यूपी का चुनावी संग्राम : शाहाबाद, भगवंतनगर और हुसैनगंज में किस करवट बैठेगा ऊंट
यूपी में छिड़े सत्ता के संग्राम में आज तीसरे चरण की वोटिंग होनी है। सियासी जंग एक तरह से आधे रास्ते तक आ गई है। अब कुछ हवा है और कुछ आखिर मोर्चे जिनको जीतने के लिए राजनीतिक दल जी-जान से लगे हुए हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
शाहाबाद में चुनावी मैदान पूरी तरह से सजा हुआ है। एक तरफ भाजपा, तो दूसरी तरफ सपा। दोनों के बीच में भाजपा का नाराज सिपाही अखिलेश पाठक। दूसरी बार विधानसभा चुनाव में अपनी उपेक्षा के बाद वे निर्दलीय मैदान में उतर गए हैं। बसपा ने एबी सिंह तो कांग्रेस नेडॉ. अजीमुश्शान पर भरोसा जताया है।
भाजपा प्रत्याशी रजनी तिवारी के खिलाफ पार्टी के उपाध्यक्ष रहे अखिलेश पाठक ने निर्दलीय ताल ठोक दी है। उनके मैदान में आते ही जातीय समीकरण उलझ गए हैं। ब्राह्मण वोटों में बंटवारा रोकने की भाजपा के सामने चुनौती है। जबकि पूर्व विधायक बाबू खां इस बार चुनावी जंग से बाहर हैं। इसलिए मुस्लिम वोट बिखरने की संभावना काफी कम मानी जा रही है।
शाहाबाद में 2017 का चुनावी घमासान भाजपा, बसपा और सपा के बीच चला था। भाजपा ने दो मुस्लिम प्रत्याशियों के बीच ब्राह्मण प्रत्याशी उतारकर जातीय समीकरणों को अपने पाले में खींच लिया था। यही वजह थी कि बसपा प्रत्याशी पूर्व विधायक आसिफ खां बब्बू और सपा से पूर्व विधायक बाबू खां को भाजपा की रजनी तिवारी से करारी शिकस्त खानी पड़ी थी। पर इस बार सारे समीकरण अलग हैं।
कई बार हुए त्रिकोणीय मुकाबले
विधानसभा चुनावों में यहां कई बार त्रिकोणीय मुकाबले देखने को मिले हैं। 1991 के चुनाव में चार प्रत्याशियों के बीच हुए कड़े संघर्ष के बाद यहां कई बार त्रिकोणीय मुकाबले में प्रत्याशियों के बीच उठापटक देखने को मिली है। 1993 में बाबू खां गंगाभक्त सिंह व रामऔतार दीक्षित के बीच जमकर मुकाबला हुआ था। 1996 में दोबारा तीनों प्रत्याशियों के बीच दिलचस्प चुनाव हुआ था। तब बाबू खां ने 45,706, गंगाभक्त सिंह ने 45,487 व रामऔतार दीक्षित ने 42,152 वोट हासिल किए थे। 2002 में हुए त्रिकोणीय मुकाबले में गंगाभक्त सिंह को 41,602, बाबू खां को 35,252 व आसिफ खां को 32,469 वोट मिले थे।
भगवंतनगर : रोमांचक जंग के बने आसार, बसपा ने मुकाबले को बनाया रोचक
भगवंतनगर विधानसभा क्षेत्र का चुनाव पूरी तरह से जातीय समीकरणों में उलझ गया है। ब्राह्मण बहुल इस सीट पर भाजपा ने ब्राह्मण चेहरे को ही उतारा है। वहीं, सपा ने क्षत्रिय प्रत्याशी को चुनावी समर में उतारकर टक्कर दी है। बसपा ने पिछड़ा वर्ग का प्रत्याशी उतारकर समीकरणों की बिसात को उलझा दिया। कांग्रेस ने नए चेहरे पर भरोसा जताया है।
भगवंतनगर विधानसभा क्षेत्र में प्रत्याशियों के कद और मतदाताओं के रुझान को देखते हुए सियासी पंडितों का मानना है कि यहां मुकाबला त्रिकोणीय होगा। 2017 मंे यहां से विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित जीते थे। इस बार पार्टी ने आशुतोष शुक्ला को मैदान में उतारा है। उनकी पत्नी भाजपा के टिकट पर एक बार चुनाव हार चुकी हैं। पर, आशुतोष अनुभवी हैं और वे मुख्य मुकाबले में हैं। सपा प्रत्याशी अंकित सिंह परिहार ने कुछ महीने पहले ही कांग्रेस का हाथ छोड़कर साइकिल की सवारी की है।
यहां पहले से टिकट के लिए मशक्कत कर रहे पुराने सपाइयों में अंदरखाने खींचतान चल रही है। हालांकि, अंकित इसी विधानसभा क्षेत्र से दो बार कांग्रेस के टिकट पर और उनके पिता वीर प्रताप सिंह दो बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि, उन्हें सफलता नहीं मिली थी। अंकित के चचेरे बाबा भगवती सिंह विशारद इसी विधानसभा क्षेत्र से सात बार विधायक रह चुके हैं। बसपा प्रत्याशी बृजकिशोर जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं।
इससे वह राजनीतिक दांवपेच में माहिर माने जाते हैं। जंग बहादुर सिंह पुराने कांग्रेसी हैं। वह जिला पंचायत सदस्य और पार्टी के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। हालांकि, पूर्व के चुनाव नतीजों पर गौर करें तो 2017 में मोदी लहर को छोड़कर अन्य चुनावों में जातीय समीकरण ही जीत-हार का आधार रहे हैं। मतदान की तारीख आते-आते यहां विकास का मुद्दा कोसों पीछे छूट जाता रहा है। इस बार भी चुनाव जातिगत समीकरणों पर ही आगे बढ़ रहा है।
हुसैनगंज : ध्रुवीकरण पर ही सबको भरोसा
हुसैनगंज में इस बार मिजाज बदला-बदला सा है। चुनावी गरमी बढ़ते ही मुद्दे गायब हो गए। मतदाता खामोश हैं या फिर गोलमोल जवाब दे रहे हैं। ध्रुवीकरण पर ही सबको भरोसा है। जातीय समीकरण ही यहां रंग दिखाएंगे। भाजपा ने राज्यमंत्री रणवेंद्र प्रताप सिंह उर्फ धुन्नी सिंह पर फिर भरोसा जताया है। वहीं, सपा ने पूर्व मंत्री स्व. मुन्ना लाल मौर्य की पत्नी ऊषा मौर्य को चुनाव में उतारा है। मुस्लिम बहुल सीट पर बसपा ने मुस्लिम कार्ड खेला है। बसपा ने यहां फरीद अहमद को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने शिवाकांत तिवारी पर भरोसा जताया है।
रणवेंद्र प्रताप सिंह सजातीय वोटों के साथ सवर्णों और अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को साधने में जुटे हैं। चुनाव में उनके राजनीतिक अनुभव और संपर्कों की भी परीक्षा है। 2012 के चुनाव में रणवेंद्र बसपा से पराजित हुए थे। 2017 में जीते तो राज्यमंत्री बने। सपा प्रत्याशी ऊषा मौर्या पिछले चुनाव में कांग्रेस से मैदान में उतरी थीं। तब उन्हें 55,002 मत मिले थे और वे दूसरे नंबर पर थीं।
वे सपा के पारंपरिक मतदाताओं मुस्लिम और यादव के साथ सजातीय मतदाताओं को अपने पाले में लाने की पूरी कोशिश में हैं। बसपा के फरीद अहमद दलितों के साथ मुस्लिम वोटों में बंटवारा कराने की कोशिश में जुटे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी शिवाकांत तिवारी सजातीय वोटों के साथ मुस्लिम, क्षत्रिय समेत सभी जातियों के वोटों में सेंधमारी करने की कोशिश में हैं।
एक सा जवाब बढ़ा रहा धड़कन
मतदाता इस बार सुन तो सबकी रहे हैं, पर अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं। वे किसी को नाराज नहीं करना चाहते। प्रत्याशी दरवाजे से लेकर खेत खलिहान तक मतदाताओं का पीछा कर रहे हैं। पर, वे सभी को एक सा जवाब दे रहे हैं। इससे प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। इसको लेकर हमने हथगाम निवासी रमेश से सवाल किया तो वे कहते हैं कि वोट मांगने आए किसी प्रत्याशी को नाराज करना कहां की बुद्धिमानी है। सभी को वोट देने का आश्वासन ही हम देते हैं। वोट तो पसंदीदा प्रत्याशी को ही देंगे।