कहीं आप भी तो सबकुछ 'परफेक्ट' होने की बीमारी से पीड़ित नहीं, पहचानें लक्षण व इन तरीकों से करें बचाव
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केस-1
कॉरपोरेट सेक्टर में अच्छे पद पर कार्यरत महिला (35) अचानक से चिड़चिड़ी, जिद्दी हो जाती है और पल-पल में आपा खोने लगती है। आए दिन पति से झगड़ा और बेटे को जरा-जरा सी बात पर पीटने लगती है। घर पर चीजें जरा सी इधर से उधर रख दी जाएं तो हंगामा शुरू कर देती है। एक दिन महिला के पेट में दर्द उठा। इसके बाद गेस्ट्रो में लंबा इलाज चला। अंतत: उसे क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट को रेफर कर दिया गया। केस स्टडी के बाद उसे ‘सुपरविमेन सिंड्रोम’ से पीड़ित पाया गया।
केस-2
शादी के बाद संबंध तक बन गए
रेलवे में नौकरी करने वाली 37 वर्षीय महिला के पति की आस्ट्रेलिया में अच्छी जॉब है। अचानक महिला में आक्रामकता बढ़ गई। पति से फोन पर झगड़े शुरू हो गए। बात यहां तक पहुंच गई कि उसके दूसरे से संबंध तक हो गए। इसके बाद ग्लानि हुई तो बेेटे का इलाज कर रही साइकोथेरेपिस्ट को सारा सच बताया। मामले के अध्ययन में सामने आया कि महिला सुपरविमेन सिंड्रोम की शिकार थी।
केस-3
नौकरी तक से निकाल दिया गया
कॉन्वेंट स्कूल की शिक्षिका (39), सौम्य व शांत थी। उसके व्यवहार में अचानक आए परिवर्तन को घर से लेकर स्कूल तक में महसूस किया जाने लगा। उसे सफाई की धुन चढ़ गई। यदि कोई न सुने तो वह आपा खो देतीं। वह स्कूल में बच्चों को पीटने लगी। इस कारण उसे नौकरी से हटा दिया गया। उसकी यह बीमारी ऑबसेसिव कंपल्सन डिसऑर्डर से सुपरविमेन सिंड्रोम के रूप में चिह्नित हुई
मनोचिकित्सक देते हैं ‘सुपरविमेन सिंड्रोम’ नाम
हालांकि, हर जिम्मेदारी को खुद पर ओढ़ लेना, खुद के लिए वक्त न दे पाना, बाहरी तामझाम के बीच खुद को कमतर आंकना या फिर दूसरों के जैसे होने की सोच और सबसे बढ़कर सबकुछ एकदम ‘परफेक्ट’ होने की चाह इन्हें मानसिक रूप से बीमार कर रही है। इसे मनोचिकित्सक ‘सुपरविमेन सिंड्रोम’ का नाम देते हैं।
60 प्रतिशत महिलाएं एक अपोडी में
केजीएमयू में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी बताते हैं कि हफ्ते में दो दिन ओपीडी में इस बीमारी के करीब 300 मरीज आते हैं। इसमें नए मरीजों की संख्या 30-40 होती है। इनमें 60 फीसदी महिला मरीज होती हैं। डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक, इस बीमारी की शुरुआत कॉमन न्यूरोटिक डिसऑर्डर से होती है, जो उचित इलाज न होने पर सुपरविमेन सिंड्रोम में बदल जाती है। उच्च मध्यम वर्ग की महिलाएं ज्यादा इसकी चपेट में हैं।
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रियंका जायसवाल कहती हैं कि रोजाना ओपीडी में 150 के करीब मरीज आते हैं, जिनमें से 70 महिलाएं होती हैं। 30-50 रेफर्ड केस होते हैं और नए केस 30-35 होते हैं। नए मरीजों में 50 फीसदी महिलाएं होती हैं। मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग की महिलाओं को यह सिंड्रोम ज्यादा शिकार बना रहा है।
समान होने की भेड़चाल से बढ़ी बीमारी
मल्टीटास्किंग की गलत परिभाषा ने बिगाड़ा खेल
साइकोथेरेपिस्ट और बीबीएयू में चीफ साइकोलॉजिकल काउंसलर डॉ. नेहा आनंद कहती हैं कि महिलाओं पर घर-परिवार-दफ्तर की जिम्मेदारी, सोसाइटी के साथ कदमताल की कोशिश के साथ कई जिम्मेदारियों की तलवार लटक रही है।
दरअसल, मल्टीटास्किंग की मांग में वे खुद को समय देना भूल गईं और ‘सुपरविमेन’ का कैप पहन लिया, जो उन्हें नुकसान पहुंचा रहा है। वर्किंग विमेन जहां अपनी पद, प्रतिष्ठा से बंधी हैं तो गृहिणियों का भी दायरा बढ़ा है। अधिक सामाजिक होने, सोशल मीडिया पर उपस्थिति उन्हें खुद की तुलना करने का मौका दे रही है। दूसरों की तरह होने को बनाने की होड़ उनके व्यवहार को बदल रही है। जनवरी से अब तक 10 ऐसे केस आ चुके हैं, जिनमें ये लक्षण पाए गए।
प्रो. आदर्श त्रिपाठी कहते हैं कि जिस तरह समानता की भेड़चाल है, उसमें महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। महिलाएं पुरुषों से खुद की तुलना कर रही हैं, जबकि यह भूल जाती हैं कि वह खुद सक्षम हैं। इसी भेड़चाल ने उन पर साठ गुना तक तनाव बढ़ा दिया है।
अपनाएं ये आदतें
- परफेक्शिनिस्ट बनने की चाह।
- सबकुछ खुद ही करना।
- कम्युनिटी एक्टिविटी के बावजूद खालीपन सा लगना।
- ठीक से नींद न आना।
- तर्क-वितर्क ज्यादा करना।
- चिड़चिड़ापन और गुस्सा।
- भूख ठीक से न लगना।
- खुद को कमतर आंकना और दूसरों जैसा बनने की कोशिश।
दिनचर्या में ये आदत अपनाएं
- खुद को समझाएं कि सबकुछ आप नहीं कर सकतीं।
- अपने लिए कुछ वक्त निकालें।
- दिन में या हफ्ते में एक दिन अपनी पसंद का काम करें।
- योग और ध्यान को रूटीन का हिस्सा बनाएं।
- अपने जॉब और हॉबी में अंतर करें।
- खुद का व्यवहार जब ज्यादा बदला सा दिखे, सोच निगेटिव लगे और काम में उत्साह खत्म होता जाए तो डॉक्टर से जरूर मिलें।