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Lucknow News: बीमार मां-बाप के बुढ़ापे की लाठी बन रहीं बेटियां

Wed, 01 Jul 2026 03:00 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 01 Jul 2026 03:00 AM IST
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Daughters are becoming the support of their sick parents in their old age
प्रतीकात्मक तस्वीर। 

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लखनऊ। बेटे बुढ़ापे की लाठी होते हैं और बेटियां पराया धन। सदियों पुरानी यह धारणा केजीएमयू के वृद्धावस्था मानसिक रोग विभाग और बलरामपुर अस्पताल पहुंचने वाले मनोरोगियों के मामले में गलत साबित हाे रही है। यहां बीमार बुजुर्ग माता-पिता की सेवा के लिए ज्यादातर उनकी बेटियां ही तीमारदार के रूप में पहुंच रही हैं।



बलरामपुर अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. देवाशीष शुक्ला बताते हैं कि 70 प्रतिशत बुजुर्ग मरीजों को उनकी बेटियां इलाज कराने के लिए लाती हैं। मानसिक रूप से अस्वस्थ माता-पिता का धैर्य के साथ ये बेटियां ही इलाज कराती हैं। जैसे मां-बाप बचपन में बच्चे की सेवा करते थे, वैसे ही ये वार्डों में बच्चों की तरह उनको पालती नजर आती हैं। कभी दवा खिलाने के लिए प्यार से डांटती हैं तो कभी मजबूत सहारा बन उन्हें जल्दी ठीक होने का हौसला देती हैं। चाहे ड्रिप की बोतल बदलवानी हो, डॉक्टर से परचा समझना हो या असहनीय दर्द में डूबे माता-पिता का हाथ थामकर उन्हें ढाढ़स बंधाना हो, हर जगह बेटियां ज्यादा संख्या में खड़ी नजर आती हैं।
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बहू और बेटी दोनों का निभा रहीं फर्ज



एक सामाजिक धारणा है यह भी है कि बेटियों की विदाई के साथ ही मायके से उसका हक खत्म हो जाता है। अस्पताल के दृश्य इस परिभाषा को झुठला रहे हैं। कई विवाहित बेटियां अपने ससुराल की जिम्मेदारियों की चादर ओढ़े हफ्तों से अस्पताल के ठंडे फर्श पर सो रही हैं, जिससे पिता या मां को अकेलापन महसूस न हो। चिकित्सकों के अनुसार ऐसे मरीजों के फाॅलोअप वाले मामले में भी बेटियां ही बुजुर्गों के साथ आती हैं।
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केजीएमयू में भी तीमारदारी में महिलाएं आगे



केजीएमयू के वृद्धावस्था मानसिक रोग विभाग की असिस्टेंट प्रो. विद्या केएल बताती हैं कि 50 प्रतिशत से अधिक मरीजों के साथ तीमारदार के रूप में महिलाएं ही होती हैं। गांव हो या शहर, मरीज महिला हो या पुरुष, सभी मामलों में महिला तीमारदारों की संख्या ही ज्यादा है। इसमें भी सर्वाधिक बेटियां ही सेवा भाव में ज्यादा नजर आती हैं।




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बेटों ने छोड़ा साथ, बेटी बनी सहारा

केजीएमयू के वृद्धावस्था मानसिक रोग विभाग में भर्ती एक बुजुर्ग मरीज ने बताया कि जिन बेटों को वह बुढ़ापे का सहारा समझ रही थीं, वे उम्र ढलते ही अपनी पत्नी बच्चों के साथ अलग-अलग शहरों में जाकर बस गए। जब से बीमार हूं, विवाहित बेटी ही एक मात्र सहारा है। बेटे कभी कभार सिर्फ मिलने आ जाते हैं। बेटी ने जो सहारा दिया है, उसने मुझे फिर से जीना सिखाया है और इस उम्र में मेरी सोच बदल दी।
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