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राजभर व भाजपा दोनों के लिए रिश्ते तोड़ना नहीं आसान, वोट गणित में उलझा मामला
Wed, 10 Apr 2019 04:54 PM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Wed, 10 Apr 2019 04:54 PM IST
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कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर
- फोटो : amar ujala
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सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर भले ही आए दिन भाजपा से नाता तोड़ देने की चेतावनी दे रहे हों। भाजपा भी उनके रोज-रोज के बयानों से असहज महसूस कर रही हो, लेकिन फिलहाल दोनों के लिए रिश्ता तोड़ना आसान नहीं दिख रहा।
वोट के गणित में दोनों के रिश्तों के समीकरण उलझ गए हैं, जिन्हें चुनाव के दौरान सुलझाना फिलहाल बहुत आसान नजर नहीं आता। राजभर के सामने भी एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ खंदक जैसी स्थिति बन गई है।
दरअसल, चुनावी राजनीति में संदेशों का बड़ा महत्व होता है। चुनाव के वक्त यदि भाजपा राजभर को छोड़ती है तो उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। खास तौर से राजभर समाज के वोटों का। ओमप्रकाश राजभर भी यह जानते हैं, इसलिए वे भी दबाव बनाने में जुटे हैं। इससे उन्हें दो लाभ नजर आ रहे हैं।
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भाजपा ने उनके दबाव में कुछ और दे दिया तो ठीक, नहीं दिया तो भी राजभर समाज के बीच यह संदेश देने में सफल हो जाएंगे कि वह समझौता करके भाजपा के साथ नहीं हैं। राजभर यह भी जानते हैं कि विधानसभा चुनाव में उन्हें चार सीटों पर जीत इसलिए मिल पाई क्योंकि भाजपा का समर्थन था। इसलिए वह माहौल तो बना रहे हैं लेकिन भाजपा का साथ नहीं छोड़ना चाहते।
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वोट के गणित में दोनों के रिश्तों के समीकरण उलझ गए हैं, जिन्हें चुनाव के दौरान सुलझाना फिलहाल बहुत आसान नजर नहीं आता। राजभर के सामने भी एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ खंदक जैसी स्थिति बन गई है।
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दरअसल, चुनावी राजनीति में संदेशों का बड़ा महत्व होता है। चुनाव के वक्त यदि भाजपा राजभर को छोड़ती है तो उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। खास तौर से राजभर समाज के वोटों का। ओमप्रकाश राजभर भी यह जानते हैं, इसलिए वे भी दबाव बनाने में जुटे हैं। इससे उन्हें दो लाभ नजर आ रहे हैं।
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भाजपा ने उनके दबाव में कुछ और दे दिया तो ठीक, नहीं दिया तो भी राजभर समाज के बीच यह संदेश देने में सफल हो जाएंगे कि वह समझौता करके भाजपा के साथ नहीं हैं। राजभर यह भी जानते हैं कि विधानसभा चुनाव में उन्हें चार सीटों पर जीत इसलिए मिल पाई क्योंकि भाजपा का समर्थन था। इसलिए वह माहौल तो बना रहे हैं लेकिन भाजपा का साथ नहीं छोड़ना चाहते।
यह भी है वजह
पूर्वांचल में लोकसभा की करीब 26 ऐसी सीटें हैं, जहां राजभर बिरादरी की 50 हजार से लेकर दो लाख तक की आबादी है। सरकार में शामिल होने के बाद ओमप्रकाश राजभर ने इन क्षेत्रों में कम से कम अपनी इतनी हैसियत तो बना ही ली है कि उनकी आवाज पर सियासी नफा-नुकसान हो सकता है। भाजपा के रणनीतिकार राजभर की इस ताकत को समझते रहे हैं, इसलिए भी कोई रिस्क नहीं लेना चाहते।
कारण यह भी
राजभर को पता है कि भाजपा की बदौलत ही पहली बार उन्हें चार सीटों पर सफलता मिली। साथ ही भाजपा ने उन्हें प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाकर बिरादरी में सम्मान भी दिलाया है। यही नहीं, भाजपा ने हाल ही राजभर के बेटे अरविंद राजभर, खास सिपहसलार राना अजीत सिंह समेत 8 कार्यकर्ताओं को विभिन्न बोर्ड और निगमों में समायोजित कर बड़ा संदेश देने का प्रयास किया है।
इसलिए उन्हें भी यह चिंता सता रही है कि अगर भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो कहीं बिरादरी में गलत संदेश न चला जाए और पुत्र व मित्र ही नाराज न हो जाएं। सूत्र भी बताते हैं कि बेटा और उनके अन्य लोग फिलहाल पद छोड़ने के इच्छुक नहीं हैं।
सुभासपा के एक महासचिव समेत कुछ और लोग भी भाजपा से अलगाव नहीं चाहते। इनका मानना है कि यह वक्त संगठन को मजबूत करने का है न कि संघर्ष करने का।
कारण यह भी
राजभर को पता है कि भाजपा की बदौलत ही पहली बार उन्हें चार सीटों पर सफलता मिली। साथ ही भाजपा ने उन्हें प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाकर बिरादरी में सम्मान भी दिलाया है। यही नहीं, भाजपा ने हाल ही राजभर के बेटे अरविंद राजभर, खास सिपहसलार राना अजीत सिंह समेत 8 कार्यकर्ताओं को विभिन्न बोर्ड और निगमों में समायोजित कर बड़ा संदेश देने का प्रयास किया है।
इसलिए उन्हें भी यह चिंता सता रही है कि अगर भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो कहीं बिरादरी में गलत संदेश न चला जाए और पुत्र व मित्र ही नाराज न हो जाएं। सूत्र भी बताते हैं कि बेटा और उनके अन्य लोग फिलहाल पद छोड़ने के इच्छुक नहीं हैं।
सुभासपा के एक महासचिव समेत कुछ और लोग भी भाजपा से अलगाव नहीं चाहते। इनका मानना है कि यह वक्त संगठन को मजबूत करने का है न कि संघर्ष करने का।
सपा-बसपा गठबंधन भी वजह
भाजपा और सुभासपा के साथ बने रहने की एक वजह सपा-बसपा का गठबंधन भी है। सपा-बसपा गठबंधन बनने से भाजपा के लिए भी पिछड़ी जाति को अपने पाले में बनाए रखना जरूरी हो गया था।
इसलिए पिछड़ी जाति में शामिल राजभर बिरादरी को साधे रखने केलिए भी ओमप्रकाश राजभर का साथ भाजपा की मजबूरी है।
वहीं, राजभर भी चाहते हैं कि निषाद दल, अपना दल, महान दल जैसे दलों के नेताओं की तरह अपनी बिरादरी का मजबूत नेता बने रहना है तो भाजपा जैसी ताकतवर पार्टी के साथ बने रहने में ही भलाई है।
इसलिए पिछड़ी जाति में शामिल राजभर बिरादरी को साधे रखने केलिए भी ओमप्रकाश राजभर का साथ भाजपा की मजबूरी है।
वहीं, राजभर भी चाहते हैं कि निषाद दल, अपना दल, महान दल जैसे दलों के नेताओं की तरह अपनी बिरादरी का मजबूत नेता बने रहना है तो भाजपा जैसी ताकतवर पार्टी के साथ बने रहने में ही भलाई है।