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किसानों के मुद्दे पर यूं ही नहीं सरकार से नाराज हैं 'बिग बॉस'

Fri, 13 Feb 2015 01:15 AM IST
राजेन्द्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
राजेन्द्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 13 Feb 2015 01:15 AM IST
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Govt has no money for Farmers says a report.

सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को समुचित मुआवजा देने में आनाकानी पर केंद्र सरकार पर यूं ही टिप्पणी नहीं की है। किसान हर कदम पर सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। उनके लाभ देने के नाम पर सरकारें कंगाल हो जाती हैं। उन्हें फसलों का वाजिब मूल्य और वक्त से बकाया भुगतान नहीं मिल पाता। जमीनों का उचित मुआवजा देने की मांग को लेकर कई जगह आंदोलन चल रहे हैं।

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भूमि अधिग्रहण के खिलाफ प्रदेश में कई बड़े आंदोलन हो चुके हैं। दादरी, टप्पल और भट्टा पारसौल समेत कई स्थानों पर पुलिस गोलीबारी में किसानों की मौतें हुई थीं। तमाम मामले अदालतों में लंबित हैं।
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सालों तक चलने वाली मुकदमेबाजी में कई बार प्राधिकरण, आवास विकास परिषद या अन्य सरकारी एजेंसियां मुआवजा राशि के बराबर धन खर्च कर देती हैं लेकिन किसानों को बढ़ा मुआवजा देने में उन्हें दिक्कत होती है।
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यमुना एक्सप्रेस-वे, आगरा एक्सप्रेस-वे, नोएडा, ग्रेटर नोएडा के विभिन्न प्रोजेक्ट समेत शहरों में आवासीय योजनाओं और विकास कार्यों के लिए भूमि की जरूरत होती है। इसके लिए किसान ही निशाना बनते हैं। सस्ती दरों पर उनकी जमीन लेने के लिए हथकंडे अपनाए जाते हैं।

भूमि अधिग्रहण कानून की अनदेखी

Govt has no money for Farmers says a report.

प्रदेश में भूमि लेते समय भूमि अधिग्रहण कानून-2013 के प्रावधानों पर अमल नहीं हो रहा। कानून के मुताबिक अधिग्रहीत भूमि के लिए शहरी क्षेत्र में सर्किल रेट से दोगुना और ग्रामीण क्षेत्रों में चार गुना मुआवजा देने की व्यवस्था है।

सरकारी एजेंसियां इसकी अनदेखी करते हुए किसानों से जमीन लेने के लिए करार (एग्रीमेंट) कर रही हैं। एग्रीमेंट में भी एकरूपता नहीं है। कोशिश रहती है कि किसानों को कम से कम लाभ मिले। उनके लिए खजाने से धन निकालने में एजेंसियां कंगालों जैसा व्यवहार करती हैं।

कई जगह संघर्ष कर रहे किसान
भूमि अधिग्रहण के खिलाफ कई जगह आंदोलन चल रहे हैं। कहीं किसान जमीन देने का विरोध कर रहे हैं तो कहीं ज्यादा मुआवजा मांग रहे हैं लेकिन सुनवाई नहीं हो रही। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस- वे के लिए जमीन देने के विरोध में और ज्यादा मुआवजे को लेकर फतेहाबाद और आसपास के किसान काफी समय से आंदोलन कर रहे हैं।

आगरा में ही इनर रिंग रोड के लिए अधिग्रहीत जमीन के बदले जमीन या सर्किल रेट से चार गुना मुआवजे की मांग को लेकर महुआ खेड़ा और अन्य गांवों में आंदोलन चल रहा है। अभिनेता संजय खान के थीम पार्क के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ भी आंदोलन हो रहा है।

न्यायपालिका को किसानों की चिंता, सरकारों को नहीं

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मामला चाहे गन्ने का हो, धान, गेहूं, आलू या अन्य फसलों का, इन्हें उपजाने वाले किसान हाशिये पर हैं। उपज का वाजिब दाम न मिलने और सालों तक बकाया भुगतान न होने से वे आर्थिक बोझ में दब रहे हैं। लागत बढ़ने के बावजूद प्रदेश सरकार ने लगातार तीसरे साल भी गन्ना मूल्य नहीं बढ़ाया।

पिछले साल के 653 करोड़ और इस साल के 3107 करोड़ को जोड़ लें तो चीनी मिलों पर किसानों का कुल बकाया 3760 रुपये है। धान किसानों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। सरकारें धान का वाजिब मूल्य तय नहीं कर पाईं। खरीद भी 25 लाख मीट्रिक टन के सापेक्ष 18 लाख मीट्रिक टन ही हो सकी। सरकारी नीतियों के चलते धान की फसल आने के वक्त बाजार मूल्य में गिरावट से भी किसानों को नुकसान हुआ।

इस पर लविवि के प्रोफेसर और योजना आयोग के सदस्य डॉ. सुधीर पंवार का कहना है कि किसानों के मुद्दे पर न्यायपालिका लगातार सरकारों पर टिप्पणी कर रही है। दिल्ली मेट्रो में भूमि अधिग्रहण मामलों में अदालत ने 93 फीसदी केस में किसानों के पक्ष में फैसला दिया।

राज्य सरकारों को गन्ना मूल्य तय करने का अधिकार भी सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने दिया। गन्ना मूल्य दिलाने के लिए हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसले किए लेकिन प्रशासनिक मशीनरी का इस तरफ ध्यान नहीं है। किसानों को अर्थव्यवस्था में उनका वाजिब हिस्सा नहीं मिला। सरकारों की प्राथमिकता इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर रहते हैं। किसानों के पक्ष में तो नीतियां भी नहीं बनतीं।

किसान के वोट हैं एजेंडे में, मुद्दे नहीं

Govt has no money for Farmers says a report.

वहीं इस पर हाथरस के पूर्व विधायक अनिल चौधरी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से प्रदेश व केंद्र सरकार को सबक लेना चाहिए। वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में अधिग्रहीत जमीन के लिए किसानों को सर्किल रेट से चार गुना मुआवजा देने का प्रावधान है।

इस दर से मुआवजा देने के बजाय किसानों से सस्ती दरों पर जमीन के करार कराए जा रहे हैं। आगरा में इन रिंग रोड, आगरा एक्सप्रेस- वे में यही हो रहा है। यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी, नोएडा, ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी अपनी बोर्ड बैठक में क्षेत्रवार रेट तय करते हैं।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वीएम सिंह का कहना है कि कहने को देश कृषि प्रधान है लेकिन किसानों के दर्द का किसी को एहसास नहीं है। राजनीतिक दलों, सरकारों के एजेंडे में किसानों के वोट हैं, उनके मुद्दे नहीं।

भूमि अधिग्रहण, गन्ना, धान आदि को लेकर अदालतों ने फैसले न सुनाए होते तो किसान खत्म हो गए होते। भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन इसीलिए किया गया है कि सरकार बिना सहमति के उनकी जमीन लेकर पूंजीपतियों को सौंप सके। इसके खिलाफ 24 फरवरी को जंतर-मंतर पर धरना दिया जाएगा।

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