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अटल के गढ़ में राजनाथ को कौन देगा टक्कर, चर्चा जीत के अंतर को लेकर

Fri, 03 May 2019 04:46 AM IST
देव कश्यप अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: देव कश्यप Updated Fri, 03 May 2019 04:46 AM IST
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LS Chunav 2019: Lucknow Constituency who give fight Rajnath, discussion on difference of winning
राजनाथ सिंह (भाजपा), पूनम सिन्हा (गठबंधन) और प्रमोद कृष्णम (कांग्रेस) - फोटो : अमर उजाला

पहले आम चुनाव में नेहरू परिवार की बहन पं. विजयलक्ष्मी पंडित को जिताकर संसद में भेजने वाली लखनऊ संसदीय सीट की प्राथमिकता हमेशा बड़े और असरदार चेहरे रहे हैं। यहां न तो कभी पैसे की ताकत किसी को संसद में भेज पाई और न जातीय गुणाभाग से कोई नतीजा निकल पाया। यहां के मतदाताओं ने उन्हेें सांसद चुना जो संसद में लखनऊ की साख बढ़ा सकें। 

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शहर की आबोहवा में बौद्धिक जागरूकता भरी है। शायद यही वजह रही कि आजादी के पहले कांग्रेस के तीन राष्ट्रीय अधिवेशन का स्थल और जवाहर लाल नेहरू व महात्मा गांधी की पहली मुलाकात का चश्मदीद गवाह बना लखनऊ लंबे समय तक कांग्रेसी धारा के साथ कदमताल करते हुए चला। पर, जब कांग्रेस ने उस जमाने के एक बड़े पूंजीपति शराब निर्माता वेदरत्न मोहन (वीआर मोहन) को लखनऊ से संसद भेजने का तानाबाना बुना तो लखनऊ ने उसे झटका देते हुए साफतौर पर बता दिया कि साख से कोई समझौता स्वीकार नहीं है। तब लखनऊ ने काॅफी हाउस में बैठने वाले कुछ साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और वरिष्ठ पत्रकारों की तरफ से मैदान में उतारे गए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश व वरिष्ठ बैरिस्टर आनंद नारायण मुल्ला को जिताकर संसद भेज दिया।
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वर्ष 1991 में इस सीट पर अटल की जीत के साथ शुरू हुआ भाजपा की जीत का सिलसिला अब तक कायम है। इस बार भी भाजपा की जीत पर किसी को संशय नहीं है। लोगों की नजर बस इस पर है कि पिछली बार 2.72 लाख वोट से जीते राजनाथ की जीत का अंतर अबकी कितना रहेगा... उनको टक्कर कौन देगा?

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कांग्रेस का घर बना अटल का गढ़

लखनऊ में लगातार कांग्रेस का परचम फहराता रहा। पहली बार आपातकाल के बाद हुए चुनाव में अन्य स्थानों की तरह लखनऊ ने भी करवट ली और जनता पार्टी से हेमवती नंदन बहुगुणा जैसी शख्सियत को जिताकर भेज दिया। पर, अगले ही चुनाव में कांग्रेस ने यहां फिर कब्जा कर लिया। इंदिरा गांधी की रिश्तेदार शीला कौल सांसद हो गई। बोफोर्स तोप घोटाले की आंच में चली हवा में लखनऊ भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया। 1989 में भाजपा के सहयोग से जनता दल के मान्धाता सिंह जीते। इसी दौरान अयोध्या आंदोलन भी आकार ले रहा था। अगला चुनाव 1991 में हुआ तो जनसंघ के संशोधित प्रारूप भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी खड़े हुए और जीत गए। इसके बाद से तो अटल ने लखनऊ और लखनऊ ने अटल के लिए दिल ऐसा खोला कि दोनों एक-दूसरे के परिचायक बन गए। अटल लखनऊ से लगातार पांच बार जीते और कांग्रेस का घर माना जाने वाला लखनऊ अटल का गढ़ कहा जाने लगा।

न जाति का जोर, न धर्म का शोर
राजधानी में मुस्लिम मतदाता हमेशा प्रभावी संख्या में रहे। इस समय इनकी संख्या लगभग 4.50 लाख हैं। ब्राह्मण मतदाता भी इतनी ही संख्या में हैं। लगभग 4 लाख कायस्थ मतदाता हैं। यहां न तो अभिनेताओं का रंग जमा और न जाति व धर्म का गणित ही चल पाया। कायस्थ उम्मीदवार लाया गया, लेकिन कायस्थ मतदाता उसके साथ लामबंद नहीं हुए। मुस्लिम चेहरा लाया गया, लेकिन मुसलमानों का ध्रुवीकरण नहीं हो पाया। सुबह विकासनगर में पार्क में टहलने आए लोग हमेशा की तरह सियासी चर्चाओं में व्यस्त हैं। यादवजी नाम से मशहूर एक सज्जन कहते हैं, ‘प्रियंका यहां राजनाथ के खिलाफ लड़तीं तो मजा आता।’ जवाब देते हैं उन्हीं के बगल बैठे एक अन्य सज्जन, ‘यह अटल का गढ़ है। यहां न राहुल चलने वाले और न प्रियंका।’ एमएल गुप्त कहते हैं कि लखनऊ में विकास कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। अटल जी ने प्रधानमंत्री रहते लखनऊ को बहुत कुछ दिया, आज भी यहां भाजपा उन्हीं की बनाई बुनियाद पर खड़ी है।

‘अटल’ की छवि से कौन लड़ेगा?
मॉर्निंग वॉक पर निकले उच्च न्यायालय के वकील पूषण उपाध्याय से एनबीआरआई के पास मुलाकात होती है। चुनावी चर्चा शुरू होते ही कहते हैं, ‘नतीजा तो तय ही है। बस देखना यह है कि कितने वोटों से जीतेंगे?’ वजह पूछने पर कहते हैं, ‘अटलजी की विरासत। उनकी बोई फसल इस बार ही नहीं, अभी कई चुनाव में भाजपा काट सकती है। उनके साथ मौजूदा तीन-चार लोग उनकी हां में हां मिलाते हैं। जानकीपुरम में अपने दवाखाने पर बैठे डॉ. एमए वारसी कहते हैं कि अटलजी को लेकर हिंदू-मुसलमानों में कोई भेद नहीं था। यह लखनऊ के हर शख्स का सौभाग्य है कि अटल जी हमारे सांसद रहे। मैं यह नहीं कहता कि मुसलमान उन्हें पूरी तरह वोट देते थे। पर, उनके विरोध में वोट नहीं करते थे। अटल के साथ ही लखनऊ के मुसलमानों ने भाजपा को हराने के लिए वोट करना बंद कर दिया। लखनऊ का नतीजा तो तय ही है।

वोट मांगने तो कोई आया नहीं

कुर्सी रोड सब्जी मंडी के पास एक दुकान पर खड़े कारपेंटर शिवकुमार कहते हैं, भाजपा जीत तो जाएगी। पर, उनसे वोट मांगने कोई आया नहीं। दुकान पर कुछ सामान लेने आया एक नौजवान कहने लगा, ‘वोट मांगने की जरूरत ही क्या?‘ शिवकुमार ने दार्शनिक अंदाज में कहा, ‘पर, इसी में धोखा भी हो जाता है।’

बड़े चेहरों से बढ़ती है शान
पुराने लखनऊ में एक चिकित्सालय के संचालक डॉ. सलमान खालिद कहते हैं कि अटलजी के लखनऊ से चुनाव लड़ने के बाद यहां कभी ध्रुवीकरण पर चुनाव नहीं हुआ। इस बार भी नहीं होगा। भले ही लोग भरोसा न करें, लेकिन अटल को लखनऊ के कई मुस्लिम घरानों का वोट भी मिलता रहा। रही बात विकास की तो अटलजी ने कई काम कराए। पुराने लखनऊ की शक्ल बदलने के लिए उनके काम लखनऊ के लोग कभी भूलेंगे नहीं।

कांग्रेस में जान आ गई...
सआदतगंज मोड़ के पास मिल जाते हैं शाबान अली। कभी घर में तंबाकू का काम होता था। अब सिर्फ किसानी का ही भरोसा है। मोहान रोड पर जमीन है। चुनाव की चर्चा पर कहते हैं कि प्रियंका के आने से कांग्रेस में जान आ गई है। लखनऊ में भी चुनाव ठीक हो रहा है। बस प्रियंका थोड़ा और पहले आ गई होतीं तो उल्टी-सीधी बातें बोलने वाले भाजपाइयों की समझ में आ जाता। पर, कोई बात नहीं। अगले चुनाव में कांग्रेस ताकतवर हो जाएगी। कहते हैं कि राजनाथ से कोई विरोध नहीं लेकिन पार्टी ...और यह कहते हुए वह अचानक चुप्पी साध लेते हैं।

काम तो अखिलेश भैया ने किए
ठाकुरगंज में एक स्टेशनरी की दुकान पर तीन-चार लोग बैठे थे। चुनाव का माहौल पूछा तो बोले, अखिलेश भैया ने काफी काम किया। मेट्रो चलवा दी। लोहिया अस्पताल भी उन्हीं के परिवार की देन है। वोट के सवाल पर सभी लोग चुप्पी साध लेते हैं। रामप्रसाद नाम के एक उम्रदराज सज्जन कहते हैं, पहले की तरह काम कराना अब आसान नहीं है। राजनाथ तो ठीक हैं लेकिन अधिकारियों से बहुत परेशानी है। इससे ज्यादा वे कुछ बोलना नहीं चाहते।
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