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मानवाधिकार दिवस आज: अवकाश से लेकर तकनीक तक हैं आपके अधिकार

Mon, 10 Dec 2018 03:36 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 10 Dec 2018 03:36 PM IST
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क्या आप जानते हैं कि मानवाधिकारों का वैश्विक घोषणापत्र दुनिया में सबसे ज्यादा अनुवाद किया गया दस्तावेज है? आपको अवकाश लेने का अधिकार है। अगर कोई तकनीक बाजार में आई है तो उसका उपयोग करना भी आपका अधिकार है। 
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10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र आमसभा ने इन मानवाधिकारों को सभी नागरिकों के लिए लागू करने की घोषणा की थी। इसे संयुक्त राष्ट्र ने ही हिंदी में मुहैया करवाया है। फिर भी हममें से बहुत से नागरिक मानवाधिकारों के बारे में पूरी तरह से नहीं जानते।
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इसकी दो वजहें हैं। पहला, कई दफा हमें अपने मूल अधिकार पाने के लिए ही सरकार से लेकर अदालतों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग के समक्ष आए मामले इसके गवाह हैं, जहां सरकार का सबसे ज्यादा दिखने वाला चेहरा, यानी पुलिस ही सबसे ज्यादा मानवाधिकारों का हनन कर रही है। दूसरा, मानवाधिकारों के प्रति जागरुकता के लिए कुछ खास कदम भी नहीं उठाए जा रहे।
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यहां जानिए अपने अधिकार

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डेमो
जानिए अपने अधिकार
सभी मनुष्य बराबर सम्मान और अधिकार रखते हैं।
जाति, वर्ण, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीति, विचारधारा, क्षेत्र, देश, संपत्ति जैसी चीजों के आधार पर मनुष्यों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता।
सभी को जीवन, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार है।
किसी को भी गुलाम नहीं बनाया जा सकता, शारीरिक यातना नहीं दी जा सकती।

कानून के सामने सभी नागरिक बराबर हैं।
सभी मनुष्यों को अपने कानूनी या मूल अधिकार के हनन पर अपने देश की अदालत से सहायता लेने का अधिकार है।
किसी भी नागरिक को बिना वजह पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकती।
किसी पर भी लगे आरोपों का निर्धारण अदालत द्वारा किया जाएगा।

जब तक अपराध सिद्ध न हो, व्यक्ति को निरपराध माना जाएगा।
सभी को एकांतता और परिजनों से संवाद करने का अधिकार है, इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
अपने देश से सताए जाने पर किसी भी व्यक्ति को दूसरे देश में शरण मांगने का अधिकार है, लेकिन अपराध करने पर यह अधिकार नहीं मिलेगा।

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किसी भी नागरिक को किसी भी देश की नागरिकता पाने का अधिकार है, किसी भी नागरिक को कोई देश अपनी नागरिकता से बेदखल नहीं कर सकता।
बालिग नागरिकों को अपने पसंद के साथी के साथ बिना किसी बाधा या भेदभाव विवाह करने का अधिकार है।
सभी को अपने विचारों और धर्म का पालन करने की आजादी है, इनका प्रचार भी कर सकता है।

इसी प्रकार अभिव्यक्ति और सूचनाओं का अधिकार है।
नागरिक किसी भी संस्था से जुड़ सकते हैं, लेकिन उन्हें जबर्दस्ती किसी संस्था से जोड़ा नहीं जा सकता।
हर नागरिक शासन प्रक्रिया में हिस्सा ले सकता है, सरकारी नौकरियां पा सकता है, चुनावों के जरिए अपना मत प्रकट कर सकता है।

बिना भेदभाव व्यवसाय करने, समान मजदूरी पाने का भी अधिकार इसमें शामिल है।
आपको छुट्टी मिलना व काम के निर्धारित घंटे होना भी आपका मानवाधिकार है।
विवाह या बगैर विवाह, जिस भी प्रकार बच्चे का जन्म हो, उसे समान सामाजिक अधिकार प्राप्त होंगे।

सभी नागरिकों को शिक्षा का अधिकार है, माता-पिता को अधिकार है कि वे अपने बच्चों को किस किस्म की शिक्षा दिलाना चाहते हैं।
यह भी सभी का मानवाधिकार है कि वे समाज और सांस्कृतिक धरोहरों, कलाओं और वैज्ञानिक विकास व सहूलियतों का आनंद ले।

...और ये हैं हालात 

65 प्रतिशत शिकायतें सिर्फ पुलिस के खिलाफ
राज्य मानवाधिकार आयोग में एक मार्च 2018 से छह दिसंबर 2018 तक 19,700 शिकायतें दर्ज की गई हैं। इनमें से 65 प्रतिशत शिकायतें सिर्फ पुलिस के खिलाफ हैं। इसके बाद भी पुलिस की गंभीरता का आलम मानवाधिकारों के लिए यह है कि आदेशों के अनुपालन की सूचना तक आयोग को नहीं दी जाती है। दो बार नोटिस के बाद भी पुलिस मुठभेड़ पर रिपोर्ट आयोग को नहीं मिल पाई है।

कैसे होगी मानवाधिकारों की रक्षा
राज्य मानवाधिकार आयोग में सिर्फ चेयरमैन का पद ही भरा हुआ है। इस पर जस्टिस रफत आलम को नियुक्त किया गया है। वहीं बाकी के दो सदस्य जस्टिस यूके धवन 19 जुलाई 2017 और आशा तिवारी 31 अक्तूबर 2018 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके बाद से दोनों की जगह नई नियुक्ति नहीं हुई है। चेयरमैन को ही नोएडा और लखनऊ दोनों बेंच में सुनवाई करनी होती है। ऐसे में शिकायतों के लंबित होने की संभावना भी बढ़ गई है। ऐसे में कैसे मानवाधिकारों की रक्षा होगी? प्रदेश सरकार इसके लिए कितनी गंभीर है, यह एक बड़ा सवाल है। 
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