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PWD: प्रोजेक्ट में देरी से लागत बढ़ी तो सरकार पर नहीं पड़ेगा भार, 50 करोड़ से अधिक के काम ईपीसी से कराने की तैयारी
Sun, 03 Jul 2022 03:42 PM IST
ishwar ashish
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Sun, 03 Jul 2022 03:42 PM IST
सार
यूपी कैबिनेट में 50 करोड़ रुपये से अधिक की लागत के सभी काम ईपीसी से कराने का प्रस्ताव लाने की तैयारी है। इससे प्रोजेक्ट में देरी होने पर बढ़ी लागत का भार सरकार पर नहीं पड़ेगा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
निर्माण कार्यों में तेजी लाने और प्रोजेक्ट में देरी से लागत बढ़ने का झंझट दूर करने के लिए लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) 50 करोड़ से ऊपर के सड़कों व पुलों के सभी कार्य ईपीसी (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन) मोड में कराएगा। पीडब्ल्यूडी का प्रदेश में 2.60 लाख किमी से ज्यादा लंबी सड़कों का नेटवर्क है।
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ईपीसी मोड में परियोजना को डिजाइन करना, उसमें लगने वाली सामग्री को खरीदना और निर्माण ठेका लेने वाली फर्म की जिम्मेदारी होती है। प्रोजेक्ट में किसी कारण देरी होने पर लागत में जो वृद्धि होती है, उसे संबंधित फर्म को ही वहन करना पड़ता है। इसके लिए कैबिनेट प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। इस पर अंतिम मुहर कैबिनेट में ही लगेगी।
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सूत्रों के मुताबिक, शनिवार को पीडब्ल्यूडी की एक उच्चस्तरीय बैठक में इस प्रस्ताव को अंतिम रूप दे दिया गया है। इस बारे में संपर्क करने पर पीडब्ल्यूडी विभागाध्यक्ष मनोज गुप्ता ने माना कि ईपीसी मोड से समय और धन दोनों की बचत होती है। साथ ही कहा कि इस बारे में वह इससे अधिक कुछ नहीं बता सकते।
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प्रोजेक्ट में देरी से सरकारी खजाने पर बढ़ता है बोझ
अभी तक पीडब्ल्यूडी में सड़कों से लेकर सभी तरह के काम आइटम रेट के आधार पर कराए जाते हैं। इसमें किसी भी वजह से प्रोजेक्ट में देरी होने पर ‘कास्ट एंड टाइम ओवर रन’ (ज्यादा समय लगने पर लागत में हुई वृद्धि) का खामियाजा विभाग को ही भुगतना पड़ता है। इससे सरकारी खजाने पर भार भी बढ़ता है। इसलिए तय किया गया है कि 50 करोड़ से ऊपर के सभी काम ईपीसी मोड में कराने के लिए उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज इंडस्ट्रियल डवलपमेंट अथॉरिटी (यूपीडा) के मॉडल को अपनाया जाएगा।
90 फीसदी भूमि अधिग्रहण के बाद ही ठेका
ईपीसी मोड में निर्माण कार्य का ठेका लेने वाली फर्म को काम प्रारंभ करने की तिथि तभी दी जाती है जब 90 फीसदी से अधिक भूमि अधिग्रहण हो चुका है। इसके बाद अगर काम में किसी भी वजह से अधिक समय लगता है तो इसकी लागत में आने वाले वृद्धि संबंधित फर्म को ही वहन करना पड़ेगा।