'जब तक जिंदा हूं, अपने चाहने वालों से मिलता रहूंगा'
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‘कोई ताजा हवा चली है अभी, दिल में इक लहर सी उठी है अभी, शोर बरपा है खाना-ए-दिल में, कोई दीवार सी गिरी है अभी, कुछ तो नाजुक मिजाज हैं हम भी और ये चोट भी नई है अभी’, ‘कतील जख्म सहूं और मुस्कुराता रहूं, बने हैं दायरे क्या क्या मेरे अमल के लिए’, ‘कैसी चली है अब के हवा तेरे शहर में, बंदे भी हो गए हैं खुदा तेरे शहर में..’ विख्यात गजल गायक गुलाम अली गाए जा रहे थे और लग रहा था जैसे अपने संगीत के जरिए अपनी बात कह रहे हों। उन्होंने कहा भी कि आज का मेरा कार्यक्रम मेरी मोहब्बत भरी दलील है।
अमर उजाला एमएसएमई कॉन्क्लेव-2015 में शनिवार को गुलाम अली का यह कार्यक्रम इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो गया था कि महाराष्ट्र में उनके दो आयोजनों के रद्द होने के बाद यहां आयोजन हुआ था। इसका असर उनकी प्रस्तुतियों पर नजर आ रहा था। गुलाम अली ने ताज विवान्ता होटल के खुले मैदान में अपनी कई लोकप्रिय गजलें सुनाईं।
लखनऊ के लिए उन्होंने कहा कि लखनऊ में उर्दू अदब को समझने वाले लोग हैं। यहां गाते हुए यह ध्यान रखना पड़ता है कि लफ्ज के मेयार को कैसे पेश किया जाए। अपने कार्यक्रम की शुरूआत कतील शिफाई की गजल ‘मेरी नजर से ना हो दूर एक पल के लिए’ सुनाने से पहले उन्होंने अहमद फराज की गजल के शेर भी सुनाए-‘तेरी बातें ही सुनाने आए, दोस्त भी दिल ही दुखाने आए’।
गला साथ नहीं देता पर, अंदाज लुभाता है
मालूम हो कि गुलाम अली की गजलों में शास्त्रीयता का गहरा पुट होता है। वे विख्यात शास्त्रीय गायक बड़े गुलाम अली खान के शिष्य हैं और पटियाला घराना की खूबियों को अपने गायन में आत्मसात करते हैं।
उनकी गायकी में जहां सरगम, अलाप, तान, मुरकी का खूब प्रयोग होता है और वे अपने गजलों की धुनें भी शास्त्रीय रागों पर आधारित करते हैं। शनिवार के कार्यक्रम में गायी गजलों में भी यह खूबी खूब दिखी।
हालांकि उनके कुछ प्रशंसकों को यह शिकायत हो सकती है कि इस दिसम्बर में 75 वर्ष के हो जाने वाले गुलाम अली का गला अब पहले की तरह बहुत साथ नहीं देता लेकिन उनका अन्दाज आज भी लोगों को मुग्ध करता रहता है।
वह कहते भी रहे हैं कि मैं अपने चाहने वालों के लिए गाता रहूंगा। उन्होंने कहा कि मैं जब तक जिंदा हूं, अपने चाहने वालों से मिलता रहूंगा, वे मुझसे मिलेंगे।
इन लोकप्रिय गजलों से कर दिया मंत्रमुग्ध
विख्यात गजल गायक ने श्रोताओं की फरमाइश पर अपनी लोकप्रिय गजलों का सिलसिला भी शुरू किया। उनकी ‘चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है’ गजल हसरत मोहानी की है जिनका लम्बा वक्त लखनऊ में बीता और निधन भी यहीं हुआ।
उनकी एक और गजल ‘हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह, सिर्फ एक बार मुलाकात का मौका दे दे’ कैसर उल जाफरी की गजल थी। नासिर काजमी की गजल ‘दिल में इक लहर सी उठी है अभी’ में लहर के प्रभाव को उन्होंने बहुत खूबसूरती से दिखाया।
जब उन्होंने लहर का प्रभाव दिखाने के लिए मन्द्र, मध्य और तार तीनों ही सप्तकों का प्रयोग किया तो श्रोताओं की तालियां गूंज उठीं।
कार्यक्रम की शुरूआत में मन्नू महाराज ने भी गजलें सुनाईं। तबले पर परवेज हुसैन, सितार पर मतलूब हुसैन, कीबोर्ड पर प्रवीन कुमार और गिटार पर शाहनवाज अहमद थे। नगर के युवा गायक कृष्णानन्द और कैलाश जोशी भी मंच पर गुलाम अली के साथ उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन मनीषा दुबे ने किया।