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बिग बी की जमीन पर ये किसका साया?

Sat, 11 Jan 2014 10:54 AM IST
नरेंद्र मिश्र/अमर उजाला, लखनऊ
नरेंद्र मिश्र/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 11 Jan 2014 10:54 AM IST
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fruitbelt covers with Big B plots

सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को दशहरी आमों के हरे बागान वाला काकोरी इलाका इतना भाया कि उन्होंने यहां के मुजफ्फरपुर गांव में अपनी जमीन खरीद ली।

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उन्होंने अपने फार्म हाउस में खेती के साथ दशहरी आम के बागान तैयार करने का सपना देखा। इस बात के अभी दस साल भी नहीं बीते थे कि उनके खेतों के अगल- बगल प्लॉटिंग की फसल काटी जाने लगी।
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यहां के हालात यह हो गए हैं, कि बिग-बी की जमीन के आसपास के किसानों को रीयल एस्टेट कंपनियां मुंहमांगी रकम देकर बागान व जमीनें खरीदने लगीं हैं।

यही नहीं यहां बागों व खेतों की जमीन पर की जा रही प्लॉटिंग करने वाली कंपनियां अपने प्रोजेक्ट के नाम भी अमिताभ बच्चन की फिल्में बागबां, कर्मा, धर्मा जैसे रख रही हैं।
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रीयल एस्टेट कंपनियां यहां अमिताभ बच्चन की जमीन के आसपास प्लॉट दिए जाने का दावा करते हुए दोगुने रेट में प्लॉट बेचने से नहीं चूक रहे हैं।

हाईकोर्ट से आम के पेड़ों को काटे जाने व फलपट्टी क्षेत्र में प्लॉटिंग पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद अमर उजाला टीम ने फलपट्टी के प्रमुख गांवों में उजड़े गए बागानों का हाल देखा।

जहां बागानों को अब लगाना तो दूर रीयल एस्टेट की फसल लेने के लिए हर दिन बचे बागानों को भी उजाड़ा जा रहा है।

सात साल में 700 हेक्टेयर घटा रकबा
काकोरी ब्लॉक में फलपट्टी का रकबा 2316 हेक्टेयर दर्ज है। लेकिन मुख्य सड़कों से जुड़े संपर्क मार्गों पर इक्कादुक्का ही आम के बागान दिखाई देते हैं। पुराने बागानों के अधिकतर आम के पेड़ नदारद होते जा रहे हैं।

अधिकतर बागानों में पेड़ समाप्त करने के बाद प्लाटिंग की जा रही है। जिससे बागानों का रकबा कागजों पर कुछ और, मौके पर कुछ और है।

माना जा रहा है कि रीयल एस्टेट कंपनियां फलपट्टी में हर साल करीब 100 हेक्टेयर जमीनों पर कंक्रीट जंगल खडे़ किए जा रहे हैं। इस प्रकार बीते सात साल में करीब 700 हेक्टेयर फलपट्टी क्षेत्र मौके पर कम हो गया है।

अपनों ने ही मारा, गैरों में कहां दम था
दशहरी आम जिस तरह अपने नायाब स्वाद के लिए जाना जाता है, उसी तरह यहां के गांव मोहक हरियाली के लिए प्रसिद्ध थे। फलपट्टी के बागानों में आने वाले सैलानी कई-कई दिन बिताते थे।

89 वर्षीय बांके मियां कहते हैं कि बागानों के बीच के रहने वाले लोग अपने गांवों को जन्नत से कम नहीं मानते थे। लेकिन समय बदला और तेजी से शहर बढ़ा और एक के बाद एक गांव में बागान खत्म कर मकान बनाने के काम ने जोर पकड़ लिया।

अब तो जमीनों की कीमतें यहां 80 से 90 लाख रुपये बीघा पहुंच गई। फिर क्या था छोटे बड़े बागबानों ही अपने बागानों के दुश्मन बन बैठे।

मोहान बाईपास के संपर्क मार्ग बने हब
लखनऊ कानपुर रोड़ से बाया हरदोई रोड़ होकर सीतापुर राजमार्ग को जोड़ने वाले मोहान बाईपास बनने के बाद फलपट्टी पर मानो वज्रपात शुरू हो गया।

बाईपास से फलपट्टी की ओर जाने वाले सभी संपर्क मार्गों पर रीयल एस्टेट कंपनियों ने प्लॉटिंग का काम शुरू कर दिया। जिसमें प्रमुख रूप से मुजफ्फरपुर, सैदपुर, सैरपुरधरी, पहिया, आजमपुर, बिगुहा, अमेठिया, सलेमपुर, जमालनगर, अतिरिक्ट टाउन एरिया गांव, चिलौली, मुबारकपुर गांवों के रोड से जुडे बागान लगभग समाप्त हो चुके हैं।

300 एकड़ में हो रही प्लॉटिंग
मोहान बाईपास और हरदोई रोड़ के बीच वाले क्षेत्र में गांवों बागानों का रकबा करीब 300 एकड़ कम हो गया है। यहां अधिसंख्य बड़े बागानों में प्लॉटिंग कर दी गई है।

मौजूदा समय में यहां 50 से अधिक रीयल एस्टेट कंपनियां काम कर रही हैं। जो बागों के बीच से पक्की सड़कें बनाने के साथ ही प्लॉटों की बाउंड्रीवाल बनवाकर खरीदारों को कब्जा देने का दावा करती हैं।


फलपट्टी के प्रतिबंध बेअसर
फलपट्टी क्षेत्र के गांवों में आबादी भूमि के अलावा निर्माण कार्य किए जाने पर भी प्रतिबंध का प्रावधान है।

पर इन सभी प्रतिबंधों से बेखबर रीयल एस्टेट कंपनियां यहां धडल्ले से निर्माण कार्य करवाए जाने के साथ ही बड़े वाटर पंप भी लगवाए जा रहे हैं।

लाखों में खरीदी जमीन, करोड़ों में बेची
फलपट्टी क्षेत्र में खाली जमीन को रीयल एस्टेट कंपनियां 80 से 90 लाख रुपये बीघा की दर से खरीद रही हैं। जबकि आम के बागानों वाली जमीन का कंपनियां पहले एग्रमेंट करती हैं।

उसके बाद किसान के माध्यम से ही बाग के पेड़ों की कटान का परमिट लेकर जमीन खाली करवाते हैं, उसके बाद जमीन की रजिस्ट्री कृषि भूमि के तौर पर करवाते हैं।

बागान किसान पुत्तन ने बताया कि बाग वाली जमीन रेट से करीब 10 लाख रुपये बीघा कम में बिकती है। जबकि कंपनियां यहां 1200 से 1500 रुपये स्क्वायर फीट दर से प्लॉट बेच रही हैं।

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