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सियासी चालों से टूट गया अटल का सपना, नहीं तो आज और रूप में ही दिखता अपना लखनऊ
अखिलेश बाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sat, 18 Nov 2017 03:19 PM IST
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अटल बिहारी वाजपेयी
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अटल बिहारी वाजपेयी की एक कविता की पंक्तियां हैं,
हे प्रभो मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूं,
इतनी रुखाई कभी मत देना।।
पर, 90 के दशक में उन्हीं के ही कुछ करीबियों ने जो उस समय खुद भी काफी ऊंचाइयों पर पहुंच चुके थे, अपने प्रभाव का ऐसा इस्तेमाल किया कि लखनऊ को ऊंचे दर्जे का शहर बनवाने की कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाईं। अगर यह सब न होता तो तो आज लखनऊ के लोगों को न तो जाम से जूझना पड़ता और न गंदगी की किचकिच से दो-चार होना पड़ता।
जिस लखनऊ को सुंदर और समस्या मुक्त बनाने के लिए वाजपेयी जैसा नेता किशोरावस्था से सक्रिय रहा, लखनऊ को अपना घर मानता रहा। प्रधानमंत्री बनने के बावजूद लखनऊ के विकास को लेकर लगातार सक्रिय रहता था। उन्हीं वाजपेयी के उसी लखनऊ के साथ अतीत की भाजपा सरकार में नेताओं के अहम का टकराव और दूसरे को श्रेय न लेने देने की कोशिशों से पनपे षडयंत्रों का ऐसा सियासी खेल चला कि लखनऊ को सुंदर और सुव्यवस्थित बनाने का सपना बीच में ही टूट गया। मांट्रियल (कनाडा) के साथ लखनऊ को जुड़वां शहर का दर्जा देकर वहीं के अनुरूप इसे सजाने, संवारने और सुव्यवस्थित करने का समझौता फाइलों में उलझकर रह गया।
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हे प्रभो मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूं,
इतनी रुखाई कभी मत देना।।
पर, 90 के दशक में उन्हीं के ही कुछ करीबियों ने जो उस समय खुद भी काफी ऊंचाइयों पर पहुंच चुके थे, अपने प्रभाव का ऐसा इस्तेमाल किया कि लखनऊ को ऊंचे दर्जे का शहर बनवाने की कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाईं। अगर यह सब न होता तो तो आज लखनऊ के लोगों को न तो जाम से जूझना पड़ता और न गंदगी की किचकिच से दो-चार होना पड़ता।
जिस लखनऊ को सुंदर और समस्या मुक्त बनाने के लिए वाजपेयी जैसा नेता किशोरावस्था से सक्रिय रहा, लखनऊ को अपना घर मानता रहा। प्रधानमंत्री बनने के बावजूद लखनऊ के विकास को लेकर लगातार सक्रिय रहता था। उन्हीं वाजपेयी के उसी लखनऊ के साथ अतीत की भाजपा सरकार में नेताओं के अहम का टकराव और दूसरे को श्रेय न लेने देने की कोशिशों से पनपे षडयंत्रों का ऐसा सियासी खेल चला कि लखनऊ को सुंदर और सुव्यवस्थित बनाने का सपना बीच में ही टूट गया। मांट्रियल (कनाडा) के साथ लखनऊ को जुड़वां शहर का दर्जा देकर वहीं के अनुरूप इसे सजाने, संवारने और सुव्यवस्थित करने का समझौता फाइलों में उलझकर रह गया।
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अटल बिहारी वाजपेयी से काफी प्रभावित थे, बुर्क
अटल बिहारी वाजपेई
- फोटो : amar ujala
बात 1998 की है। मांट्रियल (कनाडा) में भारतीयों की गतिविधियों के केंद्र भारत भवन के अध्यक्ष डॉक्टर उमाशंकर लखनऊ आए। वे वहां बनाए गए गांधी पार्क में लगवाई गई महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की मूर्तियों का अनावरण प्रदेश के तत्कालीन लोक निर्माण एवं पर्यटन मंत्री कलराज मिश्र से कराना चाहते थे।
कलराज मिश्र अनावरण के लिए मांट्रियल गए। मांट्रियल के भारत भवन के अध्यक्ष के साथ वहीं के एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. उमाशंकर की इच्छा थी कि लखनऊ का विकास और व्यवस्था भी मांट्रियल जैसी हो जाए। इसलिए डॉ. उमाशंकर ने कार्यक्रम में मांट्रियल के तत्कालीन मेयर पियर ए बुर्क को भी बुला रखा था।
बुर्क, अटल बिहारी वाजपेयी से काफी प्रभावित थे। डॉ. उमाशंकर के प्रयासों से बुर्क और मिश्र के बीच बातचीत में लखनऊ को सुव्यवस्थित बनाने की बात आई। बुर्क ने कहा कि वह लखनऊ के लिए कुछ करना चाहते हैं। बातचीत में जुड़वां शहर की अवधारणा पर काम करने की संभावना बनी। बुर्क ने इस सिलसिले में लखनऊ की पूरी सहायता करने और अपने यहां के इंजीनियरों तथा वास्तुविदों को भेजकर काम कराने का आश्वासन दिया।
राजधानी के कला, संस्कृति और साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े तथा भारत भवन की तरफ से इस पूरे प्रयास के समन्यक डॉ. उमाशंकर के भांजे राकेश मंजुल बताते हैं , ‘कलराज मिश्र ने मांट्रियल से लौटकर सरकार के प्रमुख लोगों के साथ तत्कालीन नगर प्रमुख डॉ. एससी राय से बातचीत की। साथ ही डॉ. राय को सुझाव दिया कि वे खुद भी मांट्रियल जाएं, जिससे बात आगे बढ़ सके।
पर, डॉक्टर राय ने कुछ व्यावहारिक दिक्कतें सामने रखते हुए कहा कि प्रस्ताव अगर मांट्रियल से ही आ जाए तो उनका वहां जाना आसान रहेगा।’ अंतत: मांट्रियल के मेयर ने लखनऊ के तत्कालीन नगर प्रमुख डॉ. एससी राय को औपचारिक बुलावा भेजा। पर, यह मामला प्रदेश सरकार के पास आकर लटक गया।
कलराज मिश्र अनावरण के लिए मांट्रियल गए। मांट्रियल के भारत भवन के अध्यक्ष के साथ वहीं के एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. उमाशंकर की इच्छा थी कि लखनऊ का विकास और व्यवस्था भी मांट्रियल जैसी हो जाए। इसलिए डॉ. उमाशंकर ने कार्यक्रम में मांट्रियल के तत्कालीन मेयर पियर ए बुर्क को भी बुला रखा था।
बुर्क, अटल बिहारी वाजपेयी से काफी प्रभावित थे। डॉ. उमाशंकर के प्रयासों से बुर्क और मिश्र के बीच बातचीत में लखनऊ को सुव्यवस्थित बनाने की बात आई। बुर्क ने कहा कि वह लखनऊ के लिए कुछ करना चाहते हैं। बातचीत में जुड़वां शहर की अवधारणा पर काम करने की संभावना बनी। बुर्क ने इस सिलसिले में लखनऊ की पूरी सहायता करने और अपने यहां के इंजीनियरों तथा वास्तुविदों को भेजकर काम कराने का आश्वासन दिया।
राजधानी के कला, संस्कृति और साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े तथा भारत भवन की तरफ से इस पूरे प्रयास के समन्यक डॉ. उमाशंकर के भांजे राकेश मंजुल बताते हैं , ‘कलराज मिश्र ने मांट्रियल से लौटकर सरकार के प्रमुख लोगों के साथ तत्कालीन नगर प्रमुख डॉ. एससी राय से बातचीत की। साथ ही डॉ. राय को सुझाव दिया कि वे खुद भी मांट्रियल जाएं, जिससे बात आगे बढ़ सके।
पर, डॉक्टर राय ने कुछ व्यावहारिक दिक्कतें सामने रखते हुए कहा कि प्रस्ताव अगर मांट्रियल से ही आ जाए तो उनका वहां जाना आसान रहेगा।’ अंतत: मांट्रियल के मेयर ने लखनऊ के तत्कालीन नगर प्रमुख डॉ. एससी राय को औपचारिक बुलावा भेजा। पर, यह मामला प्रदेश सरकार के पास आकर लटक गया।
अटल के हस्तक्षेप से हुई रवानगी
अटल बिहारी वाजपेयी
लगभग एक वर्ष बाद डॉ. उमाशंकर फिर लखनऊ आए और कलराज मिश्र से मुलाकात की। साथ ही किसी के मांट्रियल न जाने की जानकारी दी। बकौल मंजुल, ‘कलराज मिश्र ने डॉ. राय से बात की। फिर उन्होंने तत्कालीन प्रदेश सरकार के एक मंत्री से बातचीत की।
इसके बाद उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से बात की। अटल जी ने सुना तो वे भी काफी प्रसन्न हुए और उनकेहस्तक्षेप पर डॉ. राय मांट्रियल गए। वहां बातचीत हुई। डॉक्टर राय ने मांट्रियल के मेयर को लखनऊ आमंत्रित किया। साथ ही एक कार्यक्रम में पूरा मामला अटल बिहारी वाजपेयी को भी बताया।
अटल ने कहा कि मेयर बुर्क जब आएं तो उनसे भी मुलाकात करा दी जाए। बुर्क आए। पर, इसी बीच भाजपा के तत्कालीन कुछ प्रभावशाली नेता जो उस समय डॉ. राय का टिकट कटवाकर किसी अन्य को भाजपा से नगर प्रमुख का चुनाव लड़ाना चाहते थे, सक्रिय हो गए।
अटल जी के यहां एक प्रभावशाली व्यक्ति से संपर्क कर कार्यक्रम बदलवा दिया। इसके लिए तर्क दिया गया कि लखनऊ देखने से पहले अटल से मुलाकात का कोई सार्थक महत्व नहीं रहेगा। बुर्क अगर लखनऊ से लौटकर जाएंगे और तब प्रधानमंत्री से मुलाकात करेंगे तो ज्यादा सार्थक रहेगा। कम से कम कुछ नतीजे निकलेंगे।’
इसके बाद उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से बात की। अटल जी ने सुना तो वे भी काफी प्रसन्न हुए और उनकेहस्तक्षेप पर डॉ. राय मांट्रियल गए। वहां बातचीत हुई। डॉक्टर राय ने मांट्रियल के मेयर को लखनऊ आमंत्रित किया। साथ ही एक कार्यक्रम में पूरा मामला अटल बिहारी वाजपेयी को भी बताया।
अटल ने कहा कि मेयर बुर्क जब आएं तो उनसे भी मुलाकात करा दी जाए। बुर्क आए। पर, इसी बीच भाजपा के तत्कालीन कुछ प्रभावशाली नेता जो उस समय डॉ. राय का टिकट कटवाकर किसी अन्य को भाजपा से नगर प्रमुख का चुनाव लड़ाना चाहते थे, सक्रिय हो गए।
अटल जी के यहां एक प्रभावशाली व्यक्ति से संपर्क कर कार्यक्रम बदलवा दिया। इसके लिए तर्क दिया गया कि लखनऊ देखने से पहले अटल से मुलाकात का कोई सार्थक महत्व नहीं रहेगा। बुर्क अगर लखनऊ से लौटकर जाएंगे और तब प्रधानमंत्री से मुलाकात करेंगे तो ज्यादा सार्थक रहेगा। कम से कम कुछ नतीजे निकलेंगे।’
लौटकर भी नहीं हो पाई मुलाकात
अटल बिहारी बाजपेयी
बुर्क तीन दिन की यात्रा पर लखनऊ आए। तत्कालीन नगर प्रमुख डॉ. एससी राय और उनके बीच जुड़वां शहर की अवधारणा को अमली जामा पहनाने के लिए एक समझौता हुआ। इस मौके पर तत्कालीन प्रदेश सरकार के कुछ वरिष्ठ मंत्री भी थे। इसके तहत लखनऊ की शिल्पकला और शिल्पियों के संरक्षण तथा विकास, लघु उद्योगों के विकास, यातायात सुधार के लिए परस्पर सहयोग, तकनीकी मदद, पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण मुक्त शहर बनाने के काम में मदद, सुगम यातायात, सफाई, सड़कों
और गलियों का रखरखाव, अतिक्रमण से मुक्ति, लखनऊ और मांट्रियल के शैक्षिक संस्थानों में एक-दूसरे केछात्रों को प्रवेश, चिकित्सा और सांस्कृतिक गतिविधियों तथा इनके संरक्षण के लिए परस्पर सहयोग से काम, खेलों पर काम, तीन वृद्ध आश्रमों का निर्माण, नालों-नालियों को व्यवस्थित करना तथा गोमती में नालों के गंदे पानी के गिरने पर रोक लगाने के साथ इसके निस्तारण की वैकल्पिक व्यवस्था बनाना जैसे काम शामिल थे।
लखनऊ में मांट्रियल के मेयर का कई जगह अभिनंदन हुआ। भव्य स्वागत भी किया गया। कहने का मतलब मेहमाननवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। मेयर लौटे तो उनका दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने का भी कार्यक्रम था। ंमंजुल बताते हैं कि पर, वह जब दिल्ली पहुंचे तो अटल की यह कविता, ‘अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं, पीठ में छूरी-सा चांद, राहु गया रेखा फांद’ फिर चरितार्थ होती दिखी। बताया गया कि अचानक आवश्यक कार्य में व्यस्त हो जाने के कारण आज मुलाकात संभव नहीं है। बुर्क को उसी दिन दिल्ली से वापस लौटना था। आखिरकार वह अटल से मुलाकात किए बिना ही भारत से चले गए।
मुलाकात न होने देने के पीछे भी भाजपा के उस समय के उन प्रभावशाली नेताओं और अटल के साथ छाया की तरह रहने वाले एक सज्जन की ही भूमिका थी। जिन्हें दूसरों का महत्व बढ़ने पर अपना प्रभाव घटने की आशंका सता रही थी।’ डॉ. राय को टिकट मिला। वह चुनाव भी जीते।
बतौर नगर प्रमुख उन्होंने कई बार इस बारे में प्रयास भी किए। पर, कुछ लोगंों की अड़ंगेबाजी की बैरिकेडिंग तोड़कर यह प्रस्ताव दिल्ली तक नहीं जा पाया। आखिरकार मांट्रियल ने भी इससे तौबा बोल दी। यह प्रस्ताव आज भी नगर निगम और प्रदेश सरकार की फाइलों में दबा पड़ा बताया जाता है।
और गलियों का रखरखाव, अतिक्रमण से मुक्ति, लखनऊ और मांट्रियल के शैक्षिक संस्थानों में एक-दूसरे केछात्रों को प्रवेश, चिकित्सा और सांस्कृतिक गतिविधियों तथा इनके संरक्षण के लिए परस्पर सहयोग से काम, खेलों पर काम, तीन वृद्ध आश्रमों का निर्माण, नालों-नालियों को व्यवस्थित करना तथा गोमती में नालों के गंदे पानी के गिरने पर रोक लगाने के साथ इसके निस्तारण की वैकल्पिक व्यवस्था बनाना जैसे काम शामिल थे।
लखनऊ में मांट्रियल के मेयर का कई जगह अभिनंदन हुआ। भव्य स्वागत भी किया गया। कहने का मतलब मेहमाननवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। मेयर लौटे तो उनका दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने का भी कार्यक्रम था। ंमंजुल बताते हैं कि पर, वह जब दिल्ली पहुंचे तो अटल की यह कविता, ‘अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं, पीठ में छूरी-सा चांद, राहु गया रेखा फांद’ फिर चरितार्थ होती दिखी। बताया गया कि अचानक आवश्यक कार्य में व्यस्त हो जाने के कारण आज मुलाकात संभव नहीं है। बुर्क को उसी दिन दिल्ली से वापस लौटना था। आखिरकार वह अटल से मुलाकात किए बिना ही भारत से चले गए।
मुलाकात न होने देने के पीछे भी भाजपा के उस समय के उन प्रभावशाली नेताओं और अटल के साथ छाया की तरह रहने वाले एक सज्जन की ही भूमिका थी। जिन्हें दूसरों का महत्व बढ़ने पर अपना प्रभाव घटने की आशंका सता रही थी।’ डॉ. राय को टिकट मिला। वह चुनाव भी जीते।
बतौर नगर प्रमुख उन्होंने कई बार इस बारे में प्रयास भी किए। पर, कुछ लोगंों की अड़ंगेबाजी की बैरिकेडिंग तोड़कर यह प्रस्ताव दिल्ली तक नहीं जा पाया। आखिरकार मांट्रियल ने भी इससे तौबा बोल दी। यह प्रस्ताव आज भी नगर निगम और प्रदेश सरकार की फाइलों में दबा पड़ा बताया जाता है।