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एसजीपीजीआईः पपीते की पत्तियों ने बचाई नवजात की जान, कम हो रहे थे प्लेटलेट्स

Wed, 20 Feb 2019 03:15 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Wed, 20 Feb 2019 03:15 PM IST
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doctors saved new born baby from papaya leaf extract threapy in SGPGI
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नवजात शिशु में लगातार प्लेटलेट्स की कमी हो रही थी। इस बीमारी (नियोनेटल थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया) के इलाज में अब तक प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन ही एकमात्र विकल्प था। लेकिन एसजीपीजीआई के नियोनैटोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने पपीते की पत्ती का इस बीमारी में प्रयोग किया और उन्हें इसमें सफलता भी मिल गई। 
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विशेषज्ञों की मानें तो नवजात में यह समस्या वैसे तो सामान्य होती है। जन्म के कुछ समय बाद उनमें सुधार हो जाता है। लेकिन कुछ नवजात शिशुओं में सुधार होने के बजाए प्लेटलेट्स काउंट लगातार गिरते रहते हैं और उन्हें सीवियर थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया हो जाता है।
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ऐसे में शिशु में प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन किया जाता है। इस बीमारी से कई बार इंट्रावेंट्रिकुलर हेमरेज (अंतर्निलयी ब्लीडिंग) होने से शिशु की मृत्यु भी हो जाती है। एसजीपीजीआई में पहली बार नियोनेटल थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया से ग्रसित नवजात के इलाज में पपाया लीफ एक्सट्रैक्ट का सफल प्रयोग कर शिशु की न सिर्फ जान बचाई गई बल्कि उसे स्वस्थ भी किया गया। 
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कम थी उम्मीद, तत्काल मीटिंग कर लिया फैसला

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शिशु की हालत लगातार खराब होती जा रही थी। विशेषज्ञ भी उसके बचने की उम्मीद लगभग खो चुके थे। तभी नियोनैटोलॉजी विभाग की इमरजेंसी मीटिंग की गई और पपाया लीफ एक्सट्रैक्ट थेरेपी पर निर्णय लेने के लिए चर्चा की। परिवार की सहमति के बाद इस थेरेपी के जरिए शिशु का इलाज शुरू किया गया।

जन्म के 23वें दिन शिशु को पपाया लीफ एक्सट्रैक्ट सीरप की डोज शुरू की गई। सिरप शुरू करने के पहले (जन्म के 23वें दिन) शिशु के प्लेटलेट्स काउंट महज 45,000 थे वहीं एक सप्ताह बाद नवजात की प्लेटलेट्स बढ़कर 1,50 000 हो गए।

इस थेरेपी सेे नवजात पर कोई दुष्प्रभाव भी नहीं हुआ। 41वें दिन शिशु की प्लेटलेट्स सामान्य से बेहतर हो गईं। 45वें दिन उसे 1,59,000 प्लेटलेट्स काउंट होने व पूरी तरह स्वस्थ होने पर डिस्चार्ज कर दिया गया। फॉलोअप में शिशु अब पूरी तरह स्वस्थ है।

प्रीमेच्योर संग थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया से ग्रसित था शिशु

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नवजात को जन्म देने वाली 38 वर्षीय गर्भवती को पहले से ही एनीमिया समेत गर्भावस्था की अन्य जटिलताएं थीं। पहले भी गर्भवती के गर्भ में ही दो शिशुओं की मौत हो चुकी थी। गर्भवती ने सिजेरियन के जरिए प्रेग्नेंसी के 31वें सप्ताह में नवजात को जन्म दिया।

जन्म के समय शिशु का वजन सामान्य से कहीं कम 1.73 किग्रा. था। प्रीमेच्योर व कम वजन केसाथ शिशु जन्म के समय रोया भी नहीं। उसे बर्थ एस्पेक्सिया, सांस लेने में दिक्कत के साथ अन्य जटिलाएं होने लगीं जिससे जन्म केसमय से ही वो थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया से भी ग्रसित हो गया।

कोशिशें हो रही थीं बेकार 
केस रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने बताया कि जन्म से ही नवजात की हालत गंभीर थी। किसी तरह मास्क वेंटिलेशन के जरिए उसकी हृदय गति में सुधार किया गया। सांस लेने में दिक्कत के चलते उसे ऑक्सीजन के सहारे रखा गया। शिशु में पहले दिन से ही थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया की समस्या हो गई, जिससे लगातार शिशु की प्लेटलेट्स में कमी होने लगी।

सेप्सिस व संक्रमण से बढ़ती है दिक्कत

मल्टीपल प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन के बावजूद सुधार के बजाए उसके शरीर में चकत्ते पड़ गए। मेनेंजाइटिस से बचाने के लिए शिशु को एंटीबायोटिक व एंटीफंगल थेरेपी भी दी जा रही थी। लेकिन शिशु की प्लेटलेट्स लगातार तेजी से कम हो रही थीं, डोज काफी बढ़ाने के बाद भी हालत बिगड़ती ही जा रही थी।

थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया की समस्या अक्सर उन शिशु में होती है जो जन्म के समय स्वस्थ नहीं होते। जन्म के समय बैक्टीरियल या फंगल इंफेक्शन, सेप्सिस व एनआईसीयू में भर्ती नवजातों में यह बीमारी होने की आशंका ज्यादा होती है।
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