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अतीत का झरोखा: 300 रुपये ही जेब में थे और लड़ गया चुनाव... पूर्व विधायक सुंदरलाल दीक्षित की जुबानी

Thu, 16 Dec 2021 10:36 AM IST
ishwar ashish केपी तिवारी, अमर उजाला, बाराबंकी
केपी तिवारी, अमर उजाला, बाराबंकी Published by: ishwar ashish Updated Thu, 16 Dec 2021 10:36 AM IST
सार

पूर्व विधायक सुंदरलाल दीक्षित ने 1977 में पहला चुनाव लड़ा। उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा पर कई रोचक प्रसंग सुनाए। कहा कि आज भी ईमानदारी से राजनीति की जाए तो कम पैसे में भी जीत सकते हैं।

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Former MLA Sundarlal Dikshit Speaks about his political journey.
सुंदरलाल दीक्षित - फोटो : amar ujala

विस्तार

भले ही आज राजनीति में धन का बोलबाला हो गया हो, लेकिन तीन दशक पहले तक ऐसा नहीं था। बाराबंकी के हैदरगढ़ से एक बार निर्दलीय और दो बार भाजपा से विधायक रहे सुंदरलाल दीक्षित तो मानते हैं कि पैसा आज भी बहुत मायने नहीं रखता। बशर्ते राजनीति पूरी ईमानदारी और सेवाभाव से की जाए। वह बताते हैं, मैंने 1977 में जब पहला चुनाव लड़ा तो मेरे पास सिर्फ 300 रुपये थे।  लोगों ने मदद की। चुनाव जीतने के बाद भी मेरे जेब में 480 रुपये बचे हुए थे।

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राजनीति में कैसे आए, इस सवाल पर अक्खड़, फक्खड़ और अपने में मस्त रहने वाले पूर्व विधायक दीक्षित जो कुछ बताते हैं वह दिल को छू जाता है। कहते हैं, युवावस्था में गरीबों के लिए संघर्ष करता था। यही जिंदगी का एक मकसद था। उसी दौरान जॉर्ज फर्नांडीज से प्रभावित हुआ और राजनीति में आ गया। आपातकाल के बाद मैंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर हैदरगढ़ से नामांकन दाखिल कर दिया।
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मेरे सामने थे कांग्रेस के दिग्गज नेता श्यामलाल वाजपेयी और जनता पार्टी के जंगबहादुर वर्मा। जनता पार्टी का गठन कांग्रेस विरोधी कई दलों को मिलाकर हुआ था। दोनों लोग धन एवं समीकरणों में काफी मजबूत थे। यकीन नहीं होगा कि उस समय मेरे पास महज 300 रुपये ही थे। फिर भी चुनाव मैदान में उतर गया।
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धमकी देने वाले ने मदद भी की और वोट भी दिए
दीक्षित बताते हैं, चुनाव के दौरान ही एक अजीब वाकया हुआ। मुझे धमकाया जाने लगा। कुछ लोग थे जो यह धमकी दे रहे थे। मैं सीधे उसी गांव पहुंच गया जहां के दबंग व्यक्ति की तरफ से मुझे धमकी मिली थी। गांव के लोगों से कहा, ‘भैया हमारी क्या खता है, जो हमें मारने की धमकी दी जा रही है।’

गांव वाले हमारे साथ उस व्यक्ति के घर पहुंचे। हमने उनसे भी पूछा, ‘भैया हमारी क्या गलती है जो हमें मारने की बात कह रहे हो। कोई गलती हो तो मैं खुद आ गया हूं। सजा दे लो।’ यह सुनकर वे काफी शर्मिंदा हुए। मुझे तख्त पर बैठाया। माफी मांगी और उन्होंने वादा किया कि वह ही नहीं उनका पूरा गांव पूरी ताकत से साथ मेरा साथ देगा।

अटल से कहा, जब आप पार्टी बनाएंगे तो आ जाऊंगा

उस चुनाव में लोगों ने मेरी खूब मदद की। मैं जहां पहुंचता, वहां लोग रुपये देते। जिनके पास रुपये नहीं थे, वे गेहूं-चावल दे देते। जहां रात हो जाती वहीं मैं रुक जाता। सुबह होने पर दूसरे गांव के लिए चल देता। 1977 का चुनाव जीत गया। जिस गांव से धमकी मिली थी, वहां की पोलिंग पर भी जीता। मजेदार बात यह रही कि 300 रुपये जेब में लेकर चुनाव लड़ने चला था, नतीजा आया तब भी 480 रुपये जेब में बचे थे।

- लखनऊ पहुंचा तो अटल बिहारी वाजपेयी ने बुलाया। वह बोले, ‘दीक्षित जी हमारे साथ आ जाओ।’ मैंने उनके चरण छुए और बोला, जनता पार्टी नहीं चलेगी। इसलिए इसमें नहीं आ सकता। जब आप इससे अलग होंगे तब जरूर आपके पास आ जाऊंगा।’

- जनता पार्टी टूटने के बाद जब भारतीय जनता पार्टी बनी तो मैं तुरंत अटल जी के पास पहुंच गया। उनसे बोला, ‘आपके आदेश का पालन करने के लिए हाजिर हूं।’ वह दिन है और आज का दिन, भाजपा में ही हूं।
 
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ अटलजी के सपनों को साकार कर रहे हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय के संकल्पों को धरती पर उतार रहे हैं। पर, अटल तो अटल ही थे। उनके जैसा नेता न पहले हुआ और न आगे होगा।

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