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UP: देश से दोगुना ज्यादा बच्चे मर रहे 44 जिलों में

Sat, 08 Nov 2014 01:33 AM IST
अभिषेक यादव/अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक यादव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 08 Nov 2014 01:33 AM IST
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Child death ratio in Uttar Pradesh.

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और उत्तर-मध्य हिस्से के 44 जिलों के प्रति 1000 में से 70 बच्चे पैदा होने के महज चार हफ्ते में ही दम तोड़ देते हैं। वहीं प्रदेश स्तर पर प्रति हजार में यह आंकड़ा 37 और राष्ट्रीय स्तर पर प्रति हजार में 29 है।

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बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर काम कर रहे संगठन सेव द चिल्ड्रन ने देश भर में नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर जारी अध्ययनों को आधार बना अपनी रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ इंडिया’ज न्यूबॉर्न’ के आधार पर प्रदेश के ये हालात बताए हैं। केंद्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य मंत्रालय और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के सहयोग से तैयार इस रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में हालिया वर्षों में नवजात मृत्यु दर (आईएमआर) में काफी सुधार हुआ है।
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फिलहाल इसे प्रति 1000 बच्चों में 53 मृत्यु पर लाया जा चुका है, लेकिन जब मिलेनियम डवलपमेंट गोल - 4 के तहत वर्ष 2035 तक देश की आईएमआर को 10 से नीचे लाने का प्रयास किया जा रहा है, उत्तर प्रदेश के हालात को तेजी से सुधारने की जरूरत है।
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इस सिलसिले में राजधानी में शुक्रवार को आयोजित मीडिया वर्कशॉप में संगठन से जुड़े चिकित्सकों और विशेषज्ञों ने स्थितियों को सामने रखने के साथ ही समाधानों पर चर्चा की।

बेहद जरूरी हैं ये सुविधाएं

Child death ratio in Uttar Pradesh.

वर्कशॉप में संस्था के साथ काम कर रहे डॉ. राजेश खन्ना ने कहा कि सूबे में नवजात बच्चों की मौतों के कारणों में प्रसव के दौरान होने वाले संक्रमण, जटिलताएं और समय से पहले होने वाला प्रसव प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि इस हालात में सुधार के लिए नवजात बच्चों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की जरूरत है। 75 जिलों में से केवल 27 जिलों में स्पेशल नियो-नेटल केयर यूनिट स्थापित हो पाई हैं। इनकी संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।

ग्रामीण इलाकों में प्रसव बाद चौबीस घंटे चिकित्सा सुविधाएं मिलनी चाहिए। इसके लिए दूर-दराज के अंचलों में लगाए जा रहे डॉक्टरों व नर्सेज को यदि दो से तीन गुना वेतन भी दिया जाए तो यह ज्यादा महंगा नहीं पड़ेगा बल्कि कई अन्य खर्चों को कम करेगा।

तीसरा अहम समाधान युवतियों के स्वास्थ्य में सुधार के रूप में सुझाया जिसका सीधा प्रभाव नवजात बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि दो बच्चों के बीच अगर दो साल या उससे अधिक अंतर हो तो नवजात मृत्यु की संभावना 75 प्रतिशत तक कम की जा सकती है।

सेव द चिल्ड्रन के प्रदेश कार्यक्रम प्रबंधक शिरोजीत चटर्जी ने बताया कि केरल में नवजात मृत्यु दर 7 और जापान में 2 है, वहीं हमारे यहां यह आंकड़ा 53 होना बताता है कि अभी कितने सुधार की जरूरत है।

विशेषज्ञ एमएम बहुगुणा ने कहा कि नवजात बच्चों की मृत्यु दर पर नियंत्रण के साथ ही नवजात कन्याओं की हत्या पर भी नियंत्रण की जरूरत है चाहे वह भ्रूण के रूप में की जा रही हो या जन्म के बाद उपेक्षा के कारण। संस्था से जुड़े सरफराज और जूही मोहन ने भावी गतिविधियों के बारे में बताया।

देखें आकड़े- नवजात मृत्यु दर

Child death ratio in Uttar Pradesh.

जीवन काल--यूपी--भारत
28 दिन--37--29
1 वर्ष--53--42
5 वर्ष--68--52
(प्रत्येक 1000 नवजात बच्चों में)

प्रदेश के पिछड़े और विकसित जिलों में अंतर
- सिद्धार्थनगर में प्रति 1000 में से 70 बच्चे 28 दिन पूरा करने से पहले मर रहे हैं, जो ओडिशा के बालंगिर के 71 से कुछ ही बेहतर है। वहीं प्रदेश के ही कानपुर नगर में यह संख्या 24 है जो देश के औसत से कहीं बेहतर है।

- फीरोजाबाद में 43.4 प्रतिशत बच्चे कम वजन यानी 2.5 किलो से कम के पैदा हो रहे हैं, वहीं झांसी में महज 9.8 फीसदी बच्चे कम वजन के पैदा होते हैं।

- बलरामपुर जिले में 29.8 फीसदी यानी 3 में से 1 बच्चे का जन्म अस्पताल में हो रहा है, जबकि झांसी में यह आंकड़ा 76.8 प्रतिशत है।

- श्रावस्ती में 16.4 प्रतिशत महिलाएं ही गर्भावस्था के दौरान कम से कम तीन बार चेकअप के लिए आ रही हैं। वहीं लखनऊ में यह 64.6 और प्रदेश में 24.8 प्रतिशत है।

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