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यूपी के लोगों को कोसने वाली शीला कैसे जीतेंगी 'यूपी का रण'

Fri, 15 Jul 2016 01:51 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 15 Jul 2016 01:51 AM IST
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How sheela dikshit will be beneficial for congress in UP.
शीला दीक्षित - फोटो : file photo

कांग्रेस ने दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को यूपी में सीएम का भावी चेहरा घोषित कर भले ही ब्राह्मण कार्ड चल दिया हो, लेकिन सिर्फ इस कार्ड के सहारे प्रदेश में 27 वर्षों से सत्ता से दूर कांग्रेस की डगर बहुत आसान होती नहीं दिख रही है।

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इतना जरूर हो सकता है कि शीला की ससुराल की विरासत के सहारे कांग्रेस यूपी की लगभग 14 प्रतिशत ब्राह्मण आबादी के कुछ वोट अपने साथ जोड़कर जातीय गणित को थोड़ा अपने अनुकूल बना ले। प्रदेश में सियासत की फर्श पर खड़ी कांग्रेस को शीला का कार्ड अर्श पर पहुंचा देगा, यह फिलहाल आसान नहीं लग रहा है।
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राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि शीला के सहारे कांग्रेस यूपी की जातीय गुणा-भाग वाली सियासत में चुनाव के दौरान दूसरों की चिंता भले बढ़ा ले लेकिन सपा, भाजपा या बसपा जैसे दलों के सामने बेहतर विकल्प बनकर चुनौती खड़ी कर पाएगी, इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती।
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इनके मुताबिक शीला के नाम का दांव कांग्रेस के लिए उल्टा भी पड़ सकता है। दिल्ली में मुख्यमंत्री रहने के दौरान शीला पर घोटालों के जो दाग लगे हैं, उससे विरोधियों को कांग्रेस को घेरने का हथियार मिल जाएगा।

ब्राह्मणों का जुड़ पाना काफी मुश्किल

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जहां तक ब्राह्मणों के कांग्रेस के साथ जुड़ने का सवाल है तो सिर्फ शीला के नाम के सहारे यह संभव नहीं दिख रहा। सवाल यह है कि केंद्र में लगातार सत्ता में रही कांग्रेस ने ऐसा क्या किया जिससे ब्राह्मण उसे वोट दें।

यह बात अलग है कि उप्र में ब्राह्मण सपा से भी बहुत खुश नहीं है। पर, सिर्फ इसी एक समीकरण से लगभग दो दशक से कांग्रेस से दूर खड़ा ब्राह्मण उसके साथ जुड़ नहीं जाएगा।

राजनीतिक समीक्षकों के मुताबिक, वह जमाना चला गया जब नेहरू या इंदिरा गांधी, कमलापति त्रिपाठी जैसे नामों के कारण यूपी का ब्राह्मण कांग्रेस को वोट देता था। आज स्थिति काफी बदल चुकी है।

राजनीतिक रूप से सजग माना जाने वाला ब्राह्मण जब तक यह नहीं समझ लेगा कि यूपी में कांग्रेस सत्ता के करीब पहुंच सकती है तब तक वह उधर झुकने से रहा।

कांग्रेस नेता कह सकते हैं कि भाजपा भी ब्राह्मणों को बहुत तवज्जो नहीं दे रही है लेकिन उन्हें यह तथ्य स्वीकार करना होगा कि उसके ब्राह्मण नेताओं के मुकाबले भाजपा के कलराज मिश्र, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, डॉ. महेश शर्मा जैसे चेहरे न सिर्फ ज्यादा मुखर हैं बल्कि लगातार सक्रिय भी हैं।

कई विवादों से है नाता

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दिल्ली की सीएम रहते शीला दीक्षित पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे। उन पर राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान स्ट्रीट लाइट लगाने और 400 करोड़ के टैंकर घोटाले का आरोप है। दिल्ली पुलिस की एंटी करप्शन टीम इसकी जांच कर रही है।

निर्भया हत्याकांड के दौरान उन पर बतौर मुख्यमंत्री ढिलाई बरतने का आरोप है। चर्चित जेसिका लाल हत्याकांड के आरोपी मनु शर्मा को नियम विरुद्ध पैरोल पर छोड़ने के मामले में विवादित रह चुकी हैं।

‘बिहार और यूपी के लोग दिल्ली में अपराध करते हैं’ इस बयान को लेकर भी वह घिर चुकी हैं। ये दाग यूपी में चुनाव के दौरान भी पीछा नहीं छोड़ेंगे। खासतौर से भाजपा इन मामलों को लेकर शीला और कांग्रेस को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

उम्र 78 साल, पांच महीने में यूपी के 75 जिलों का भ्रमण

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शीला दीक्षित

शीला के पास यूपी में उमाशंकर दीक्षित के परिवार से जुड़े होने के अलावा कोई पूंजी नहीं है। यूपी में उनकी बहुत ज्यादा सक्रियता भी नहीं रही है। उनकी उम्र 78 साल है। यह भी बड़ा सवाल है कि चुनाव का बिगुल बजने में जब लगभग पांच महीने बचे हैं तो बुजुर्ग शीला यूपी के 75 जिलों का दौरा करके पार्टी को कितना सक्रिय कर पाएंगी।

स्व. राजेंद्र कुमारी वाजपेयी यूपी में कांग्रेस को बहुत ज्यादा सफलता नहीं दिला पाईं। एक अन्य नेता मोहसिना किदवई का यूपी के लोगों से शीला से ज्यादा संवाद है।

सवाल है, जो कांग्रेस सपा व बसपा के समर्थन के सहारे केंद्र में 10 साल सत्ता में रह चुकी है। जिस कांग्रेस ने इन दोनों पार्टियों की यूपी में सरकारों के दौरान हुई गड़बड़ियों पर चुप्पी साधे रखी। अब उसी कांग्रेस को शीला का नाम सपा और बसपा पर हमलावर होने की शक्ति कैसे प्रदान कर देगा।

वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि उप्र में शीला ब्राह्मणों को कितना आकर्षित कर पाएंगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। उल्टे कांग्रेस हाईकमान ने एक बार फिर लोगों को यह कहने का मौका दे दिया है कि पार्टी के पास यूपी में ऐसा कोई शख्स अब नहीं है जिसके सहारे वह सूबे की चुनौतियों से निपटने की उम्मीद कर सके।

क्षत्रिय वोट बैंक भी साधने की कोशिश पर संभावना कम है

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कांग्रेस ने शीला दीक्षित के साथ ही संजय सिंह को यूपी में प्रचार अभियान की जिम्मेदारी सौंपकर ब्राह्मण के साथ क्षत्रिय समीकरणों को साधने का संदेश दिया है। पर, इस प्रयोग से भी बहुत सफलता मिलने की संभावना नहीं दिख रही।

यूपी में सपा, बसपा और भाजपा के बीच फंसी कांग्रेस को निकालने के लिए जिन संजय पर पार्टी ने भरोसा जताया है, वे पारिवारिक विवादों में इतने उलझे हैं कि वह इस काम को शायद ही बहुत प्रभावी तरीके से कर पाएं।

गरिमा सिंह और अमिता का विवाद गले की फांस है ही। पुत्र अनंत विक्रम के साथ लड़ाई भी संजय सिंह के लिए कम समस्या नहीं है।
संजय जब सपा, बसपा और भाजपा के खिलाफ प्रचार युद्ध शुरू करेंगे तो विपक्षी उनके पारिवारिक विवादों को हवा देकर न सिर्फ उनके बल्कि कांग्रेस के लिए भी मुसीबत खड़ी करेंगे।

शीला की ऐसे हुई सियासत में इंट्री

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शीला दीक्षित व सोनिया गांधी - फोटो : amar ujala

शीला दीक्षित उन्नाव के ऊगू गांव के स्व. उमाशंकर दीक्षित की बहू हैं। विनोद दीक्षित से उनका विवाह हुआ था। इस नाते वह खुद को यूपी की बहू कह रही हैं। उमाशंकर दीक्षित की बहू होने के नाते निश्चित रूप से शीला के पास यूपी में एक बड़े राजनीतिक घराने की विरासत है।

उमाशंकर प्रदेश के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के बड़े और प्रभावी नेताओं में रहे हैं। उनका नाम यूपी के ब्राह्मणों के बीच आज भी काफी सम्मान से लिया जाता है। वह नेहरू के काफी निकट थे।

नेहरू ने गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ काम कर चुके दीक्षित को नवजीवन, नेशनल हेराल्ड और कौमी आवाज समाचार पत्र समूह का प्रबंध संपादक बनाया था। नेहरू जी के बाद वह इंदिरा गांधी के भी करीबी लोगों में रहे।

केंद्र में गृहमंत्री रहने के साथ अन्य विभागों के भी मंत्री रहे। उस दौरान शीला पर इंदिरा गांधी की नजर पड़ी। शीला अपने श्वसुर के कामकाज में हाथ बंटाती थीं। शीला ने युवक कांग्रेस को खड़ा करने में भी अहम भूमिका निभाई थी।

यूपी से चुनाव लड़ चुकी हैं शीला

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शीला दीक्षित के सीएम उम्मीदवार बनने पर कांग्रेसियों में हर्ष - फोटो : अमर उजाला

संयुक्त राष्ट्र संघ की महिला समिति में देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी शीला दीक्षित 1998 से 2013 तक लगातार 15 साल दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। वह यूपी से सांसद भी रही हैं।

कांग्रेस ने उन्हें 1984 में कन्नौज से लोकसभा का चुनाव लड़ाया जिसमें जीत कर वह सांसद बनी थीं। इसके बाद 1989 में वह फिर कन्नौज से चुनाव लड़ीं लेकिन हार गईं।

उसके बाद यूपी में अब वापसी की है। उन्होंने 1990-91 में कांग्रेस की तरफ से चले आंदोलनों में भी यूपी से भागीदारी की। गिरफ्तार होकर 23 दिन जेल में रहीं। उसके बाद उनकी यूपी में बहुत ज्यादा सक्रियता नहीं रही।

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