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बेजान अंगों में जान फूंकेगा जेट रोबोटिक ट्रेनर
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चंद्रभान यादव
लखनऊ। हादसे के चलते बेजान होने वाले हाथ-पांवों में अब रोबोटिक जेट ट्रेनर जान फूंकेगा। वह चलना सिखाएगा और मालिश भी करेगा। प्रदेश में इसकी शुरुआत एसजीपीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर से होगी। रोबोटिक सर्जरी से उत्साहित पीजीआई प्रशासन इसकी तैयारी में जुट गया है।
एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में कई अत्याधुनिक व्यवस्थाएं हैं। यहां आने वाले ट्रॉमा के मरीजों को सर्जरी के तत्काल बाद फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन विभाग की सुविधाएं दी जाती हैं। एसजीपीजीआई में रोबोटिक सर्जरी शुरू होने के बाद केजीएमयू प्रशासन अन्य विभागों में भी इसे स्थापित करने की तैयारी में है। इसके तहत अब यहां रोबोटिक रिहैबिलिटेशन सेंटर बनेगा। प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसके लिए यहां रोबोटिक जेट ट्रेनर खरीदा जाएगा। इस पर करीब 10 करोड़ रुपये खर्च होंगे। यह मरीजों के हाथ-पैर चलाने, सुन्न नसों को फिर से सक्रिय करने के साथ सख्त मांसपेशियों को मुलायम बनाएगा। इसे अगले साल तक चालू करने की तैयारी है। अभी तक यह मुंबई और एम्स ऋषिकेश में स्थापित है।
यह होगा फायदा
फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन विभाग के डॉ. सिद्धार्थ बताते हैं कि ट्रॉमा के केस में मरीज काफी दिनों तक बेड पर रहते हैं। सर्जरी व इलाज पूरा होने के बाद उन्हें लंबे समय तक फिजियोथेरेपी सहित अन्य अभ्यास कराए जाते हैं। अमेरिका, जर्मनी सहित अन्य पश्चिमी देशों के ट्रॉमा सेंटर में रोबोटिक जेट ट्रेनर काफी कारगर साबित हुआ है। कई रिपोर्ट में इसकी सटीकता शत प्रतिशत पाई गई है। ऐसे में इसे यहां भी लाने की तैयारी है। यह पूरी तरह से ऑटोमेटिक होता है।
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ऐसे काम करता है रोबोटिक जेट ट्रेनर
डॉ. सिद्धार्थ के मुताबिक, स्पाइन सर्जरी के बाद कि सी व्यक्ति को चलने का अभ्यास कराना है तो उसे रोबोटिक जेट ट्रेनर के ढांचे में फिट कर दिया जाता है। फिर चिकित्सक रिमोट से रोबोटिक जेट ट्रेनर को चलाता है। रोबोटिक जेट ट्रेनर के सहारे मरीज का पैर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। उसकी नसों में जान आने लगती है। वह खड़े होने का समुचित संतुलन देता है।
अन्य फायदे
- यह ऑटोमेटिक होता है। किस मरीज को कितना तेज चलाना है और कितना धीमा, इसके रिमोट से सेट किया जा सकता है।
- किस पैर में ज्यादा जोर देना है और किस पर कम, इसे भी तय किया जा सकता है।
- चलते समय पैर को सपोर्ट देने के साथ ही मांसपेशियों की मसाज भी होती रहेगी।
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कार्डियक रोबोटिक सर्जरी की तैयारी
लखनऊ। एसजीपीजीआई में अब रोबोटिक कार्डियक सर्जरी की भी तैयारी है। राजधानी के मरीज में पहली कार्डियक रोबोटिक सर्जरी की जाएगी। करीब तीन माह में यहां 35 रोबोटिक सर्जरी हो चुकी है। इसमें 12 इंडोक्राइनोलॉजी और अन्य यूरोलॉजी विभाग में की गई है।
सीएमएस प्रो. अमित अग्रवाल ने बताया कि रोबोटिक सर्जरी वाले सभी मरीज स्वस्थ हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि जिस स्थान पर लेप्रोस्कोपिक सर्जरी नहीं हो पाती, उसमें भी रोबोटिक सर्जरी सफल है। इससे संक्रमण सहित कई तरह से खतरे कम हुए हैं। सर्जन की कलाई, कंधे, कोहनी एक निश्चित सीमा तक ही घूम सकते हैं, जबकि रोबोटिक आर्म्स 360 डिग्री घूम सकती है। वे मरीज के शरीर के ऐसे हिस्सों तक आसानी से पहुंच जाती है, जहां सर्जन के हाथ नहीं पहुंच पाते थे। रोबोटिक आर्म्स पांच मिमी जैसी छोटी सी जगह तक पहुंचकर भी मुश्किल सर्जरी को सफलतापूर्वक पूरा करती है। दूसरा सबसे अहम बात निशान न पड़ना होती है। थायरॉइड की सर्जरी में गले पर निशान न पड़े, इस पर खास ध्यान देना होता है। इसमें एक भी मरीज के गले पर निशान नहीं पड़ा है।
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लखनऊ। हादसे के चलते बेजान होने वाले हाथ-पांवों में अब रोबोटिक जेट ट्रेनर जान फूंकेगा। वह चलना सिखाएगा और मालिश भी करेगा। प्रदेश में इसकी शुरुआत एसजीपीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर से होगी। रोबोटिक सर्जरी से उत्साहित पीजीआई प्रशासन इसकी तैयारी में जुट गया है।
एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में कई अत्याधुनिक व्यवस्थाएं हैं। यहां आने वाले ट्रॉमा के मरीजों को सर्जरी के तत्काल बाद फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन विभाग की सुविधाएं दी जाती हैं। एसजीपीजीआई में रोबोटिक सर्जरी शुरू होने के बाद केजीएमयू प्रशासन अन्य विभागों में भी इसे स्थापित करने की तैयारी में है। इसके तहत अब यहां रोबोटिक रिहैबिलिटेशन सेंटर बनेगा। प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसके लिए यहां रोबोटिक जेट ट्रेनर खरीदा जाएगा। इस पर करीब 10 करोड़ रुपये खर्च होंगे। यह मरीजों के हाथ-पैर चलाने, सुन्न नसों को फिर से सक्रिय करने के साथ सख्त मांसपेशियों को मुलायम बनाएगा। इसे अगले साल तक चालू करने की तैयारी है। अभी तक यह मुंबई और एम्स ऋषिकेश में स्थापित है।
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यह होगा फायदा
फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन विभाग के डॉ. सिद्धार्थ बताते हैं कि ट्रॉमा के केस में मरीज काफी दिनों तक बेड पर रहते हैं। सर्जरी व इलाज पूरा होने के बाद उन्हें लंबे समय तक फिजियोथेरेपी सहित अन्य अभ्यास कराए जाते हैं। अमेरिका, जर्मनी सहित अन्य पश्चिमी देशों के ट्रॉमा सेंटर में रोबोटिक जेट ट्रेनर काफी कारगर साबित हुआ है। कई रिपोर्ट में इसकी सटीकता शत प्रतिशत पाई गई है। ऐसे में इसे यहां भी लाने की तैयारी है। यह पूरी तरह से ऑटोमेटिक होता है।
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ऐसे काम करता है रोबोटिक जेट ट्रेनर
डॉ. सिद्धार्थ के मुताबिक, स्पाइन सर्जरी के बाद कि सी व्यक्ति को चलने का अभ्यास कराना है तो उसे रोबोटिक जेट ट्रेनर के ढांचे में फिट कर दिया जाता है। फिर चिकित्सक रिमोट से रोबोटिक जेट ट्रेनर को चलाता है। रोबोटिक जेट ट्रेनर के सहारे मरीज का पैर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। उसकी नसों में जान आने लगती है। वह खड़े होने का समुचित संतुलन देता है।
अन्य फायदे
- यह ऑटोमेटिक होता है। किस मरीज को कितना तेज चलाना है और कितना धीमा, इसके रिमोट से सेट किया जा सकता है।
- किस पैर में ज्यादा जोर देना है और किस पर कम, इसे भी तय किया जा सकता है।
- चलते समय पैर को सपोर्ट देने के साथ ही मांसपेशियों की मसाज भी होती रहेगी।
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कार्डियक रोबोटिक सर्जरी की तैयारी
लखनऊ। एसजीपीजीआई में अब रोबोटिक कार्डियक सर्जरी की भी तैयारी है। राजधानी के मरीज में पहली कार्डियक रोबोटिक सर्जरी की जाएगी। करीब तीन माह में यहां 35 रोबोटिक सर्जरी हो चुकी है। इसमें 12 इंडोक्राइनोलॉजी और अन्य यूरोलॉजी विभाग में की गई है।
सीएमएस प्रो. अमित अग्रवाल ने बताया कि रोबोटिक सर्जरी वाले सभी मरीज स्वस्थ हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि जिस स्थान पर लेप्रोस्कोपिक सर्जरी नहीं हो पाती, उसमें भी रोबोटिक सर्जरी सफल है। इससे संक्रमण सहित कई तरह से खतरे कम हुए हैं। सर्जन की कलाई, कंधे, कोहनी एक निश्चित सीमा तक ही घूम सकते हैं, जबकि रोबोटिक आर्म्स 360 डिग्री घूम सकती है। वे मरीज के शरीर के ऐसे हिस्सों तक आसानी से पहुंच जाती है, जहां सर्जन के हाथ नहीं पहुंच पाते थे। रोबोटिक आर्म्स पांच मिमी जैसी छोटी सी जगह तक पहुंचकर भी मुश्किल सर्जरी को सफलतापूर्वक पूरा करती है। दूसरा सबसे अहम बात निशान न पड़ना होती है। थायरॉइड की सर्जरी में गले पर निशान न पड़े, इस पर खास ध्यान देना होता है। इसमें एक भी मरीज के गले पर निशान नहीं पड़ा है।