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...तो ऐसे होता है मेडिकल कॉलेजों में फर्जीवाड़ा
ज्ञान सक्सेना/लखनऊ
Updated Wed, 02 Oct 2013 11:36 AM IST
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दो दशक पहले बतौर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री रशीद मसूद ने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश दिलाने के पर जो फर्जीवाड़ा किया, उसकी सजा उन्हें मंगलवार को मिली लेकिन रोज ही ऐसे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
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कुकुरमुत्तों की तरह खुले निजी मेडिकल व डेंटल कॉलेज प्रवेश के नाम अनाप-शनाप फीस वसूल रहे हैं। वह भी बाकायदा पैकेज में।
निजी क्षेत्र में संचालित मेडिकल व डेंटल कॉलेज संचालक मनमाने तरीके से प्रवेश लेने के इच्छुक लोगों से मोटी रकम वसूल रहे हैं।
यह तब है जब शासन ने डोनेशन पर पाबंदी लगा रखी है। निजी कॉलेजों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है। अब डोनेशन की राशि भी गुपचुप तरीके से कैपीटेशन फीस की आड़ में धड़ल्ले से वसूली जा रही है।
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जो अभिभावक एकमुश्त पैसा देने में असमर्थता जताता है, उसके बच्चे को प्रवेश न देने की धमकी दी जाती है। मजबूरन अभिभावक निजी डेंटल कॉलेजों में 12 से 15 लाख और मेडिकल कॉलेजों में 27 से 35 लाख रुपये तक एकमुश्त फीस जमा कराने को मजबूर हैं।
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कायदे-कानूनों का अक्षरश
पालन करने का दावा करने वाले निजी मेडिकल व डेंटल कॉलेजों की हकीकत बिल्कुल जुदा है। न्यायालय व शासन दोनों ही स्तरों पर फीस वार्षिक आधार पर ही वसूलने का निर्देश है।
इस संबंध में शासन की तरफ से गठित सरीन कमेटी की शुल्क निर्धारण संबंधी सिफारिशों को भी निजी डेंटल व मेडिकल कॉलेज अपनी मर्जी के चलते नहीं मान रहे हैं।
चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारी भी इन निजी कॉलेजों पर प्रभावी नियंत्रण न होने की बात कहते हुए किनारा कस लेते हैं। जिम्मेदार अधिकारी मानते हैं कि जब भी इन कॉलेजों के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो कार्रवाई में राजनीतिक दबाव आड़े आता है।
इसलिए फौरी तौर पर इस तरह के मामला सामने आने पर छात्र अथवा अभिभावक की तरफ से कोई लिखित शिकायत न किए जाने की बात कहते हुए अपना बचाव करते हैं।
दूसरी तरफ शुल्क के नाम पर पांच साल की एकमुश्त राशि कॉलेज के खाते में जमा कराने की परेशानी झेलने के बाद भी अभिभावक चाह कर भी पढ़ाई करने वाले अपने बच्चे के भविष्य को देखते हुए कॉलेज प्रशासन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
वार्षिक शुल्क पर भारी अन्य मद का बोझ
शासनादेश के तहत निजी मेडिकल कॉलेजों के लिए सालाना शुल्क राशि 3 लाख से 3.50 लाख के बीच तय है। इस तरह पांच साल के लिए यह शुल्क राशि 15 से 17.50 लाख के बीच आती है।
इसी तरह निजी डेंटल कॉलेजों के लिए सालाना फीस 1.52 लाख से 2.25 लाख है जो पांच साल में 7.60 लाख से 11.25 लाख के बीच आती है। इसके मूल शुल्क राशि में फौरी तौर पर विकास शुल्क, सुधार शुल्क इत्यादि को शामिल किया गया है।
इसके बाद भी निजी मेडिकल व डेंटल कालेज संचालक मेस शुल्क, छात्रावास शुल्क व जमानत राशि को शुल्क में अनिवार्य कर अभिभावकों का उत्पीड़न करते हैं।
सरीन कमेटी ने लगायी थी एक मुश्त फीस पर रोक
फीस ढांचे में सुधार के लिए बनी जस्टिस पी.के.सरीन समिति ने एकमुश्त की जगह वार्षिक आधार पर शुल्क वसूलने की सिफारिश की। इसमें वार्षिक फीस का निर्धारण कालजों की क्षमता व संसाधनों के आधार पर करने को कहा गया।
शासन द्वारा निर्धारित निजी मेडिकल व डेंटल कॉलेजों की इस शुल्क राशि में विकास शुल्क, सुधार शुल्क सहित सभी मदों को शामिल किया गया है। इस फीस में हास्टल व जमानत राशि को शामिल नहीं किया गया था।
इसे कॉलेज प्रशासन को ही अपने स्तर पर निर्धारित कर तय किए जाने का अधिकार दिया गया था। इसी की आड़ में निजी कॉलेज संचालक अभिभावकों से एकमुश्त मोटी शुल्क राशि वसूल कर अपनी जेब भरते हैं।
निजी कॉलेज: हम कोई जबरदस्ती नहीं कर रहे
इस संबंध में जब कुछ निजी डेंटल व मेडिकल कॉलेजों के संचालकों का पक्ष जानने को संपर्क किए जाने पर पहले तो उन्होंने इस बाबत नो कमेंट कह कर चुप्पी साध ली बाद में नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि एकमुश्त शुल्क लेने की व्यवस्था अभिभावकों के हित में ही है।
इससे जरूरतमंद अभिभावक को बैंकों से शिक्षा लोन के माध्यम से एक बार में ही शुल्क की पूरी राशि मिल जाने से हर साल फीस की राशि को जुटाने की समस्या खत्म हो जाती है।
उनका कहना है कि शासन ने केवल सालान शुल्क राशि का निर्धारण किया है। शुल्क राशि कैसे जमा करायी जाए इस बाबत कोई निर्देश नहीं दिया है। इसलिए अभिभावकों को एकमुश्त शुल्क राशि देने के फायदे बता एकमुश्त फीस जमा कराने को सिर्फ समझाते हैं न कि जबरन जमा कराते हैं।