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उपचुनाव: कैराना में छिपी हैं विपक्षी महागठबंधन की संभावनाएं, पता चलेगी भाजपा विरोधियों की ताकत

Thu, 17 May 2018 09:37 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 17 May 2018 09:37 AM IST
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kairana to become a big test for opposition against BJP.

सत्तारूढ़ दल भाजपा से ज्यादा कैराना विपक्षी ताकत की कसौटी बन गया है। भले ही गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के नतीजे विपक्ष के पक्ष में रहे हों लेकिन बदली परिस्थितियों में कैराना का अलग ही महत्व है। इस सीट के उपचुनाव के जरिये पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भावी सियासी समीकरणों की न सिर्फ झलक देखने को मिलेगी बल्कि भाजपा विरोधी संभावित महागठबंधन की ताकत भी पता चलेगी।

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दरअसल, कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने विपक्ष को यह अहसास करा दिया है कि अलग-अलग रहकर भाजपा का मुकाबला नहीं किया जा सकता। इस लिहाज से कैराना में विपक्षी एकता की पहली परीक्षा होने जा रही है। वजह, कैराना के रूप में उप्र में काफी समय बाद भाजपा विरोधी दल एकजुट होकर उसके मुकाबले मैदान में उतरे हैं।
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गोरखपुर और फूलपुर सीटों के उपचुनाव या उससे पहले पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव और उससे भी पहले लोकसभा चुनाव में ऐसी परिस्थिति नहीं थी। पर, कैराना तक आते-आते हालात बदल चुके हैं। कर्नाटक में जिस तरह भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे ने संख्या में अधिक होते हुए भी विपक्ष की सत्ता की राह मुश्किल बनाई है, उसे देखते हुए भी प्रदेश में कैराना का चुनाव अधिक प्रासंगिक हो गया है।

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बसपा ने कराया अपनी ताकत का अहसास

kairana to become a big test for opposition against BJP.
बसपा सुप्रीमो मायावती।

पिछले लोकसभा चुनाव में सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद अलग-अलग लड़े। लोकसभा की 80 में 73 सीटें भाजपा गठबंधन के पक्ष में चली गई। बसपा का खाता नहीं खुला और चौधरी अजित सिंह अपने ही घर बागपत में हार गए। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में इससे सबक लिया और सपा के साथ मिलकर लड़ी। पर, बसपा और रालोद अलग ही रहे। भाजपा फिर भारी पड़ी।

बसपा ने इससे सबक लेकर गोरखपुर और फूलपुर में उपचुनाव के मौके को अपनी ताकत का अहसास कराने का अवसर बनाया। उसने सपा के समर्थन की घोषणा कर रणनीतिक रूप से यह संदेश देने की कोशिश की कि वह विपक्षी एकता और भाजपा की राह रोकने के लिए पुरानी दुश्मनी भूलने को भी तैयार है। वैसे, इसके पीछे उसकी मंशा कहीं न कहीं विपक्ष को भी अपनी ताकत का अहसास कराने की दिखी। उसने दिखाया कि हमारे बिना भाजपा से मुकाबला मुश्किल होगा।

इसलिए कैराना बना कसौटी

kairana to become a big test for opposition against BJP.

बसपा की रणनीति कामयाब रही। विपक्ष खासतौर से कांग्रेस तथा रालोद ने शायद उत्तर प्रदेश के इस राजनीतिक सच को समझा कि आज की परिस्थितियों में सपा और बसपा की ताकत को स्वीकार किए बिना न तो अस्तित्व बचेगा और न भाजपा से लड़ा जा सकेगा। शायद इसीलिए कैराना में सभी इस सच को आधार बनाकर ही आगे बढ़े।

बसपा ने भले ही कैराना पर अभी अपने पत्ते न खोले हों लेकिन यूपी की राजनीति में लंबे अर्से बाद कैराना उपचुनाव के रूप में भाजपा और संयुक्त विपक्ष के रूप में मुकाबला हो रहा है। यहां के नतीजों से साफ होगा कि संयुक्त विपक्ष और भाजपा में कौन ताकतवर है?

जाहिर है, 2019 में भाजपा बनाम विपक्षी दलों के बीच चुनावी समर की बिसात बहुत कुछ कैराना के नतीजों पर निर्भर होगी। रालोद जीता तो महागठबंधन की संभावनाएं मजबूत होंगी। भाजपा जीती तो ये संभावनाएं कमजोर हो जाएंगी।

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