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गढ़ की तगड़ी घेराबंदी: राहुल को परिवार-बहन का सहारा, स्मृति को मोदी मैजिक-राष्ट्रवाद

Sat, 04 May 2019 09:12 AM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अमेठी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अमेठी Published by: Vikas Kumar Updated Sat, 04 May 2019 09:12 AM IST
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lok sabha elections 2019 in amethi rahul has support of family-sister smriti has modi magic
स्मृति ईरानी-राहुल गांधी - फोटो : Amar Ujala

अमेठी शहर के खुदरा व्यापारी विकास मिश्रा राहुल गांधी से बहुत नाराज हैं। कहते हैं कि पांच साल में राहुल कभी-कभार आए। अब तो चुनाव के दौरान भी अमेठी की याद नहीं आती। हालांकि विकास कहते हैं कि वह वोट राहुल को ही देंगे। कहते हैं अभी यह वीआईपी क्षेत्र है, राहुल हार गए तो अमेठी की पहचान खो जाएगी। वे अपनी हालिया मुंबई यात्रा का जिक्र करते हुए बताते हैं कि वापसी का रिजर्वेशन नहीं था। यूपी की सभी ट्रेनें भरी थीं।

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रिजर्वेशन विंडो पर बैठी महिला से अमेठी का टिकट मांगा तो उसने पूछा, राहुल गांधी की अमेठी? पांच मिनट में कन्फर्म टिकट मिल गया। गांधी परिवार का जुड़ाव न होता तो अमेठी की पहचान न होती। गांवों में लोगों को शौचालय मिले, उज्ज्वला योजना में गैस मिली, किसान योजना के तहत दो-दो हजार रुपये की दो किश्त मिल चुकी है। लोग कहते हैं कि इतना सब मोदीजी ने दिया लेकिन वोट राहुल गांधी को देने की बात कहते हैं।
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गांधी परिवार के चार सदस्य जीते: 
1980 के बाद एक बार छोड़कर यह सीट गांधी परिवार के पास रही है। पहले संजय गांधी सांसद चुने गए। उनके निधन के बाद राजीव गांधी। 1991 में राजीव के निधन के बाद उनके पारिवारिक मित्र सतीश शर्मा सांसद बने। शर्मा 1998 में भाजपा के संजय सिंह से 23 हजार वोट से हारे, लेकिन 1999 में सोनिया तीन लाख वोटों से यहां से जीतीं। 2004 में सोनिया ने अमेठी राहुल के हवाले कर दी। यही कारण है कि लोग खुद को गांधी परिवार से जुड़ा समझते हैं।
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थोरा गांव के बुजुर्ग रामबहादुर कहते हैं कि राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके गांव में भंडारा किया था, लेकिन उसके बाद से आज तक गांधी परिवार का कोई सदस्य नहीं आया। फिर भी गांव के लोग राहुल का समर्थन करते हैं। अमेठी के लोग मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई व मायावती के गांव बादलपुर का उदाहरण देते हैं।

कहते हैं सीएम बनने के बाद गांवों की कायापलट हो गई लेकिन रायबरेली और अमेठी वैसा विकसित नहीं हुआ। मोदी को हर जगह पसंद किया जाता है। यही वजह है पिछली बार राहुल जीते तो लेकिन जीत का अंतर पौने चार लाख से घटकर एक लाख रह गया था। भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी  2014 के बाद से लगातार अमेठी आती रहीं और जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़ी रहीं।

कांग्रेस का आरोप- अमेठी को नजरंदाज किया

गांधी परिवार से जुड़े किशोरी लाल शर्मा विकास के अभाव को नकारते हैं। कहते हैं कि विकास की अधिकतर योजनाएं राज्य सरकारें चलाती हैं। 1989 के बाद प्रदेश में कांग्रेस सरकार नहीं है। गैर-कांग्रेसी सरकारों ने जानबूझकर अमेठी को नजरअंदाज किया, चाहे बात जगदीशपुर इंडस्ट्रियल एरिया हो या सड़कों, नालियों और बिजली सप्लाई की। वे उन योजनाओं की फेहरिस्त दिखाते हैं जो यूपीए के समय स्वीकृत हुईं लेकिन 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से ठप हैं।

अमेठी की उपेक्षा के आरोपों पर कहते हैं, कोई भी अमेठी यात्रा का रिकॉर्ड निकाले। यदि राहुलजी की यात्राएं स्मृतिजी से कम निकलीं तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा। यदि मतदाताओं के मूड की बात करें तो भी राहुल की जीत स्पष्ट नजर नहीं आ रही है। इतने कड़े मुकाबले में मतदान के दिन कुछ भी हो सकता है। यदि राहुल यहां से जीत भी जाएं तो भी उनके लिए खतरे की घंटी बज चुकी है।

अमेठी बनाम वायनाड
स्मृति भारतीय नारी की छवि, ग्लैमर और केंद्रीय मंत्री के रुतबे का बखूबी इस्तेमाल करती हैं। उनके भाषणों में विकास का अभाव मुख्य बिंदु है। पूछती हैं कि यदि राहुल अमेठी को अपना परिवार कहते हैं तो इसकी बदहाली उन्हें क्यों नहीं दिखती? कहती हैं कि अमेठी में हार के डर से राहुल वायनाड से लड़ रहे हैं। शायद इसका ही असर है कि कांग्रेसी कहने लगे हैं कि दोनों जगह से जीतने की स्थिति में राहुल अमेठी सीट ही रखेंगे। कारण यह भी है कि वायनाड में चुनाव हो चुका है।

मोदी-स्मृति की लोकप्रियता और राहुल की जीत पर सवालिया निशान के चलते ही कांग्रेस की नवनियुक्त महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पूरे प्रदेश और देश की जगह अमेठी और रायबरेली में डट गई हैं। कभी रोड शो कर उपस्थिति दर्ज कराती हैं तो कभी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर बूथ स्तर के प्रबंधन का निरीक्षण करती हैं। उन्होंने यहां गांव-गांव में स्व-सहायता समूह बनाए हैं, जिनके जरिए चुपचाप प्रचार करती हैं। अमेठी के लोग भी प्रियंका से सीधे जुड़े हैं।

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