फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Loksabha Election 2024: BSP could not win in Raebareli inspite of having dalit voters.

Raebareli: रायबरेली में नहीं चली बसपा की सोशल इंजीनियरिंग, सर्वाधिक बेस वोटर होने के बावजूद नहीं मिली जीत

Sat, 30 Mar 2024 01:16 PM IST
ishwar ashish आशीष दीक्षित, अमर उजाला, रायबरेली
आशीष दीक्षित, अमर उजाला, रायबरेली Published by: ishwar ashish Updated Sat, 30 Mar 2024 01:16 PM IST
सार

बसपा ने 2009 में दूसरा स्थान हासिल किया था जबकि 1996, 1998, 1999, 2004, 2014 में तीसरे स्थान पर रही। वहीं, सपा से गठबंधन के कारण 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था।

विज्ञापन
Loksabha Election 2024: BSP could not win in Raebareli inspite of having dalit voters.
- फोटो : amar ujala

विस्तार

सोशल इंजीनियरिंग से सत्ता के शिखर तक पहुंची बसपा रायबरेली सीट पर दम नहीं दिखा सकी। 34 फीसदी एससी, छह फीसदी मुस्लिम और 21 फीसदी अगड़ी जातियों के वोटर के बाद भी यहां का रण बहुजन समाज पार्टी के लिए चक्रव्यूह सरीखा है। असल में जिस जातीय समीकरण के बल पर बसपा ने 2007 में प्रदेश में सत्ता हासिल की और चर्चित लोकसभा सीटों पर धाक जमाई, वही रायबरेली के मैदान में साल दर साल पिछड़ती गई। यहां सबसे अधिक 34 फीसदी एससी वोटर निर्णायक होते हैं। जातीय समीकरण बसपा के लिए मुफीद भले हो, लेकिन यहां उसकी दाल नहीं गली।  

विज्ञापन


बेस वोटर को पक्ष में करने की चुनौती 
यूं तो बसपा के बेस वोटर दलित हैं। रायबरेली में इनकी संख्या भी सभी से अधिक है।इसके बाद भी बसपा का नहीं जीतना पार्टी रणनीतिकारों को अखरता है।   
- पार्टी का यहां जोर बेस वोटरों को जोड़ने की है। इसके लिए स्थानीय कैडर को भी सक्रिय किया जा रहा है। बसपा सुप्रीमो की पाती भी घर-घर पहुंचाई जा रही है। कोशिश बेस वोटरों को पार्टी से मजबूती से जोड़ने की है। सफलता कितनी मिलती है, यह तो वक्त बताएगा।  
विज्ञापन


ये भी पढ़ें - प्रचार का नया अंदाज: पार्टियों को सेलिब्रिटी ही नहीं, रील बनाने वालों की भी दरकार, 50 हजार से 50 लाख के पैकेज पर हो रहा काम
विज्ञापन
विज्ञापन


ये भी पढ़ें -  ... और समाचार के अगले बुलेटिन में बदल गए गोंडा के सांसद, 1962 के आम चुनाव का एक किस्सा


1991 में बसपा की उम्मीदों को लगे थे पंख
रायबरेली में सबसे पहले इंदिरा गांधी ने ब्राह्मण, मुस्लिम व दलित (बीएमडी) फार्मूला बनाया तो तीन जातियों का वोट कांग्रेस के पक्ष में जाता रहा। वर्ष 1989 में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने जब पिछड़ों को एक किया तो रायबरेली की सियासी तस्वीर बदल गई। 

- 1993 में जब सपा ने बसपा से हाथ मिलाया तो रायबरेली में लगने लगा कि एससी वोटर भी कांग्रेस से खिसक जाएगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस बीच 1995 में सपा और बसपा के बीच टूट हुई तो बसपा ने एकला चलने का फैसला किया। 1996 के आम चुनाव में पार्टी ने पहली बार प्रत्याशी उतारा। यह दौर भाजपा के उत्थान का था। बाबूलाल लोधी बसपा के टिकट से चुनाव मैदान में उतरे। उन्हें 24.80 फीसदी मत मिले। सपा को 26.90 फीसदी, जबकि भाजपा के अशोक सिंह ने  33.93 फीसदी मत के साथ जीत दर्ज की। 

- कांग्रेस ने इस चुनाव में प्रत्याशी नहीं उतारा था। 1998 के आम चुनाव में बसपा से रमेश कुमार मौर्य मैदान में उतरे और उन्हें 19.86 फीसदी मत मिले। वह तीसरे स्थान पर रहे। इस बार बसपा के मत प्रतिशत में 4.94 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 1999 में बसपा के आनंद प्रकाश लोधी को तीसरा स्थान मिला। 

- 1998 के आम चुनाव में बसपा से रमेश कुमार मौर्य मैदान में उतरे और उन्हें 19.86 फीसदी मत मिले। वह तीसरे स्थान पर रहे। इस बार बसपा के मत प्रतिशत में 4.94 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 1999 में बसपा के आनंद प्रकाश लोधी को तीसरा स्थान मिला। उन्हें 2.13 फीसदी मत मिले। इस बार मत प्रतिशत में करीब एक फीसदी बढ़ोत्तरी हुई।

बसपा का प्रदर्शन
वर्ष -- स्थान -- प्रतिशत
1996 -- तीसरा -- 24.80
1998 -- तीसरा -- 19.86
1999 -- तीसरा -- 20.13
2004 -- तीसरा  -- 08.94
2009 -- दूसरा -- 16.40
2014 -- तीसरा  -- 07.71 (2019 चुनाव नहीं लड़ा।)

सेंधमारी के चक्कर में गिरा ग्राफ
वर्ष 2004 में बसपा ने यादव वोट बैंक में सेंधमारी के लिए राजेश यादव पर दांव लगाया। हालांकि यह प्रयोग असफल रहा। पहली बार बसपा एक लाख से नीचे उतरकर 57,543 पर टिक गई। 

2009 जैसा प्रदर्शन नहीं दिखा
वर्ष 2009 में बसपा ने अब तक का सबसे जोरदार प्रदर्शन किया। यह वह समय था जब प्रदेश की सत्ता पर बसपा का शासन था और पार्टी ने 20 लोकसभा सीटें भी जीती थीं। बसपा प्रत्याशी आरएस कुशवाहा को 16.40 फीसदी मत मिले। वह दूसरे स्थान पर रहे। इस प्रदर्शन को बसपा अभी तक दोहरा नहीं सकी है। 


- वर्ष 2014 में बसपा से प्रवेश सिंह चुनाव लड़े और तीसरे स्थान पर पहुंच गए। उन्हें बस 7.71 फीसदी मत मिले थे। 2019 में सपा के साथ गठबंधन होने के कारण बसपा ने रायबरेली से प्रत्याशी नहीं उतारा। इसे लेकर सपा मुखिया अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती के बीच तल्खी भी दिखी थी।

मजबूत महावत की तलाश
2024 में पार्टी को प्रत्याशी को लेकर खासा मंथन करना पड़ रहा है। अभी नीले खेमे में खामोशी है। सभी की निगाह बसपा सुप्रीमो पर है। फिलहाल अभी तक किसी बड़े चेहरे ने दावेदारी नहीं पेश की है। यहां जिस तरह कांग्रेस और भाजपा ने पत्ते नहीं खोले हैं उसी तरह से बसपा का भी कार्ड बंद है। 

डलमऊ, सतांव, बछरावां रहा बेहतर 
आम चुनाव से इतर विधानसभा को देखें तो बसपा के लिए 1993 और 1996 सबसे सफल साल रहे। इन चुनावों में बसपा ने डलमऊ, सतांव और बछरावां में जीत दर्ज की।
- 1999 के लोकसभा चुनाव में डलमऊ विधानसभा क्षेत्र में बसपा प्रत्याशी आनंद प्रकाश लोधी को सबसे अधिक 42,932 वोट मिले थे। कांग्रेस प्रत्याशी सतीश शर्मा को 25,727 मत मिले थे। वह चौथे स्थान पर खिसक गए थे। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed