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जैसे हम बर्गर खरीदकर खाते हैं वैसे ही विदेशों में लोग कथक सीखना चाहते हैं
Fri, 15 Mar 2019 12:46 AM IST
sahaj sahaj
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
Published by: sahaj sahaj
Updated Fri, 15 Mar 2019 12:46 AM IST
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काजल शर्मा
- फोटो : अमर उजाला
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जैसे लोग बर्गर खरीदते हैं, दाम चुकाते हैं, रैपर खोलकर और खाकर चल देते हैं। ठीक वैसे ही विदेशों में लोग अपने बच्चों को कथक सिखाना चाहते हैं। कथक की परंपरागत विद्या से न बच्चे सीखना चाहते हैं और न ही उनके अभिभावक। कथक में डांस सिखाने के लिए बच्चों को हमारे पास लाते हैं, किसी मूवी का उदाहरण देकर कहते हैं कि ऐसी परफॉर्मेंस बच्चे कितने दिनों में करने लगेंगे। अब जो अभिभावक पहले ही दिन से बच्चों को स्टेज पर लॉन्च करने की अपेक्षा करने लगे तो समझा जा सकता है कि कथक को लेकर वे कितने गंभीर है। करीब 22-25 सालों से यूनाइटेड किंगडम में लोगों को कथक सिखा रही पं. बिरजू महाराज की शिष्या काजल शर्मा ने बृहस्पतिवार को ‘अमर उजाला’ से विदेशों में कथक सिखाने के दौरान आने वाली दिक्कतों पर बात की। काजल की देखरेख में शुक्रवार को एसएनए में कथक के रंग की प्रस्तुति होगी।
विदेशों में वीकएंड में लगती है क्लास
वरिष्ठ कथक नृत्यांगना काजल ने बताया कि भारतीय बच्चे हर दिन दो घंटे की औसत से 50 से 60 घंटों की कथक नृत्य की शिक्षा एक महीने में पूरी करते हैं। वहीं, विदेशों में ऐसा नहीं हैं। वहां बच्चे वीकएंड में एक-सवा घंटे की क्लास लेते हैं। मतलब साल भर में 50-60 घंटे की कथक क्लास ले पाते हैं। ऐसे में उनसे कैसे कोई उम्मीद करे कि वो इंडियन कथक डांसरों से टक्कर ले लेंगे।
भारत से मंगाने पड़ते हैं घुंघरू, कॉस्ट्यूम
काजल ने बताया कि ब्रिटेन घातु के घुंघरूओं की खोज बड़ी कठिन है। इसलिए अक्सर घुंघरू और कथक नृत्य की कॉस्टयूम वगैरह उन्हें भारत से ही मंगाने पड़ते हैं। उन्होंने बताया कि 98 प्रतिशत युवतियां ही नृत्य सीखने आई। इनमें रिया, अंकिता (ब्रिटेन निवासी) भारत आ चुकी हैं जबकि उनके साथ काम कर रही अलका और डॉ. साधना भटनागर कथक को जानने व समझने और लिखने के लिए भारत आई हुई हैं।
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आगरा से यूके तक का सफर
मूल रूप से आगरा की रहने वाली काजल ने लखनऊ घराने के प्रसिद्ध कथक गुरु लच्छू महाराज और बिरजू महाराज से नृत्य की बारीकियां सीखीं। ग्वालियर घराने के पंडित गोपाल लक्ष्मण गुने से गायन भी सीखा। उप्र संगीत नाटक अकादमी से संगीत कला रत्न पुरस्कार पा चुकी काजल वर्तमान में इंग्लैंड में भारतीय नृत्य कला को प्रसारित कर रही हैं। अब तक अमेरिका, जापान, ग्रीस, रूस, जर्मनी देशों में नृत्य प्रस्तुति दे चुकी काजल दो रास्ते मूवी के गाने ‘बिंदिया चमकेगी...’ पर भारत में ही लगभग 300 से अधिक बार नृत्य कर चुकी हैं।
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विदेशों में वीकएंड में लगती है क्लास
वरिष्ठ कथक नृत्यांगना काजल ने बताया कि भारतीय बच्चे हर दिन दो घंटे की औसत से 50 से 60 घंटों की कथक नृत्य की शिक्षा एक महीने में पूरी करते हैं। वहीं, विदेशों में ऐसा नहीं हैं। वहां बच्चे वीकएंड में एक-सवा घंटे की क्लास लेते हैं। मतलब साल भर में 50-60 घंटे की कथक क्लास ले पाते हैं। ऐसे में उनसे कैसे कोई उम्मीद करे कि वो इंडियन कथक डांसरों से टक्कर ले लेंगे।
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भारत से मंगाने पड़ते हैं घुंघरू, कॉस्ट्यूम
काजल ने बताया कि ब्रिटेन घातु के घुंघरूओं की खोज बड़ी कठिन है। इसलिए अक्सर घुंघरू और कथक नृत्य की कॉस्टयूम वगैरह उन्हें भारत से ही मंगाने पड़ते हैं। उन्होंने बताया कि 98 प्रतिशत युवतियां ही नृत्य सीखने आई। इनमें रिया, अंकिता (ब्रिटेन निवासी) भारत आ चुकी हैं जबकि उनके साथ काम कर रही अलका और डॉ. साधना भटनागर कथक को जानने व समझने और लिखने के लिए भारत आई हुई हैं।
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आगरा से यूके तक का सफर
मूल रूप से आगरा की रहने वाली काजल ने लखनऊ घराने के प्रसिद्ध कथक गुरु लच्छू महाराज और बिरजू महाराज से नृत्य की बारीकियां सीखीं। ग्वालियर घराने के पंडित गोपाल लक्ष्मण गुने से गायन भी सीखा। उप्र संगीत नाटक अकादमी से संगीत कला रत्न पुरस्कार पा चुकी काजल वर्तमान में इंग्लैंड में भारतीय नृत्य कला को प्रसारित कर रही हैं। अब तक अमेरिका, जापान, ग्रीस, रूस, जर्मनी देशों में नृत्य प्रस्तुति दे चुकी काजल दो रास्ते मूवी के गाने ‘बिंदिया चमकेगी...’ पर भारत में ही लगभग 300 से अधिक बार नृत्य कर चुकी हैं।