{"_id":"6793ec965ba9d7e82c0cfdb0","slug":"lack-of-means-of-transport-is-overshadowing-tourism-potential-shravasti-news-c-104-1-srv1002-109044-2025-01-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"Lucknow News: पर्यटन की संभावनाओं पर ग्रहण लगा रहा आवागमन के साधनों का अभाव","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Lucknow News: पर्यटन की संभावनाओं पर ग्रहण लगा रहा आवागमन के साधनों का अभाव
Sat, 25 Jan 2025 01:10 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
Updated Sat, 25 Jan 2025 01:10 AM IST
विज्ञापन
सेहलेवा जंगल के मध्य सोनप्रस्तरी आश्रम के पीछे का मनोरम दृश्य।
शांति स्वरूप पांडेय/श्रावस्ती। जिले में पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद इसके विकास की राह में आवागमन के संसाधन ग्रहण लगा रहे हैं। साधन न होने से तपोस्थली आने वाले पर्यटक कटरा से ही लौट जाते हैं। यहां विकास की योजनाएं बनीं तो पर धरातल पर नहीं उतरीं। इससे विकास की दौड़ में श्रावस्ती लगातार पिछड़ रहा है।
हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध व जैन धर्म की परंपराओं सहित प्राकृतिक संपदाएं सहेजे श्रावस्ती विकास की दौड़ में पिछड़ गया। इसकी वजह आवागमन के साधनों का अभाव है। बेहतर मार्ग होने के बावजूद साधन न होने से लोग चाह कर भी यहां न तो प्राकृतिक सौंदर्य के दर्शन कर पाते हैं और न ही सभी धर्म की परंपराएं सहेजने वाली श्रावस्ती के एक से दूसरे छोर तक पहुंच पाते हैं।
इन धर्मों के लोगों की यहां से जुड़ी है आस्था
बड़े पुरुष की मजार
गिलौला के दिकौली में सैयद सलार गाजी मसूद के ताऊ बड़े पुरुष की मजार है। जहां जेठ माह में लाखों की संख्या में विभिन्न जिलों व प्रांतों से लोग जियारत के लिए आते हैं। मान्यता है कि बिना यहां माथा टेके गाजी की दरगाह में हाजिरी पूरी नहीं होती।
विज्ञापन
बुद्ध की तपोस्थली
तथागत भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के सर्वाधिक 25 वर्षावास श्रावस्ती में बिताए। यहीं से दुनिया को शांति का संदेश भी दिया था। अंगुलिमाल स्तूप, गंध कुटि, जेतवन, सूर्य कुंड, आनंद बोधि व लोना चमारिन का कुआं सहित कई प्राचीन धरोहर यहां मौजूद हैं।
संभवनाथ स्तूप व मंदिर
श्रावस्ती को ही जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ की जन्मस्थली होने का गौरव प्राप्त है। यहां प्रतिवर्ष हजारों जैन धर्मावलंबी आते हैं।
सीताद्वार मंदिर
इकौना के टंडवा महंत स्थित सीताद्वार में मान्यता है कि प्रभु श्रीराम के परित्याग के बाद माता जानकी यहीं सीताद्वार झील किनारे स्थित महर्षि वाल्मीकि आश्रम में रुकी थीं। जहां लव-कुश का जन्म हुआ। लव-कुश ने यहीं भगवान श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा बांधा था।
स्वर्ण प्रस्तरी आश्रम
सिरसिया के सोहेलवा जंगल स्थित स्वर्ण प्रस्तरी आश्रम जिसे अब सोनपथरी के नाम से जाना जाता है। यह अगस्त मुनि का आश्रम हुआ करता था। आज भी यहां लोग खिचड़ी व नवरात्र पर विशेष रूप से जाते हैं। जो पर्यटन स्थल भी है।
विभूति नाथ व प्रघटनाथ महादेव मंदिर
सिरसिया के सोहेलवा जंगल किनारे स्थित विभूति नाथ मंदिर पांडव कालीन है। यहां शिवरात्रि, कजरी तीज व सावन मास में लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। वहीं भिनगा के संभारपुरवा स्थित प्रघटनाथ महादेव मंदिर को भी पांडव कालीन बताया जाता है। लेकिन यह पर्यटन व आस्था के क्षेत्र में निखर नहीं पाया है।
यह भी नहीं हुए काम
सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग को सेंचुरी घोषित कर बंगाल टाइगर के लिए रिजर्व किया गया था। जिसको अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। इकौना के सीताद्वार झील के उच्चीकरण की योजना अब तक परवान नहीं चढ़ी। वहीं भिनगा जंगल के भदिला ताल को पक्षी विहार के लिए विकसित करने की योजना तैयार की गई थी। इसके लिए पूर्व सरकार में दो करोड़ का बजट भी जारी किया गया था। सत्ता परिवर्तन के साथ ही यह योजना भी लटक गई।
मिले आवागमन के साधन तो निखरे श्रावस्ती
भिनगा निवासी पूर्व वनकर्मी राम अनुज मिश्र बताते हैं कि श्रावस्ती सभी धर्मों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। लेकिन आवागमन के साधन न होने से श्रावस्ती आने वाले पर्यटक वहां से लौट रहे हैं। पूर्व भूगोल प्रवक्ता केशव राम पांडेय का कहना है कि श्रावस्ती के सभी छोर पर किसी न किसी धर्म अथवा संप्रदाय का प्रमुख केंद्र मौजूद है। इसके साथ ही जिले के जंगल, शिवालिक पर्वत मालाएं व उनसे निकलने वाले झरने व पहाड़ी नाले भी लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। आवागमन के साधनों के अभाव में लोग इसकी जानकारी व दर्शन से वंचित हो जाते हैं।
विज्ञापन
हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध व जैन धर्म की परंपराओं सहित प्राकृतिक संपदाएं सहेजे श्रावस्ती विकास की दौड़ में पिछड़ गया। इसकी वजह आवागमन के साधनों का अभाव है। बेहतर मार्ग होने के बावजूद साधन न होने से लोग चाह कर भी यहां न तो प्राकृतिक सौंदर्य के दर्शन कर पाते हैं और न ही सभी धर्म की परंपराएं सहेजने वाली श्रावस्ती के एक से दूसरे छोर तक पहुंच पाते हैं।
विज्ञापन
इन धर्मों के लोगों की यहां से जुड़ी है आस्था
बड़े पुरुष की मजार
गिलौला के दिकौली में सैयद सलार गाजी मसूद के ताऊ बड़े पुरुष की मजार है। जहां जेठ माह में लाखों की संख्या में विभिन्न जिलों व प्रांतों से लोग जियारत के लिए आते हैं। मान्यता है कि बिना यहां माथा टेके गाजी की दरगाह में हाजिरी पूरी नहीं होती।
विज्ञापन
बुद्ध की तपोस्थली
तथागत भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के सर्वाधिक 25 वर्षावास श्रावस्ती में बिताए। यहीं से दुनिया को शांति का संदेश भी दिया था। अंगुलिमाल स्तूप, गंध कुटि, जेतवन, सूर्य कुंड, आनंद बोधि व लोना चमारिन का कुआं सहित कई प्राचीन धरोहर यहां मौजूद हैं।
संभवनाथ स्तूप व मंदिर
श्रावस्ती को ही जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ की जन्मस्थली होने का गौरव प्राप्त है। यहां प्रतिवर्ष हजारों जैन धर्मावलंबी आते हैं।
सीताद्वार मंदिर
इकौना के टंडवा महंत स्थित सीताद्वार में मान्यता है कि प्रभु श्रीराम के परित्याग के बाद माता जानकी यहीं सीताद्वार झील किनारे स्थित महर्षि वाल्मीकि आश्रम में रुकी थीं। जहां लव-कुश का जन्म हुआ। लव-कुश ने यहीं भगवान श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा बांधा था।
स्वर्ण प्रस्तरी आश्रम
सिरसिया के सोहेलवा जंगल स्थित स्वर्ण प्रस्तरी आश्रम जिसे अब सोनपथरी के नाम से जाना जाता है। यह अगस्त मुनि का आश्रम हुआ करता था। आज भी यहां लोग खिचड़ी व नवरात्र पर विशेष रूप से जाते हैं। जो पर्यटन स्थल भी है।
विभूति नाथ व प्रघटनाथ महादेव मंदिर
सिरसिया के सोहेलवा जंगल किनारे स्थित विभूति नाथ मंदिर पांडव कालीन है। यहां शिवरात्रि, कजरी तीज व सावन मास में लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। वहीं भिनगा के संभारपुरवा स्थित प्रघटनाथ महादेव मंदिर को भी पांडव कालीन बताया जाता है। लेकिन यह पर्यटन व आस्था के क्षेत्र में निखर नहीं पाया है।
यह भी नहीं हुए काम
सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग को सेंचुरी घोषित कर बंगाल टाइगर के लिए रिजर्व किया गया था। जिसको अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। इकौना के सीताद्वार झील के उच्चीकरण की योजना अब तक परवान नहीं चढ़ी। वहीं भिनगा जंगल के भदिला ताल को पक्षी विहार के लिए विकसित करने की योजना तैयार की गई थी। इसके लिए पूर्व सरकार में दो करोड़ का बजट भी जारी किया गया था। सत्ता परिवर्तन के साथ ही यह योजना भी लटक गई।
मिले आवागमन के साधन तो निखरे श्रावस्ती
भिनगा निवासी पूर्व वनकर्मी राम अनुज मिश्र बताते हैं कि श्रावस्ती सभी धर्मों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। लेकिन आवागमन के साधन न होने से श्रावस्ती आने वाले पर्यटक वहां से लौट रहे हैं। पूर्व भूगोल प्रवक्ता केशव राम पांडेय का कहना है कि श्रावस्ती के सभी छोर पर किसी न किसी धर्म अथवा संप्रदाय का प्रमुख केंद्र मौजूद है। इसके साथ ही जिले के जंगल, शिवालिक पर्वत मालाएं व उनसे निकलने वाले झरने व पहाड़ी नाले भी लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। आवागमन के साधनों के अभाव में लोग इसकी जानकारी व दर्शन से वंचित हो जाते हैं।