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कुर्मी वोटों को होगा बंटवारा, मां-बेटी के सामने होगी खुद को वारिस साबित करने की चुनौती
Thu, 28 Mar 2019 12:42 AM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Thu, 28 Mar 2019 12:42 AM IST
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अनुप्रिया पटेल
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कुर्मी जाति की नेता के तौर पर राजनीति करने वाली अपना दल की अध्यक्ष कृष्णा पटेल और नवगठित अपना दल (सोनेलाल) की संरक्षक अनुप्रिया पटेल के लिए इस बार का लोकसभा चुनाव चुनौतियों भरा होगा। पहली बार मां-बेटी सजातीय वोटों की कसौटी पर होंगी।
2014 के लोस चुनाव में अपना दल एक था, इसलिए कुर्मी समाज भी एकजुट था। अब अपना दल दो हिस्सों में बंट गया है। एक हिस्से की कमान डॉ. सोनेलाल की पत्नी कृष्णा पटेल व बड़ी बेटी पल्लवी पटेल के हाथ में है तो दूसरे हिस्से की कमान दूसरी बेटी अनुप्रिया पटेल और दामाद आशीष पटेल के हाथ में। दोनों दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरेंगे। इसलिए कुर्मी समाज के मतदाताओं में भी बंटवारा होना तय है। मां-बेटी के बीच इस बात को लेकर भी जंग होनी तय है कि कुर्मी वोटों का वास्तविक वारिस कौन है।
कुर्मी समाज का नेता होने के दावे तो दोनों खेमे के हैं, लेकिन समाज के लोग दोनों के योगदान का आकलन करके ही फैसला करेंगे। कृष्णा पटेल तो समाज को यह बताकर सहानुभूति बटोरने का प्रयास करेंगी कि वह न तो सत्ता में थीं और न ही उनके पास कोई अधिकार ही था। वहीं, अनुप्रिया को यह साबित करना होगा कि केंद्र व प्रदेश की सत्ता की भागीदार होने के नाते उन्होंने समाज हित में कौन-कौन से कदम उठाए हैं।
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2014 के लोस चुनाव में अपना दल एक था, इसलिए कुर्मी समाज भी एकजुट था। अब अपना दल दो हिस्सों में बंट गया है। एक हिस्से की कमान डॉ. सोनेलाल की पत्नी कृष्णा पटेल व बड़ी बेटी पल्लवी पटेल के हाथ में है तो दूसरे हिस्से की कमान दूसरी बेटी अनुप्रिया पटेल और दामाद आशीष पटेल के हाथ में। दोनों दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरेंगे। इसलिए कुर्मी समाज के मतदाताओं में भी बंटवारा होना तय है। मां-बेटी के बीच इस बात को लेकर भी जंग होनी तय है कि कुर्मी वोटों का वास्तविक वारिस कौन है।
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कुर्मी समाज का नेता होने के दावे तो दोनों खेमे के हैं, लेकिन समाज के लोग दोनों के योगदान का आकलन करके ही फैसला करेंगे। कृष्णा पटेल तो समाज को यह बताकर सहानुभूति बटोरने का प्रयास करेंगी कि वह न तो सत्ता में थीं और न ही उनके पास कोई अधिकार ही था। वहीं, अनुप्रिया को यह साबित करना होगा कि केंद्र व प्रदेश की सत्ता की भागीदार होने के नाते उन्होंने समाज हित में कौन-कौन से कदम उठाए हैं।
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पिछड़ों में 7.64 प्रतिशत है कुर्मी समाज की संख्या
करीब 18 साल पहले यूपी की तत्कालीन राजनाथ सरकार की ओर से तैयार कराई गई सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में पिछड़ों की कुल संख्या करीब 54 प्रतिशत है। इसमें से सिर्फ कुर्मी समाज की संख्या 7.64 प्रतिशत है। इसमें सैंथवार, मल्ल व पटनवार भी शामिल हैं। वहीं, अपना दल की ओर से तैयार कराए गए आंकड़ों के मुताबिक कुर्मी समाज की संख्या 11.50 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।