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जीत के बावजूद अपना किला नहीं बचा सके सपाई

Sat, 24 Jan 2015 01:01 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 24 Jan 2015 01:01 AM IST
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Legislative Council Election in UP result analysis.

विधान परिषद चुनाव के नतीजों से साफ दिखाई दे रहा है कि सपा की किलेबंदी में सेंध लगी है। सपा के पाले में खड़े दलों, खास तौर से कांग्रेस व अन्य छोटे दलों तथा निर्दलीय विधायकों ने भी क्रॉस वोटिंग की है। आंकड़ों के लिहाज से बसपा को प्रथम वरीयता के अपने कोटे से ज्यादा वोट मिले हैं।

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इसलिए वह अपनी पीठ थपथपा सकती है, पर उसे भी झटका लगा है। रही बात भाजपा की तो कोटे से अधिक वोट मिलने के बावजूद नतीजों में सबसे बड़ा सबक उसके लिए ही है।

चुनाव के पहले हुए दावों व समीकरणों को आधार बनाएं तो सपा के 230 विधायकों में अस्वस्थ चल रहे वकार अहमद शाह, प्रेमप्रकाश सिंह और सदस्यता गंवाने वाले कप्तान सिंह राजपूत के बाद उसके 227 विधायक बचते हैं। कांग्रेस ने अपने 22 विधायकों का वोट सपा को देने का फैसला किया था।
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इसके अलावा निर्दलीय व अन्य छोटे दलों को मिलाकर सपा अपने पास लगभग 260 विधायकों के वोट होने का दावा कर रही थी। इनमें रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया, विनोद सरोज, विजय सिंह पुत्र प्रेम सिंह, रूबी प्रसाद, शहजिल इस्लाम, मनोज कुमार, पीस पार्टी के दो, कौमी एकता दल के दो सदस्यों सहित एक अन्य विधायक के वोट बताए जा रहे थे।
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सपा विधायक दल के मुख्य सचेतक अंबिका चौधरी यह दावा भी कर रहे थे कि उनके सभी प्रत्याशी पहली वरीयता के मतों से ही जीत जाएंगे।

नहीं मिले पूरे वोट, बसपा के साथ भी खेल

Legislative Council Election in UP result analysis.

सपा को प्राप्त दूसरे विधायकों व छोटे दलों के समर्थन को छोड़ भी दें तो सिर्फ कांग्रेस के 22 विधायकों को ही जोड़कर सपा के साथ खड़े विधायकों का आंकड़ा 249 पहुंच जाता है, पर सपा के खाते में प्रथम वरीयता के 245 मत ही आए।

साफ है कहीं न कहीं इन वोटों में भाजपा व बसपा की तरफ से सेंध लगी है। जिन पर सेंध लगी है वे सपा के हैं या कांग्रेस के हैं, यह खोजबीन का विषय है। इसके अलावा कुछ अन्य लोगों ने भी सपा से किया गया वादा तोड़ा है।

बसपा को लाभ, पर झटका भी : बसपा को अपने निर्धारित कोटे से ज्यादा वोट मिलना उसके नेताओं को स्वीकार्यता बढ़ने का दावा करने का मौका देता है, पर झटका उसे भी लगा है। उसके दो विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग करने का अंदेशा जताया जा रहा है।

बसपा के दावों तथा कांग्रेस व रालोद के समर्थन को आधार बनाएं तो बसपा को अपने 80 विधायकों के अलावा कांग्रेस के 6 और रालोद के 8 विधायकों के वोट मिलाकर कुल 94 वोट मिलने चाहिए थे, पर उसे प्रथम वरीयता के 101 वोट मिले।

इनमें नसीमुद्दीन सिद्दीकी को 35, धर्मवीर अशोक को 36 और प्रदीप जाटव को 30 वोट मिले। पीस पार्टी के मो. अय्यूब का वोट भी बसपा के खाते में जाने की बात सही मान लें तो भी 95 वोट ही बसपा को मिलने चाहिए थे, पर बताया जाता है कि बसपा की बैठक से गायब रहने वाले दो विधायकों बाला प्रसाद अवस्थी और छोटेलाल वर्मा के वोट बसपा के खाते में नहीं गए हैं।

बसपा उम्मीदवारों को मिले वोटों से इन दोनों के वोटों को निकाल दें तो आठ विधायकों ने बसपा के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की है।

भाजपा की खुली पोल

Legislative Council Election in UP result analysis.

भाजपा के पास अपने 41 विधायकों के अलावा अपना दल के एक विधायक को मिलाकर 42 वोट होते हैं, पर इस पार्टी के दोनों उम्मीदवारों को प्रथम वरीयता के 51 वोट मिले।

साफ है नौ और विधायकों के वोट पार्टी को मिले हैं। इस पर भाजपा अपनी पीठ थपथपा सकती है, पर नतीजों ने सिर्फ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश प्रभारी ओम माथुर के दूसरे दलों के विधायकों में भाजपा से जुड़ने के लिए भगदड़ जैसे दावों की पोल भी खोलकर रख दी।

साफ हो गया है कि इन दावों मे न कोई दम था और न कोई ठोस आधार। सपा सरकार के गिर जाने का दावा भी हवा-हवाई था।

भाजपा को समझना होगा कि लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा नेताओं की मेहनत से ज्यादा केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार की नीतियों से जनता में फैले गुस्से का परिणाम थे।

रणनीति की भद्द पिटी

Legislative Council Election in UP result analysis.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी भले ही यह दावा कर रहे हों कि पार्टी के 41 विधायकों के अलावा 10 और वोट भाजपा के खाते में आना दूसरे दलों के विधायकों में बेचैनी का सुबूत है। पर, इससे भाजपा को मिली नसीहत पर पर्दा नहीं पड़ सकता।

चुनाव में पराजय से भाजपा की रणनीति की भद्द पिटी है। यह साबित हो गया है कि भाजपा को लेकर किसी भी दल के विधायकों में बहुत ज्यादा आकर्षण नहीं है और न वे यह मान रहे हैं कि आगे उनकी चुनावी नैया भाजपा से ही पार हो सकती है।
 
हार के गम में दब गई ऐतिहासिक जीत की खुशी: भाजपा के दो उम्मीदवार लड़ाने के चलते हुई एक प्रत्याशी की हार ने विधान परिषद की कानपुर-उन्नाव स्नातक सीट पर मिली ऐतिहासिक जीत की खुशी को भी दबा दिया।

वर्ष 1956 के बाद पहली बार किसी पार्टी या उम्मीदवार ने कानपुर निवासी प्रदेश के चर्चित स्वरूप घराने का वर्चस्व तोड़कर कीर्तिमान बनाया है। भाजपा प्रत्याशी अरुण पाठक ने मानवेंद्र स्वरूप को न सिर्फ शिकस्त दी, बल्कि विधान परिषद में पार्टी के सदस्यों का आंकड़ा सात पर ही कायम रखा।

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