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Lucknow News: मैक्सीन से आसान होगी कैंसर की शुरुआती पहचान
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लखनऊ। भविष्य में खून की जांच से ही गंभीर बीमारियों के शुरुआती संकेत पकड़ना आसान हो सकता है। कैंसर से जुड़े संकेतों की पहचान से लेकर शरीर में ग्लूकोज और कोलेस्ट्रॉल का पता लगाने तक में एक खास नैनोमटेरियल मददगार साबित हो सकता है। इसका नाम मैक्सीन (एमएक्सीन) है। लखनऊ विवि के भौतिक विज्ञान विभाग के प्रो. चन्दकीराम गौतम और उनकी शोध टीम ने इस पदार्थ के इस्तेमाल पर विस्तृत शोध-समीक्षा पत्र तैयार किया है। यह प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल एसीएस एप्लाइड बायो मैटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है।
शोध पत्र में मैक्सीन और इससे तैयार कंपोजिट्स के जरिये चिकित्सा जांच को अधिक संवेदनशील और सटीक बनाने की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है। इसके आधार पर भविष्य में रक्त में ग्लूकोज, कोलेस्ट्रॉल और अन्य जैविक संकेतकों के साथ कैंसर से जुड़े बायोमार्कर्स की पहचान करने वाले उन्नत बायोसेंसर विकसित करने में मदद मिल सकती है। इस शोधपत्र में प्रो. गौतम के साथ शोधार्थी श्वेता, रजत कुमार मिश्रा, राखी, अखिलेश्वर गुप्ता और विवेक मसीह ने योगदान दिया है।
मैक्सीन के बारे में भी जानिए, इस तरह करेगा मदद
मैक्सीन बेहद पतली परतों वाला एक विशेष पदार्थ है। इसकी खासियत है कि यह बिजली का अच्छा संचालन करता है और इसकी सतह के गुणों में जरूरत के मुताबिक बदलाव किया जा सकता है। वैज्ञानिक इन गुणों का इस्तेमाल ऐसे सेंसर बनाने में कर सकते हैं, जो खून या शरीर के दूसरे तरल पदार्थों में मौजूद बीमारी से जुड़े बेहद छोटे संकेतों को भी पहचान सकें। उदाहरण के लिए, भविष्य में मैक्सीन आधारित सेंसर की मदद से कैंसर से जुड़े खास प्रोटीन या अन्य संकेतकों का पता लगाने वाले उपकरण विकसित किए जा सकते हैं। इससे बीमारी की शुरुआती पहचान में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसके लिए अभी और शोध व चिकित्सकीय परीक्षणों की जरूरत होगी।
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बीमार ऊतकों की तस्वीर लेने में भी उपयोगी
शोधपत्र के अनुसार, मैक्सीन की मदद से ऐसी तकनीकें विकसित की जा सकती हैं, जो शरीर के भीतर ट्यूमर और प्रभावित ऊतकों की तस्वीरों को अधिक स्पष्ट बनाने में मदद करें। इसके अलावा, भविष्य में इसका इस्तेमाल शरीर में ग्लूकोज, यूरिया और कोलेस्ट्रॉल जैसे पदार्थों की जांच करने वाले सेंसर बनाने में भी हो सकता है।
दूर करनी होंगी कई चुनौतियां
शोधकर्ताओं के मुताबिक, मैक्सीन आधारित तकनीक को आम लोगों तक पहुंचाने से पहले कई चुनौतियों का समाधान करना होगा। इनमें इस पदार्थ को बड़े पैमाने पर तैयार करना, लंबे समय तक इसकी गुणवत्ता बनाए रखना और मानव शरीर पर इसके संभावित दुष्प्रभावों का पता लगाना शामिल है। प्रो. गौतम के अनुसार, नैनोमटेरियल पर प्रयोगशाला में हो रहे शोध को स्वास्थ्य क्षेत्र की जरूरतों से जोड़ना जरूरी है। भविष्य में इस तकनीक से कम लागत वाले जांच उपकरण और शरीर पर पहने जा सकने वाले स्वास्थ्य निगरानी उपकरण विकसित करने में मदद मिल सकती है।
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शोध पत्र में मैक्सीन और इससे तैयार कंपोजिट्स के जरिये चिकित्सा जांच को अधिक संवेदनशील और सटीक बनाने की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है। इसके आधार पर भविष्य में रक्त में ग्लूकोज, कोलेस्ट्रॉल और अन्य जैविक संकेतकों के साथ कैंसर से जुड़े बायोमार्कर्स की पहचान करने वाले उन्नत बायोसेंसर विकसित करने में मदद मिल सकती है। इस शोधपत्र में प्रो. गौतम के साथ शोधार्थी श्वेता, रजत कुमार मिश्रा, राखी, अखिलेश्वर गुप्ता और विवेक मसीह ने योगदान दिया है।
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मैक्सीन के बारे में भी जानिए, इस तरह करेगा मदद
मैक्सीन बेहद पतली परतों वाला एक विशेष पदार्थ है। इसकी खासियत है कि यह बिजली का अच्छा संचालन करता है और इसकी सतह के गुणों में जरूरत के मुताबिक बदलाव किया जा सकता है। वैज्ञानिक इन गुणों का इस्तेमाल ऐसे सेंसर बनाने में कर सकते हैं, जो खून या शरीर के दूसरे तरल पदार्थों में मौजूद बीमारी से जुड़े बेहद छोटे संकेतों को भी पहचान सकें। उदाहरण के लिए, भविष्य में मैक्सीन आधारित सेंसर की मदद से कैंसर से जुड़े खास प्रोटीन या अन्य संकेतकों का पता लगाने वाले उपकरण विकसित किए जा सकते हैं। इससे बीमारी की शुरुआती पहचान में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसके लिए अभी और शोध व चिकित्सकीय परीक्षणों की जरूरत होगी।
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बीमार ऊतकों की तस्वीर लेने में भी उपयोगी
शोधपत्र के अनुसार, मैक्सीन की मदद से ऐसी तकनीकें विकसित की जा सकती हैं, जो शरीर के भीतर ट्यूमर और प्रभावित ऊतकों की तस्वीरों को अधिक स्पष्ट बनाने में मदद करें। इसके अलावा, भविष्य में इसका इस्तेमाल शरीर में ग्लूकोज, यूरिया और कोलेस्ट्रॉल जैसे पदार्थों की जांच करने वाले सेंसर बनाने में भी हो सकता है।
दूर करनी होंगी कई चुनौतियां
शोधकर्ताओं के मुताबिक, मैक्सीन आधारित तकनीक को आम लोगों तक पहुंचाने से पहले कई चुनौतियों का समाधान करना होगा। इनमें इस पदार्थ को बड़े पैमाने पर तैयार करना, लंबे समय तक इसकी गुणवत्ता बनाए रखना और मानव शरीर पर इसके संभावित दुष्प्रभावों का पता लगाना शामिल है। प्रो. गौतम के अनुसार, नैनोमटेरियल पर प्रयोगशाला में हो रहे शोध को स्वास्थ्य क्षेत्र की जरूरतों से जोड़ना जरूरी है। भविष्य में इस तकनीक से कम लागत वाले जांच उपकरण और शरीर पर पहने जा सकने वाले स्वास्थ्य निगरानी उपकरण विकसित करने में मदद मिल सकती है।