फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   cloth dye in lucknow

पिया लई दो चुनरिया रंगा के लखनऊ से

Fri, 02 Aug 2013 03:19 PM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क Updated Fri, 02 Aug 2013 03:19 PM IST
विज्ञापन
cloth dye in lucknow

अवध क्षेत्र में प्राचीन समय से लहंगा चुनरी (फरिया या दुपट्टा) पहना जाता रहा है। यही यहां का नागरिक और ग्राम परिधान रहा है।

विज्ञापन


रोजाना के पहनावे में खद्दर, गल्ता, जौजी, चौपड़ और निमजरी के लहंगे पहने जाते थे, जिन पर गोटों को औरेब की काट से बनाया जाता था।

जहां पर गोट और मुख्य थान वाले कपड़े का जोड़ बैठता था, उस जगह पर कढ़ा हुआ फीता, कामदार बेल या गोटे की धनक लगा दी जाती थी, जिसको चसक कहते थे, और यह सारे लहंगे चसकदार लहंगे कहे जाते थे।

इस लहंगों पर तनजेब मलमल नैनसुख, मैनाफल और जंगलवाड़ी या डोरिया के दुपट्टे ओढ़े जाते थे, जिन पर पतली किनारी लगा दी जाती थी और अक्सर बीच में रेशम की रंगीन बूटियां पड़ी होती थीं।
विज्ञापन


रेशम की रंगीन बूटियां

कहते हैं एक बार जो इसे पहन लिया वह इसका मुरीद हो गया। इनकी खासियत यह होती थी कि ये सभी सूती कपड़े के होते थे। यह पहनने में आरामदायक होते थे इसलिए परम्परागत पहनावा होने के कारण तीज त्यौहारों पर, शादी विवाहों में औरतें इसे पहनती थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


यहां करवा चौथ, वट सावित्री, गोवर्धन शीतला अष्टमी, जैसे सुहाग के त्यौहारों पर स्त्रियां, ओढ़नी अवश्य पहनती हैं इनके साथ हाथों में चूड़ियां पहनना पैरों में महावर लगाना और गौर से सुहाग लेना जरूरी होता है। शादी में दूल्हे के घर से आया हुआ सुहाग का सामान चढ़ा दिया जाता है।

इस चढ़ाव के सामान में मांग बेदी और पाजेब के साथ चढ़ाव का लहंगा-चूनरी जरूर रहता है इसके अलावा लटबोर का लहंगा भेजा जाता था। यह लहंगे बनारसी पोत, कमखाब, जरबफ्त अशर्फी, बूटी आदि के होते थे जिन पर सच्चे गोटे का काम बना होता था या फिर रेशम पर कारचौबी बनी होती थी।

गोटे में लचका पटा गोखरू, बनत, बांकड़ी किरन चम्पा, चुटकी और धनुष से सजावट की जाती थी इन पर के दुपट्टे, रेशमी तनजेब, रेशमी लहरिया, मैनाफल या मालदही के होते थे। मालदही वाराणसी के पास का एक स्थान है जहां से एक खास कपड़ा मंगाया जाता था।

गरारें हों तो लखनऊ के
अवध सभ्यता में नवाबी की देन टुकड़ी की गोट के गरारे बहुत प्रसिद्ध रहे हैं। गरारे के बारे में ऐसा कहा जाता है कि हिंदुस्तान में जो परंपरागत घाघरा ओढ़नी का पहनावा प्रचलित था।

उसकी साज सज्जा और शान शौकत को देखकर नूरजहां बहुत प्रभावित हुई थीं। तब तक मुस्लिम औरतों में सिर्फ आड़ा पैजामा, कलीदार पैजामा, शलवार और पठानी अरबी पैजामें प्रचलित थे।

अवध में वस्त्रों की रंगाई का काम भी बहुत पुराना है। लखनऊ के इतिहास मे रंगरेजी कला की अपनी एक अलग शान है। फतहगंज लखनऊ में किसी जमाने में एक ऐसा रंगरेज हुआ करता था, कि जो दुपट्टे की दोनों सतह अलग-अलग दो रंगों में रंग देता था।

अवध के दूसरे बादशाह नसीरूद्दीन हैदर की प्रिय बेगम कुदसिया महल के दुपट्टे चौक इलाके का गामा नाम का रंगरेज रंगता था। सादी में रंगाई के अलावा झमक या बुक्का को रंग में मिलाकर कपड़ा रंगने की प्रथा रही है।


सावन के महीने में तो धानी और हरे रंग की साड़ियों की रंगाई का काम जोरों पर रहता है। जब बात रंगाई की चल ही रही है तो बंधेज को कैसे भूला जा सकता है। अवध में बंधेज का इस्तेमाल बहुत पुराना रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed