केस रजिस्टर होने से पहले ही पारित कर दिया आदेश, IAS अफसर ललित वर्मा से न्यायिक कार्य छिना
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यूपी काडर के चर्चित आईएएस अधिकारी ललित वर्मा से राजस्व परिषद (सदस्य न्यायिक) से जुड़े सभी कार्य छीन लिए गए हैं। एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद राजस्व परिषद के चेयरमैन प्रवीर कुमार ने 1984 बैच के आईएएस अधिकारी वर्मा के खिलाफ यह कार्रवाई की है। वर्मा को मई 2014 में राजस्व परिषद में सदस्य न्यायिक बनाया गया था।
केस रजिस्टर होने से पहले पारित कर दिया आदेश
डॉ. ललित वर्मा ने 12 मई 2017 को राजस्व विवाद के एक मामले में वादी रामनरेश वर्मा की याचिका पर अंतरिम आदेश पारित किए, जबकि बोर्ड में यह मामला 15 मई को रजिस्टर किया गया था। ऐसे में सवाल उठा कि तीन दिन पहले ही अंतरिम आदेश कैसे दिए जा सकते हैं? इसे किसने डॉ. वर्मा के समक्ष सीधे रखा। वहीं मामले में पीड़ित पक्ष रामलाली ने एक शिकायत पहले से दाखिल की हुई थी, लेकिन डॉ. वर्मा के अंतरिम आदेशों की वजह से न इस पर सुनवाई हुई, न ही कभी विचार किया गया।
बोर्ड के समीक्षा अधिकारी प्रेमचंद्र रामाख्या से मंगवाए गए दस्तावेजों से सामने आया कि डॉ. ललित वर्मा ने अपनी न्यायिक शक्तियों से परे जाकर ऐसा किया। पूछे जाने पर डॉ. वर्मा ने हाईकोर्ट को बताया कि रामनरेश वर्मा 12 मई की दोपहर व्यक्तिगत रूप से उनके सामने उपस्थित हुए थे और अपने मामले को आकस्मिक बताते हुए निर्णय करने की मांग की। वादी का कहना था कि अगले दो दिन शनिवार और रविवार की वजह से उनके मामले की सुनवाई नहीं हो सकेगी।
डॉ. वर्मा ने उनसे मामले को सुना और अंतरिम आदेश जारी कर दिए। वहीं मामले के कागजात रजिस्ट्रार के पास भेजे जो सोमवार यानी 15 मई को पहुंचे और उसी दिन केस को रजिस्टर किया गया। उन्होंने मामले में अपनी ओर से कोई दुर्भावना न होने की बात कहते हुए हलफनामे में बिना शर्त माफी मांगी।
न्यायिक प्रक्रिया का पालन किए बिना कर रहे सुनवाई
राजस्व परिषद बार एसोसिएशन भी वर्मा पर आरोप लगाती रही है कि वह न्यायिक प्रक्रिया का बिना पालन किए ही वादों की सुनवाई कर रहे हैं। इससे न सिर्फ वादकारियों को न्याय मिलने में मुश्किल होती है, बल्कि राजस्व परिषद की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंच रहा है। बात इतनी बढ़ गई कि बार एसोसिएशन ने वर्मा की अदालत का बहिष्कार शुरू कर दिया। इस बीच एक वादकारी रामलाली अपने मामले में वर्मा के निर्णय को चुनौती देने इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गईं।
निर्धारित प्रक्रिया को ही फॉलो नहीं किया
सुनवाई के बाद जस्टिस राजन रॉय ने अपने निर्णय में कहा कि इस घटनाक्रम से पीड़ित पक्ष रामलाली का विश्वास राजस्व बोर्ड से हिल गया है। मौजूदा मामले में राजस्व बोर्ड की निर्धारित प्रक्रियाओं को ही फॉलो नहीं किया गया। डॉ. वर्मा के इस फैसले से परिषद की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाई गई है। बोर्ड में ताजा मामले दर्ज करने और उनकी सुनवाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया है। कोई भी मुकदमा करने वाला व्यक्ति रजिस्ट्रार या राजस्व बोर्ड अध्यक्ष के पास अपने वकील के जरिए अपना मामला रखता है।
उसे यह अनुमति नहीं है कि वह सीधे बोर्ड सदस्य से मिले और मामला रखे। न ही बोर्ड का कोई सदस्य मुकदमा करने वालों से संपर्क करता है। मौजूदा मामले में यही किया गया। डॉ. वर्मा का कहना है कि मामला आकस्मिक किस्म का था, लेकिन ऐसा वे साबित नहीं कर पाए। उनके जवाबी हलफनामे को हाईकोर्ट ने असंतोषजनक करार दिया।
गंभीर न्यायिक अनियमितता
हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक मामलों में पारदर्शिता सबसे अहम होती है। डॉ. वर्मा ने जो किया, वह एक राजस्व बोर्ड सदस्य को शोभा नहीं देता। वे खुद मुकदमेबाज से सीधे मिलते हैं और निर्णय कर देते हैं, यह एक गंभीर न्यायिक अनियमितता है।
गरीब किसानों के मन में संशय हुआ तो खत्म हो जाएगा राजस्व बोर्ड
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि डॉ. वर्मा से न्यायिक कार्य हटाए जाने का आदेश देने की यह वजह भी है कि इस तरह की न्यायिक गड़बड़ियां फिर से न दोहराई जाएं। बोर्ड की कार्यप्रणाली को गरीब किसानों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहिए। उनके मन में बोर्ड की ईमानदारी पर शक पैदा होने का अवसर नहीं देना चाहिए। अगर उनके मन में संशय पैदा होगा तो यह उन्हें उस घंटे की आवाज की तरह सुनाई देगा जो किसी के (मौजूदा मामले में राजस्व बोर्ड के) मरने पर बजाया जाता है। हाईकोर्ट ने 11 सितंबर को मामले की अगली सुनवाई रखते हुए अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता को सरकार से जानकारी लेकर आने को कहा है। वहीं बोर्ड चेयरमैन को भी अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी।
वर्मा की कार्यप्रणाली दूषित थी, दो महीने चला कार्य बहिष्कार
राजस्व परिषद बार एसोसिएशन के अध्यक्ष संतोष त्रिपाठी ने बताया कि वर्मा की कार्यप्रणाली दूषित रही है। वह बिना नोटिस तामील हुए, बिना रिकॉर्ड आए, अधिवक्ताओं की अनुपस्थिति में ही वाद सुनकर निर्णय देते रहे हैं। बार एसोसिएशन दो महीने से उनके कोर्ट का बहिष्कार कर रही थी। बोर्ड के चेयरमैन से कई बार लिखित व मौखिक शिकायत भी की गई।
उनके कोर्ट से वाद ट्रांसफर कराने के लिए तमाम आवेदन पड़े। 14 अगस्त को बार ने जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में कार्य न करने का प्रस्ताव किया था। बोर्ड की कोई अन्य अदालत नहीं बैठी, लेकिन वर्मा ने अपने चैंबर में बैठकर एक मामले में निर्णय दे दिया। वर्मा से न्यायिक कार्य ले लिए जाने से वादकारियों और वकीलों दोनों को ही राहत मिली है। वकील काम पर लौट आए हैं।
तीन साल से बोर्ड में तैनात हैं वर्मा
पिछली अखिलेश यादव सरकार में ललित वर्मा प्रमुख सचिव भाषा हुआ करते थे। मई 2014 में उन्हें राजस्व परिषद में सदस्य न्यायिक बनाया गया था। जानकार बताते हैं कि वर्मा के खिलाफ पूर्व में विजिलेंस जांच भी हो चुकी है। वह अपनी जन्मतिथि को लेकर भी चर्चा में रहे हैं। शायद इसी वजह से उन्हें लंबे अर्से से साइडलाइन की पोस्टिंग मिलती रही है। मामले पर सदस्य (न्यायिक )राजस्व परिषद डॉ. ललित वर्मा अस्वस्थ चल रहा हूं। ऑफिस कम जा पा रहा हूं। जिम्मेदारी हटाए जाने की जानकारी नहीं है। हो सकता है, अस्वस्थता की वजह से काम किसी और को सौंपा गया हो।