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डीटीपी सेल के बावजूद लविवि में हो रही बाहर से प्रिटिंग

Mon, 16 Sep 2019 01:45 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 16 Sep 2019 01:45 AM IST
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lu is not using his printing department
एलयू बेवजह करा रहा बाहर से प्रिंटिंग, लेखा परीक्षा विभाग ने जताई आपत्ति
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डीटीपी सेल में प्रिंटर और प्रोग्रामर की तैनाती होने के बावजूद बाहर से प्रिंटिंग पर उठ रहे सवाल
सचिन त्रिपाठी
लखनऊ विश्वविद्यालय एक तरफ पैसों की कमी का रोना रोता है तो दूसरी तरफ रुपये की बर्बादी की जा रही है। विवि में डीटीपी सेल मौजूद है। इसमें कंप्यूटर प्रोग्रामर से लेकर प्रिंटिंग की पूरी व्यवस्था है। इसके बावजूद लविवि अंकपत्र से लेकर हर काम में बाहरी एजेंसी का सहारा ले रहा है। इस पर हर साल लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। स्थानीय निधि लेखा परीक्षा विभाग ने इस पर आपत्ति जताई है। इसके अनुसार वर्ष 2014-15 में ही प्रिंटिंग के काम के लिए दो लाख 53 हजार 282 रुपये का भुगतान किया गया।
लविवि में इस समय हर काम के लिए एक अलग एजेंसी काम कर रही है। विवि में कुछ समय पहले अंकपत्र आदि का काम डीटीपी सेल के माध्यम से किया जाता था। इसके बाद धीरे-धीरे यह काम बाहरी एजेंसियों को सौंप दिया गया। हर साल इसके लिए लाखों का भुगतान होता है। स्थानीय लेखा निधि परीक्षा विभाग ने भी इस पर आपत्ति जताई है। इसके अनुसार जब विवि में डीटीपी सेल स्थापित है तो फिर प्रिंटिंग का काम बाहर से क्यों कराया जा रहा है।
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चर्चा में है लविवि के फर्जी अंकपत्र का मामला
लविवि में इस समय फर्जी अंकपत्रों का मामला गूंज रहा है। पुलिस की जांच में यह बात सामने आई है कि फर्जी अंकपत्र बनाने में लविवि के अंकपत्रों में उपयोग होने वाले कागज का ही उपयोग किया जा रहा था। इसके अलावा यहां के टैबुलेशन चार्ट आदि भी फर्जी अंकपत्र बनाने में उपयोग किए गए। विवि के बाहर काम होने की वजह से इसकी गोपनीयता भंग हो रही है, विवि को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ रहा है।
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टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं
स्थानीय निधि लेखा परीक्षा विभाग ने लविवि में टेंडर प्रक्रिया का पालन न करने पर भी आपत्ति जताई है। ऑडिट में सामने आया है कि लविवि में किसी बड़े काम को करने के लिए टेंडर जारी करने के बजाय उसी काम को कम रकम के छोटे-छोटे कई भागों में बांटकर किया जा रहा है। वित्त के नियमों के अनुसार 20 हजार रुपये से ज्यादा के काम कराने के लिए टेंडर जारी होना चाहिए। इसका पालन करने के बजाय एक ही काम को छोटे-छोटे कई भागों में बांट दिया गया। इस प्रकार से 57 लाख 33 हजार 400 रुपये का काम करा लिया गया। इस पर गंभीर ऑडिट आपत्ति दर्ज कराई गई है।

जरूरी होने पर ही बाहर से कराई होगी प्रिंटिंग
जरूरी होने पर ही प्रिंटिंग का काम बाहरी एजेंसी से कराया गया होगा। अंकपत्र आदि की संख्या बहुत ज्यादा होने की वजह से लविवि में करना संभव नहीं होता है। इसलिए ऐसा किया गया होगा।
- प्रो. एनके पांडेय,
प्रवक्ता, लविवि
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