पढ़िए, भाजपा के नए 'शहंशाह' की सबसे बड़ी चुनौतियां
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भाजपा के नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामने यूपी में भाजपा को मजबूत करने की बड़ी चुनौतियां है।
लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सफलता की पटकथा लिखने वाले अमित शाह के हाथ अब पूरी भाजपा की कमान है।
भाजपा में राजनाथ की जगह लेने वाले अमित शाह के संगठन कौशल की अब यूपी में असल परीक्षा होगी। अमित शाह को भाजपा की उन चुनौतियों से पार पाना है, जिनसे पार पाने के लिए भगवा टोली के रणनीतिकार लंबे समय से जूझ रहे थे।
उन्हें यूपी भाजपा के पुनरुद्धार के दूसरे चरण के काम को ही आगे नहीं बढ़ाना है बल्कि विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर भी अभी से रणनीति का खाका खींचना होगा।
यूपी ने बनाया शाह को आम से खास
अमित शाह को वह चेहरा भी तलाशना होगा जो नरेन्द्र मोदी की तरह उत्तर प्रदेश में आम लोगों को विश्वास जीत सके। लोगों को बदलाव और उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने का भरोसा दिला सके।
भले ही भाजपा व भगवा टोली के प्रमुख लोग शाह को भाजपा की राष्ट्रीय कमान मिलने को पार्टी की सांगठनिक परिपाटी का सामान्य हिस्सा बता रहे हैं। पर, अंदरखाने यह न तो साधारण बदलाव है और न सामान्य फैसला।
शाह को भाजपा की राष्ट्रीय स्तर पर कमान दिलाने में उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिसने शाह को आम से खास बना दिया।
उनके प्रभारी रहते उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 में भाजपा व सहयोगी दल अपना दल को जिस तरह 73 सीटों पर जबरदस्त जीत मिली। उसी से भगवा रणनीतिकारों को यह भरोसा पैदा हुआ कि शाह में ही उत्तर प्रदेश में भाजपा की खोई जमीन दिलाने की सामर्थ्य है।
गड़बड़ नहीं कर सके वरिष्ठ भाजपाई
कहा जा सकता है कि देश में भगवा टोली की सरकार बनवाने वाले रणनीतिकारों व संघ नेतृत्व ने अब शाह के जरिये यूपी में लोकसभा चुनाव के चमत्कार की पुनरावृत्ति की अभिलाषा से यह फैसला किया है।
ऐसा लगता है कि लोकसभा चुनाव के बाद संघ नेतृत्व व भगवा रणनीतिकार इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि नरेन्द्र मोदी की कड़क व निर्णायक नेता की छवि की छाया में शाह के फैसला करने के तौरतरीकों ने उत्तर प्रदेश में गुटों में बंटे भाजपाइयों को जुबान लोकसभा चुनाव में मुंह पर ताला लगाने पर मजबूर कर दिया।
वे कुछ गड़बड़ करने की हिम्मत नहीं कर पाए। गुटबाजी को बढ़ावा देने और अपने-अपने लोगों को पद व प्रतिष्ठा दिलाने की पहचान रखने वाले नेताओं के हाथ बांध दिए। उसी राह पर भाजपा उत्तर प्रदेश में भी सत्ता का सफर तय कर सकती है।
शाह का अगला कदम 'ऑपरेशन भाजपा'
यह तो आगे आने वाला वक्त बताएगा कि शाह का कौशल कसौटी पर कितना खरे उतरता है उत्तर प्रदेश में भाजपा की सत्ता में वापसी में वह किस सीमा तक सफल होते हैं।
पर, इतना तय है कि भविष्य में शाह के एजेंडे में उत्तर प्रदेश ही नंबर एक पर होगा। इसके लिए प्रभारी के रूप में उत्तर प्रदेश भाजपा की दिशा व दशा और यहां के नेताओं की नीति व रणनीति तथा स्वभाव को समझ चुके शाह का अगला कदम उत्तर प्रदेश में ‘ऑपरेशन भाजपा’ का ही होगा।
कारण, शाह जब प्रभारी के रूप में आए थे तो उनके पास भाजपा के मौजूदा सांगठनिक ढांचे या अन्य कामकाज में बदलाव करने का बहुत मौका नहीं था। लोकसभा चुनाव की तैयारी की चुनौती खड़ी थी।
इसलिए चाहकर और जानते हुए भी उन्होंने बहुत सारे समझौते किए होंगे या अनदेखी की होगी। पर, अब अध्यक्ष के रूप में उनके सामने ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है। विधानसभा चुनाव की तैयारी करने के लिए ढाई साल का लंबा वक्त है। साथ ही फैसले भी खुद ही करने हैं।
यह हैं प्रमुख चुनौतियां
चुनौतियों की बात करें तो अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें अपने तरीके से कार्ययोजना बनाने और उसे उत्तर प्रदेश में लागू करने का अधिकार मिल गया है।
इस नाते आगे यूपी में उप चुनाव, पंचायत चुनाव या विधानसभा चुनाव के जैसे नतीजे आएंगे उसके लिए सीधे जिम्मेदार भी वही होंगे।
स्वाभाविक है कि शाह किसी भी स्थिति में नहीं चाहेंगे कि कोई उनकी पहुंच व पकड़ पर अंगुली उठा सके। मोदी भी चाहेंगे कि उनका फैसले को लेकर भविष्य में कोई उनके ऊपर अंगुली न उठा सके।
पर, इसके लिए उन्हें उत्तर प्रदेश में सबसे पहले एक अदद ऐसे चेहरे को जनता के सामने लाने की चुनौती होगी जो मोदी की तरह यूपी के लोगों का दिल व दिमाग दोनों जीत सके।
चाहिए मोदी जैसी लोकप्रियता वाला नेता
बताया जा रहा है कि यूपी में भाजपा के लिए एक प्रमुख विश्वसनीय चेहरे को लाना आसान काम नहीं है। कारण, शाह को सूबे के सामाजिक समीकरणों के साथ संभावित व्यक्ति की छवि और जनता के बीच उसकी पहुंच व पकड़ का भी ध्यान रखना होगा।
यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मोदी के पास तो गुजरात में तीन बार भाजपा को जीत दिलाने की पूंजी थी। जिस कारण देश ने उनके चमत्कारिक नेतृत्व पर भरोसा किया।
पर, उत्तर प्रदेश में अभी तक ऐसा कोई चेहरा सामने नहीं दिख रहा है। जो चेहरे हैं उनमें किसी के लिए यह नहीं कहा जा सकता है कि वह जनता में मोदी जैसी लोकप्रियता वाला है।
इसी खोज पर ही शाह की यूपी में कामयाबी का ज्यादातर दारोमदार रहेगा। साथ ही उन्हें बूथ कमेटियों से लेकर उन सारी कमियों को भी दूर करना होगा जो प्रभारी के रूप में उनके सामने आ चुकी हैं।