradesh from Delhi Assembly poll 2020.
दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल व यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ। - फोटो : अमर उजाला।

वैसे तो दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों से प्रदेश की सियासत पर हाल-फिलहाल कोई बड़ा असर पड़ने की संभावनाएं नहीं है। सीमाएं मिली होने के बावजूद दोनों राज्यों के सामाजिक समीकरण और सियासी परिस्थितियां भिन्न हैं। चुनावी गणित भी अलग है। बावजूद इसके इन नतीजों से सत्ताधारी भाजपा के लिए सलाह और सीख छिपी है तो विरोध में खड़े सपा, बसपा और कांग्रेस के लिए नसीहत निकलती दिखाई दे रही है।

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भाजपा को अपने काम और फैसलों के साथ जनता के बीच उसे पहुंचाने व कठिनाइयां दूर करने पर ज्यादा ध्यान देने के साथ कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करना जरूरी है। विपक्ष को नसीहत यह कि सांकेतिक सक्रियता और हर काम व फैसलों को लेकर भाजपा पर हमला करने भर से अब उनका लाभ होने वाला नहीं है।
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दरअसल, दिल्ली में भाजपा का मत प्रतिशत विधानसभा चुनाव 2015 के मुकाबले लगभग उतना ही बढ़ा है जितना कांग्रेस का घटा है। सीटें उतनी बढ़ी जितनी आप की घटीं। आप के मत प्रतिशत में आधा प्रतिशत ही कमी आई। इससे यह संकेत निकल रहा है कि पांच साल सरकार चलाने के बावजूद आप ने 2015 में मिले अपने वोट को किसी न किसी तरह मजबूती से जोड़े रखा।
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उसकी वजह चाहे लुभावनी घोषणाएं हों, स्कूलों व स्वास्थ्य सेवाओं का कायाकल्प, मुफ्त बिजली, पानी या फिर महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा अथवा लोगों से जमीनी संवाद की शैली हो।

सवाल उठ सकता है कि 2015 के चुनाव की तुलना में मत प्रतिशत भाजपा का बढ़ा तो फिर उतना लाभ क्यों नहीं हुआ। इसलिए समझना होगा कि भले ही कमल के वोट बढ़े हों, लेकिन आठ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव की तुलना में काफी बड़ी गिरावट आई है? भाजपा को तब दिल्ली में 57 प्रतिशत वोट मिले थे। इस बार उसे सिर्फ 38.5 प्रतिशत मत ही मिले।

कांग्रेस के मजबूती से न लड़ने के कारण वोटों का बंटवारा सीधे-सीधे आप व भाजपा में हुआ

मतलब यह कि कांग्रेस के मजबूती से न लड़ने के कारण वोटों का बंटवारा सीधे-सीधे आप व भाजपा के बीच हुआ। एक तरह से भाजपा को हराने व जिताने वालों के बीच लामबंदी हुई। भाजपा को हराने वालों के साथ मुस्लिम मतदाताओं का भी ज्यादातर मत जुड़ा।

आप का पूरा ध्यान इस बात पर रहा कि उसके वोट बैंक में भाजपा की सेंध न लगने पाए। भाजपा को उसे हिंदुत्व विरोधी पाले में खड़ा करने का मौका न मिले। कांग्रेस ने सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसा किया है अथवा भाजपा विरोधी मतदाताओं ने चतुरता दिखाते हुए वोट बिखरने नहीं दिया यह तो बहस का मुद्दा है। पर, इतना साफ दिखता है कि कांग्रेस अगर मजबूती से लड़ती तो नतीजे ऐसे न होते। जिसका प्रमाण है कि लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सात संसदीय सीटों में पांच पर भाजपा के मुकाबले कांग्रेस का नंबर दो रहना है। तब आप को काफी कम मत मिले थे।

सपा और बसपा के फिर से एक होने की जल्दी कोई उम्मीद नहीं

दिल्ली के नतीजों के आधार पर देखें तो प्रदेश में सपा और बसपा के फिर से एक होने की जल्दी कोई उम्मीद नहीं है। कांग्रेस भी इकला चलो की नीति पर है। बीएचयू के राजनीति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. कौशल किशोर कहते भी हैं कि इन नतीजों से भाजपा को कोई चुनौती नहीं दिख रही है। सपा, बसपा और कांग्रेस अलग-अलग हैं।

अरविंद केजरीवाल जैसा कोई एक चेहरा नहीं है, जिसके पीछे भाजपा विरोधी वोट लामबंद होना शुरू कर दे। अखिलेश यादव व मायावती की सियासी छवि भी केजरीवाल जैसी नहीं है।

रही बात कांग्रेस की तो भले ही ‘प्रियंका गांधी’ प्रदेश में एक साल से अलग-अलग घटनाओं को लेकर संबंधित स्थानों पर जाकर लोगों से मिल रही हों। पर, आने व दिल्ली चले जाने से कुछ नहीं होगा। इसे अभी सांकेतिक सक्रियता ही माना जाएगा। इसलिए कांग्रेस को ‘आनंदभवन’ वाले राज्य में ‘सियासी आनंद’ पाने के लिए अभी इंतजार करना होगा।

भाजपा के लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं, फिर भी रहना होगा सचेत

जाहिर है कि भले ही भाजपा के लिए अभी कोई बड़ी चुनौती नहीं होकर बैठ जाना भाजपा की मुसीबत बढ़ाएगा। विपक्षी दलों की एका ही नहीं बल्कि विरोधी मतों का ध्रुवीकरण भी रोकने पर नजर रखनी होगी ताकि वोटों का बंटवारा दिल्ली की तरह सीधा-सीधा न होने पाए।

राजनीति शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि कार्ल मार्क्स के अनुसार, राजनीतिक लोकतंत्र बिना आर्थिक जनतंत्र के कोरी कल्पना है। केजरीवाल ने इसे दिखा भी दिया है। भाजपा नेतृत्व को यह समझना होगा कि राष्ट्रीय और राज्य के चुनाव में काफी अंतर होता है। इसलिए प्रदेश सरकार को राज्य की जनता की कठिनाइयों पर अधिकारियों के बजाय अपनी नजर रखकर उनका समाधान करने पर ध्यान देना होगा।

कामों को लोगों के बीच पहुंचाना होगा और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं पर भी सोचना होगा। सपा, बसपा और कांग्रेस को भी केजरीवाल से ये सीखना चाहिए कि भाजपा का मुकाबला करना है तो उन्हें हिंदुत्व से जुड़े सरकार के फैसलों व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अतार्किक हमलों से बचना होगा।

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