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व्यवस्था और कैंसर से लड़ती रहीं, पर टूटी नहीं उमा लखनपाल

Thu, 22 Sep 2022 01:54 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Thu, 22 Sep 2022 01:54 AM IST
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death of uma lakhanpal
लखनऊ। ‘जब पाप के घरौंदे फूटेंगे जब जुल्म के बंधन टूटेंगे, उस सुबह को हम ही लाएंगे, वो सुबह हमीं से आएगी...’ ये पंक्तियां लगातार 12 साल तक विधानभवन के सामने तात्कालिक धरना स्थल पर सुनाई देती थीं, जिन्हें आवाज देती थीं उमा लखनपाल। पैतृक संपत्ति में अपने हक के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाली उमा ने 17 सितंबर को बलरामपुर अस्पताल में अंतिम सांसें लीं।
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भारतीय महिला फेडरेशन की प्रदेश अध्यक्ष आशा मिश्रा उनके संघर्ष के दिनों की साक्षी हैं। आशा मिश्रा बताती हैं कि हम सब कई बार उनके समर्थन में उनके साथ धरने पर बैठे। 1997 से 2009 तक समाचार पत्रों की सुर्खियां बना रहा उमा लखनपाल का संघर्ष। कभी पढ़ने को मिलता...आत्मदाह की सूचना पर गिरफ्तार रिहा, तो कभी इंसाफ की प्रतीक्षा में अकेले धरने पर बैठी एक प्रतिभा...जैसे समाचार हर रोज पढ़ने को मिलते थे।
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आशा मिश्रा बताती हैं कि उनकी लड़ाई संपत्ति के झगड़े को लेकर थी। वे नाना के मकान में दो भाइयों संग रहती थीं। उनका आरोप था कि उन्हें बेदखल कर दिया गया। इसी को लेकर उन्होंने कोर्ट से भी गुहार लगाई और अनिश्चितकालीन धरना, अनशन जैसे तरीके अपनाए। आशा मिश्रा बताती हैं कि उन पर कई बार हमला भी हुआ, कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया पर तात्कालिक पुलिस-प्रशासन ने उनकी मदद नहीं की। अदालत के आदेश के बाद भी काफी दिन तक उन्हें मकान में जगह नहीं दी गइ। जिस मकान के लिए विवाद था, वो खुर्शेदबाग में है। बेटे सौहार्द ने बताया कि अब हम लोग उसी मकान में रहते हैं।
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विपरीत हालात में भी नहीं मानी हार
भारतीय महिला फेडरेशन की प्रदेश अध्यक्ष आशा मिश्रा ने बताया कि उमा लखनपाल एक संस्कृतिकर्मी थीं। पहले व्यवस्था से लड़ीं, कोर्ट से तो न्याय मिला, लेकिन परिवार हमेशा उनकी राह का रोड़ा बना रहा। इस बीच ब्रेस्ट कैंसर हुआ, फिर भी जिजीविषा के बूते वे लड़ती रहीं। उनके परिवार में पति सुप्रिय लखनपाल और बेटा सौहार्द हैं। एक बार उन्होंने परिवार से मांगे अपने हक के लिए हाईकोर्ट से गुहार लगाई और दूसरी बार बीमारी के इलाज के लिए अदालत की शरण में गईं और दोनों ही बार अदालत ने उनके पक्ष को समझा और उनके हक में फैसला सुनाया।
एक मिसाल है उनकी लड़ाई
एडवा की प्रदेश उपाध्यक्ष मधु गर्ग कहती हैं कि आज तो पैतृक संपत्ति में हक के लिए कानून बन गया है, फिर भी महिलाएं और बेटियां अपने हक के लिए आगे नहीं आतीं। उमा लखनपाल ने तो उस वक्त ये मिसाल कायम की और अपना हक मांगा। हालांकि उनका अंतिम समय आर्थिक तंगी में बीता, ये दुखद रहा।

बेटे को साथ लेकर जारी रहा धरना
सामाजिक कार्यकर्ता दीपक कबीर कहते हैं कि उनका संघर्ष भी कमाल का रहा, क्योंकि उनका बेटा छोटा था जिसे लेकर वे लखनऊ से लेकर दिल्ली तक धरने पर बैठी रहती थीं। इतना हौसला हर किसी में नहीं होता है। धरना स्थल पर उनकी मौजूदगी ने एक हलचल मचा दी थी और एक आम महिला को खास बना दिया।
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