इलाज न छोड़ें हीमोफीलिया के मरीज, रहे सतर्क, कोरोना काल में घर में लेते रहें थेरेपी
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पीजीआई की मेडिकल जेनेटिक्स विभागाध्यक्ष प्रो. शुभा फड़के ने बताया कि हीमोफीलिया के मरीजों में कोरोना का संक्रमण गंभीर होने का खतरा रहता है। हीमोफीलिया के मरीज सामान्य जीवन जी सकें, इसके लिए समय पर जांच, पर्याप्त इलाज और फिजियोथेरेपी बहुत जरूरी है, लेकिन बदली परिस्थितियों में यह संभव नहीं हो पा रहा है।
ऐसे में मरीजों को बेहद सतर्क रहनेे की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि फैक्टर रिप्लेसमेंट थेरेपी और फिजियोथेरेपी तक आसान पहुंच से हीमोफीलिया के मरीज, विशेषतौर पर बच्चे रक्त संबंधी इस जानलेवा विकार से लड़ सकते हैं। देश मेें हीमोफीलिया के करीब 20 हजार मरीज हैं, वहीं पीजीआई में पांच हजार मरीज पंजीकृत हैं।
जानिए, क्या है हीमोफीलिया
हीमोफीलिया आनुवंशिक बीमारी है। इसमें शरीर में खून का थक्का जमने की क्षमता खत्म हो जाती है। मरीज में खून सामान्य लोगों की तुलना में तेजी से नहीं बहता है, लेकिन ज्यादा देर तक बहता रहता है। उनके खून में थक्का जमाने वाले कारक (क्लोटिंग फैक्टर) पर्याप्त नहीं होते हैं।
क्लोटिंग फैक्टर खून में पाया जाने वाला एक प्रोटीन है, जो चोट लगने की स्थिति में खून को बहने से रोकता है। इस बीमारी में ज्यादा खून बहने से जान भी जा सकती है। यह दो प्रकार का होता है, पहला हीमोफीलिया ए और दूसरा हीमोफीलिया बी। हीमोफीलिया ए एक सामान्य प्रकार है।
इस बीमारी में मरीज के शरीर में क्लोटिंग फैक्टर-8 पर्याप्त नहीं होता है। वहीं हीमोफीलिया बी के मरीज ज्यादा नहीं पाए जाते। इसके मरीजों में फैक्टर-9 की पर्याप्त मात्रा नहीं होती है। हालांकि परिणाम दोनों ही स्थितियों में एक जैसा होता है और मरीज में चोट लगने की स्थिति में खून सामान्य से ज्यादा समय तक बहता रहता है।
पहचानें लक्षण
ये है इलाज
खून में जिस क्लॉटिंग फैक्टर की कमी होती है उसे सुई के जरिये खून में पहुंचाया जाता है। चोट की जगह पर पर्याप्त क्लॉटिंग फैक्टर पहुंचते ही खून बहना बंद हो जाता है। जल्द से जल्द इलाज से दर्द कम करने और जोड़ों, मांसपेशियों और अंगों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। हीमोफीलिया का इलाज नहीं किया जा सकता है, लेकिन उपचार के जरिये मरीज सामान्य जीवन जी सकता है। मरीज के शरीर में क्लॉटिंग फैक्टर रिप्लेसमेंट कराते रहना चाहिए, जिससे चोट या अन्य स्थिति में खून का थक्का जम सके।