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लखनऊ पहुंचीं अभिनेत्री तापसी पन्नू, घरेलू हिंसा की समस्या को लेकर बातें साझा कीं

Sat, 29 Feb 2020 05:20 PM IST
ishwar ashish रोली खन्ना/अमर उजाला, लखनऊ
रोली खन्ना/अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sat, 29 Feb 2020 05:20 PM IST
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interview of actress taapsee pannu and director anubhav sinha by amar ujala
फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा और तापसी पन्नू - फोटो : अमर उजाला
 हाथ उठाने वाले हर पति से पत्नी को पूछना होगा कि ‘उसने थप्पड़ मारा कैसे और क्यों झेलें हम थप्पड़...।’ यह पूछा जाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह सवाल है हर औरत की अस्मिता का। यह कहना बॉलीवुड अभिनेत्री तापसी पन्नू का।
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वे घरेलू हिंसा के मुद्दे पर बनी फिल्म थप्पड़ में प्रमुख किरदार में हैं, शुक्रवार को फिल्म रिलीज के मौके पर वे राजधानी में थीं। गोमतीनगर स्थित एक होटल में अमर उजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने अपने किरदार, घरेलू हिंसा की समस्या को लेकर बातें साझा कीं। इस दौरान फिल्म के निर्देशक अनुभव सिन्हा भी मौजूद थे, उन्होंने फिल्म के विषय, इसके निर्माण और रिलीज के पहले के अनुभवों पर बातें की।
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देश की 80 फीसदी महिलाओं की कहानी है थप्पड़

interview of actress taapsee pannu and director anubhav sinha by amar ujala
तापसी पन्नू - फोटो : अमर उजाला

घरेलू हिंसा को आप कैसे परिभाषित करेंगी और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
पत्नी को मारा गया पहला थप्पड़ ही घरेलू हिंसा की शुरुआत है। पहली बार जब पति हाथ उठाए तो उसी वक्त उसका विरोध जरूरी है और जब ऐसा नहीं होता तब यह रोज की बात हो जाती है। यह मामला कानून का नहीं, इसीलिए फिल्म में कहीं भी कोर्ट रूम नहीं है। यह सवाल है रिश्तों का, क्योंकि रिश्ते टूटते हैं तो दर्द होता है। इसके लिए जिम्मेदार वो है जिसने हाथ उठाया, इसलिए उसे यह अहसास कराना होगा कि वह गलत है। यह महज एक फिल्म नहीं, इसमें कोई कहानी नहीं बल्कि यह देश की 80 फीसदी महिलाओं की कहानी है।

एक थप्पड़ पर घर छोड़ देने का फैसला कितना सही है?
एक परिवार में सब सामान्य चल रहा है। एक लड़की अपनी मर्जी से घरेलू जिंदगी चुनती है, क्योंकि वह अपने पति, अपने परिवार से बहुत प्यार करती है। जब उसे थप्पड़ पड़ता है तो उस वक्त उसे यह अहसास होता है कि ऐसे तो उसे हर बात में मारा जाता। वह यह स्वीकार करती है और फिल्म में एक जगह कहती भी है कि ‘शायद थोड़ी गलती मेरी भी है कि मैंने खुद को ऐसा बना दिया है कि थप्पड़ मारा जा सके।’ पर अब वह मानों नींद से जाग गई है, इसलिए वह पूछती है कि उसे मारा क्यों।

पर, लड़कियों को तो यही सिखाया जाता है कि बेडरूम की बातें बाहर ना आएं ?
बेडरूम में टूटते रिश्तों की कहानी फिल्म में बाहर नहीं आई, लेकिन रिश्तों की टूटन का दर्द सिर्फ पत्नी क्यों झेले। शादी में हम एक तो हो जाते हैं पर बराबर नहीं होते। यह फिल्म बराबरी की मांग करती है।

निर्देशक अनुभव सिन्हा बोले- यह फिल्म औरतों से ज्यादा पुरुषों के लिए

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला

मुझे उन्होंने पनौती कहा, मेरा बदला पूरा हो गया
रिजेक्श, स्ट्रगल और सक्सेस का जिक्र छिड़ा तो तापसी बोलीं, तीनों का अनुभव जरूरी है। एक वक्त था कि दक्षिण में मुझे बैडलक चार्म या पनौती का नाम दे दिया गया था। दरअसल मैंने खुद को कभी तोप समझा ही नहीं। मैंने स्वीकार किया कि मुझे एक्टिंग आती नहीं, इसे मैंने धीरे-धीरे सीखा। जब मुझे पनौती कहा गया तो बर्दाश्त नहीं हुआ और फिर मन ही मन कुछ तय कर लिया था, खैर मैंने बिना कुछ कहे, बिना शोर किए अपना बदला ले लिया, अब खुश हूं।

तुम बिन, दस, रा, मुल्क, आर्टिकल-15 और अब थप्पड़ जैसी फिल्म लेकर आए निर्देशक अनुभव सिन्हा कहते हैं कि यह फिल्म बचपन में अपने आसपास के अनुभवों से मिली सोच का नतीजा है। इस कहानी के पीछे कोई एक घटना, कोई एक व्यक्ति नहीं। दूसरे यह फिल्म महिलाओं से ज्यादा पुरुषों के लिए, महिलाएं क्यों नहीं पूछतीं कि क्यों मारा उन्हें। वे क्यों नहीं बतातीं कि उन्हें बर्दाश्त नहीं, जिस दिन ये सवाल उठने लगेंगे, थप्पड़ उठना बंद हो जाएगा।

अभी कल ही एक महिला मेरे पास आई। 26 साल पुरानी शादी है और रोते हुए बताया कि थप्पड़ उसके लिए आम हो गया है।  तापसी को लेने के बाबत अनुभव सिन्हा बोले, तापसी को मैंने नहीं चुना, रोल इसे खुद चुन लेते है या यूं कहें कि तापसी छीन लेती है रोल को।

17 बार रिजेक्ट किया गया हूं, आज भी पापुलर डायरेक्टर नहीं हूं मैं
रिजेक्शन और सक्सेस के बारे में पूछे जाने पर अनुभव सिन्हा ने कहा कि मैं 17 साल तक रिजेक्ट होता रहा हूं, क्रिटिक्स सेगमेंट में मानते हैं, लेकिन पापुलर सेगमेंट में तो आज तक मुझे स्वीकार नहीं किया। दो साल में 12-13 ट्रॉफियां जुटा लीं, रिव्यू अच्छे मिलते हैं, जल्दी ही पापुलर हो जाऊंगा।

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