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'13 साल की मां बनी रेप पीड़िता को 10 लाख और नौकरी दे सरकार'

Wed, 04 Nov 2015 09:11 AM IST
Updated Wed, 04 Nov 2015 09:11 AM IST
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court give important order for 13 year old mother

दुष्कर्म की शिकार 13 वर्षीय बालिका और उसकी नवजात का भविष्य सुरक्षित करने के लिए हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मंगलवार को बेहद अहम फैसला दिया। कोर्ट ने कहा- राज्य सरकार पीड़िता को 10 लाख रुपये की और मदद दे।

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आवासीय विद्यालय में उसकी पढ़ाई का इंतजाम करे। डिग्री हासिल करने तक उसे पूरी मदद दी जाए। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे सरकारी नौकरी भी दी जाए। वहीं, उसकी बच्ची के भविष्य के लिए लखनऊ की बाल कल्याण समिति को अपनी संरक्षा में लेने का निर्देश दिया।
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हाईकोर्ट के जस्टिस शबीहुल हसनैन और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की खंडपीठ ने पीड़िता के पिता की याचिका पर मंगलवार को खुली अदालत में यह फैसला सुनाया। गौरतलब है कि दुराचार के बाद गर्भवती हुई पीड़ित बच्ची ने 26 अक्तूबर को लखनऊ में एक बच्ची को जन्म दिया। पीड़िता के पिता ने मदद के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
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कोर्ट ने कहा- पीड़िता रेप ट्रॉमा सिंड्रोम (आरटीएस) से गुजर रही है। कोर्ट ने साफ तौर पर निर्देश दिया कि पीड़िता की पढ़ाई के दौरान किसी भी स्तर पर उसकी पृष्ठभूमि और अतीत के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं दी जाएगी।

जहां वह पढ़ रही होगी, वहां के प्रिंसिपल को यह सुनिश्चित करना होगा। कोर्ट ने इस बाबत राज्य सरकार सहित संबंधित प्राधिकारियों को सख्त निर्देश दिए।

ऐसे अपराध नहीं थम रहे, सिर्फ मुआवजे से नहीं चलेगा काम

court give important order for 13 year old mother

कोर्ट ने कहा कि जब तक डॉक्टर डिस्चार्ज करने के लिए न कहें, नवजात को अस्पताल में ही रखा जाए। इसके बाद लखनऊ की बाल कल्याण समिति नवजात को अपनी संरक्षा में लेगी। समिति ही उसे गोद देने के लिए प्रक्रिया शुरू करेगी।

कोर्ट ने न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप नारायण माथुर को गोद देने की प्रक्रिया पर नजर रखने के निर्देश दिए हैं। कोई भी बाधा या समस्या आने पर वे सीधे हाईकोर्ट को अप्रोच करेंगे।

हाईकोर्ट ने कहा कि कई कड़े फैसले देने और बिटिया मामले के बाद क्रिमिनिल लॉ अमेंडमेंट-2013 के बावजूद बच्चों और महिलाओं के खिलाफ दुराचार और यौन अपराध रुक नहीं रहे, बल्कि बढ़ ही रहे हैं।

ऐसे में जरूरी हो गया है कि पीड़ितों के पुनर्वास के लिए बेहतर योजनाएं बनाई जाएं। केवल मुआवजे से काम नहीं चलेगा।हाईकोर्ट की खंडपीठ ने फैसले में पीड़िता की हालत बयां किया।

पीड़िता से मिलकर रो पड़े वकील और डॉक्टर्स

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कोर्ट के आदेश पर उससे व्यक्तिगत तौर पर मिलने गए हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील और अस्पताल का स्टाफ उसकी हालत देखकर रो पड़े। पीड़िता का वजन केवल 30 किलो है। उसे समझ नहीं आ रहा कि उसके इर्द-गिर्द क्या कुछ घट रहा है। कोई उसे सांत्वना नहीं दे पा रहा था।

अदालत ने कहा कि पीड़िता व उसका परिवार जिस जिले में रहना चाहें, वहां के एसपी उनकी मदद करें। वे देखें कि दुराचार की वजह से उनके साथ कोई भी भेदभाव या गलत व्यवहार न करें।

दुराचार के मायने केवल इच्छा के विरुद्ध स्थापित किए गए शारीरिक संबंध के तौर पर लिए जाएं तो कोई भी आरटीएस को नहीं समझ सकता। पीड़िता को लग रहा है कि उसके साथ जो किया गया वह किसी दुर्भावना की वजह से किया गया, लेकिन यह दुर्भावना क्या है, वह नहीं जानती। कोर्ट यही उम्मीद कर सकती है कि वह इस ट्रॉमा से बाहर निकले और सामान्य जीवन जी सके।

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