Lucknow: नई महापौर के ताज में फूलों के साथ कांटे भी, नगर निगम का सालाना बजट ही केवल 2000 करोड़, ये है मुश्किल
नगर निगम के दायरे में जो 88 गांव शामिल हुए हैं, वहां विकास के लिए 5000 करोड़ (पुराने इलाके को छोड़कर) से अधिक का बजट चाहिए, जबकि नगर निगम का सालाना बजट ही महज 2000 करोड़ का है। उसमें भी करीब 60 फीसदी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों पर ही खर्च हो जाता है।
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आमदनी से ज्यादा खर्च वाले नगर निगम का शासन चलाना नई महापौर सुषमा खर्कवाल के लिए आसान नहीं होगा। सफाई, मार्ग प्रकाश, सीवर, पेयजल और सड़क की बेहतर सुविधा की मांग को नगर निगम पूरा नहीं कर पा रहा है। बजट की तंगी राह में बाधा बनती है, जिसे दूर करने की योजनाएं तो हैं, मगर नगर निगम उनको राजनीतिक दबाव में लागू नहीं कर पा रहा है। ऐसे में नई महापौर को जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए कड़े फैसले भी लेने होंगे, क्योंकि पिछले 25 साल से महापौर पद पर भाजपा का ही कब्जा है।
नगर निगम 300 करोड़ से अधिक का कर्जदार है। ऐसे में चुनाव से पहले महापौर और पार्षद जो वादे कर आए हैं, उन्हें पूरा करना आसान नहीं होगा। नगर निगम के दायरे में जो 88 गांव शामिल हुए हैं, वहां विकास के लिए 5000 करोड़ (पुराने इलाके को छोड़कर) से अधिक का बजट चाहिए, जबकि नगर निगम का सालाना बजट ही महज 2000 करोड़ का है। उसमें भी करीब 60 फीसदी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों पर ही खर्च हो जाता है।
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आमदनी से ज्यादा है शहर की सरकार का खर्च
नियमित कर्मचारियों के वेतन-पेंशन के अलावा नगर निगम को सफाई, मार्ग प्रकाश, पार्षद कोटा आदि पर सालाना 600 करोड़ से अधिक खर्च करना पड़ता है, जबकि आमदनी करीब 400 करोड़ है। ऐसे में यदि राज्य वित्त का पैसा न आए तो कर्मचारियों को वेतन देना भी मुश्किल होगा। नियमित और संविदा कर्मचारियों को मिलाकर नगर निगम को सालाना करीब 450 करोड़ रुपये वेतन-पेंशन व कर्मचारियों के अन्य देयकों पर खर्च करना पड़ता है। इसमें सालाना करीब 300 से 350 करोड़ रुपये शासन राज्य वित्त मद से देता है और शेष नगर निगम को अपनी आय से मिलाना पड़ता है। नगर निगम की आय का सबसे बड़ा जरिया गृहकर है, मगर पिछले 13 साल से उसकी दरें नहीं बढ़ाई गई हैं, जबकि हर दो साल पर इसे बढ़ाने का नियम है।
बेपटरी है कूड़ा प्रबंधन, गिर रही स्वच्छता रेटिंग
चीनी कंपनी ईकोग्रीन की लापरवाही से शिवरी प्लांट पर 20 लाख मीट्रिक टन से अधिक कूड़े का पहाड़ लगा है। शहर में करीब छह लाख घर हैं और उनमें दो लाख से भी सही से कूड़ा कलेक्शन नहींं हो रहा है। काॅम्पैक्टर भी ज्यादातर ठप रहते हैं, वहां से कूड़ा उठान भी समय से नहीं होता। ईकोग्रीन वाले पूरे महीने घरों से कूड़ा लेने नहीं जाते हैं, मगर पैसा पूरा लेते हैं। इन्हीं कमियों के चलते स्वच्छता रेटिंग पिछले साल सुधरने के बजाय 12वें से 17वें स्थान पर पहुंच गई। चीनी कंपनी को हटाकर नई कंपनी लगाई जानी है, मगर शासन वाले चीनी कंपनी पर मेहरबान हैं।
सीवर और मार्ग प्रकाश निजी हाथों में
सीवर का काम जलकल के बजाय निजी कंपनी शुएज इंडिया के पास है और मार्ग प्रकाश व्यवस्था ईईएसएल कंपनी देखती है। जब से इन कंपनियों के पास काम है, तब से समस्याएं बढ़ी हैं। इसे लेकर नगर निगम सदन में कई बार हंगामा हो चुका है। कपंनियों को हटाने को लेकर भी प्रस्ताव पास हो चुका है, मगर हटाया नहीं जा सका। वहीं शहर के आधे से ज्यादा इलाकों में सीवर लाइन ही नहीं है। वहीं पेयजल संकट दूर करने के दो नए जलकल बनाए जाने हैं, उन पर काम नहीं हो रहा है। जरूरत भर का पानी भी सिंचाई विभाग से नहीं मिलता है। ऐसे में साल में कई बार पेयजल की किल्लत होती है।
इन पर करना होगा काम :
- अतिक्रमण शहर की बड़ी समस्या, जिसे नगर निगम दूर नहीं कर पा रहा है।
- नगर निगम की जमीनों पर अवैध कब्जे हो रहे हैं।
- स्मार्ट सिटी योजना में जो काम हो रहे हैं, उसका पूरा लाभ अभी शहर को नहीं मिल रहा।
- गृहकर निर्धारण में आए दिन गड़बड़ियां सामने आती हैं।
- सड़क निर्माण को लेकर अक्सर शिकायतें आती हैं कि निर्माण गुणवत्तापरक नहीं है।
- म्यूनिसिपल बांड के पैसे से बनाए गए अहाना ग्रींस के फ्लैट बिक नहीं रहे हैं।
- कार्यदायी संस्थाओं से कर्मचारी लगाने में बड़े पैमान पर फर्जीवाड़ा होता है।
- नगर निगम की गाड़ियों से तेल चोरी के मामले लगातार सामने आते हैं।